सोमवार, 27 मार्च 2017

खरपतवार नियंत्रण से संभव है रबी फसलों से अधिक उत्पादन


डाँ.गजेन्द्र सिंह तोमर 
प्राध्यापक,सस्यविज्ञान
इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़) 


भारत की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी की रोजी -रोटी और  तमाम ओद्योगिक इकाइयों का परिचालन कृषि पर आधारित है । अतः बढ़ती जनसंख्या के  लिए खाद्य व पोषण  सुरक्षा तथा ओद्योगिक  खुशहाली के  लिए फसल उत्पादन को  सतत बढाना परम आवश्यक है । हमारे देश में खरीफ, रबी और  जायद  मौसमों में विभिन्न प्रयोजनों के लिए नाना  प्रकार की फसलों  की खेती की जाती है लेनिक उनकी उत्पादकता विकसित देश¨ से काफी कम है । फसलोत्पादन को  प्रभावित करने वाले वातावरणीय कारकों  यथा वर्षा जल, तापक्रम, आद्रता, प्रकाश आदि के अलावा  जैविक कारकों जैसे  कीट, रोग  व खरपतवार प्रकोप  से फसल उपज का बड़ा हिस्सा बर्बाद हो जाता है । इन सभी फसल नाशकों  में से खरपतवारों  द्वारा  फसल को सर्वाधिक नुकसान होता है । एक आकलन के  अनुसार देश में खरपतवारों  से लगभग 37 हजार करोड़  रूपये की सालाना हांनि हो जाती  है। सही समय पर  खरपतवार नियंत्रित कर लिया जावे तो  हमारे खाद्यान्न के लगभग एक तिहाई हिस्से को  नष्ट होने से बचा कर देश की खाद्यान्न सुरक्षा को  अधिक मजबूत किया जा सकता है । खेत में खरपतवार फसल के  साथ पोषक तत्वों, हवा, पानी और  प्रकाश के  लिए प्रतिस्पर्धा करते है जिससे फसल उपज की मात्रा एवं  गुणवत्ता में गिरावट ह¨ती है । विभिन्न शोध परीक्षणों  से पता चला है कि अनियंत्रित खरपतवार रबी फसलों  की पैदावार में 15-60 प्रतिशत तक की हांनि पहुँचा सकते है । प्रभावशाली ढ़ंग से खरपतवार नियंत्रण के  लिए हमें खरपतवारों  का ज्ञान होना अति आवश्यक है । रबी फसलों के साथ  उगने वाले प्रमुख खरपतवारों  को तीन वर्गों  में विभाजित किया गया है :
चौड़ी  पत्ती वाले खरपतवारः बथुआ (चिनोपोडियम  एल्बम), कृष्णनील (एनागेलिस आरवेंसिस), जंगली पालक (रूमेक्स डेन्टाटस), हिरनखुरी(कन्वावुलस  आर्वेंसिस), सफ़ेद  सेंजी (मेलीलोटस  एल्बा), पीली सेंजी (मेलीलोटस  इंडिका) जंगली रिजका (मेडीकाग¨ डेन्टीकुलाटा), अकरा-अकरी (विसिया प्रजाति), जंगली गाजर (फ्यूमेरिया पारविफ़्लोरा), चटरी-मटरी (लेथाइरस अफाका)सत्यानाशी (आरजीमोन  मेक्सिकाना) आदि ।
संकरी पत्ती अथवा घास कुल के  खरपतवारः गेहूंसा या गुल्ली डण्डा (फेलेरिस माइनर), जंगली जई (एवीना फतुआ),दूबघास (साइनोडान  डेक्टीलोन) आदि ।
मोथा  कुल के  खरपतवारः मौथ  (साइप्रस प्रजाति ) आदि । 

खरपतवारों के  हांनिकारक प्रभाव

खरपतवार फसलों  के  साथ उगकर भूमि में उपलब्ध पोषक तत्व तथा प्रयोग  किये गये खाद-उर्वरक का एक तिहाई हिस्सा अकेले  ही ग्रहण कर लेते है । इसके  अलावा मृदा में उपलब्ध नमी को  खरपतवार तेजी से अवशोषित  कर लेते है । इसकी वजह से  फसलों के लिए आवश्यक पोषक  तत्व और  नमीं की कमी आ जाती है जिससे फसल बढ़वार पर बिपरीत प्रभाव जिससे ना केवल  उपज बल्कि  उत्पाद की गुणवत्ता भी घट जाती है । खरपतवार फसल के लिए अपरिहार्य  स्थान तथा  प्रकाश से भी वंचित रखते है । इसके  अतिरिक्त खरपतवार हांनिकारक कीट-रोगों के जीवाणुओं को  भी आश्रय प्रदान करते है । अतः उन्नत किस्म के  बीज, खाद एवं उर्वरकों के  संतुलित उपयोग, समसामयिक सिंचाई, कीट-रोग  प्रबंधन के  अलावा समय पर  खरपतवार नियंत्रण करना भी नितांत आवश्यक है । 

सही समय पर जरूरी है खरपतवारों का  नियंत्रण

रबी फसलों से प्रति इकाई अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए  इन फसलों की बुआई से लेकर प्रारंभिक 25-30 दिन तक की अवस्था तक खेत को  खरपतवार मुक्त रखना आवश्यक रहता है।  फसल को  प्रारम्भ से लेकर फसल कटाई तक खरपतवार रहित रखना आर्थिक दृष्टि से लाभदायक नहीं माना जा सकता है । इसलिए फसल-खरपतवार प्रतिस्पर्धा की क्रान्तिक अवस्था  (देखिये सारिणी-1) में खरपतवारों को काबू में रखना अति आवश्यक है, अन्यथा उत्पादन में भारी क्षति होने की सम्भावना रहती है।  
सारिणीः 1  खरपतवारों  द्वारा रबी फसलों  की उपज में हांनि एवं फसल-खरपतवार प्रतिस्पर्धा का क्रांतिक समय

फसलें 
उपज में संभावित कमीं (%)
फसल-खरपतवार प्रतिस्पर्धा का क्रांतिक समय
गेंहू 
20&40
30&45
जौ 
10&30
15&45
रबी मक्का 
20&40
30&45
चना 
15&25
30&60
मटर 
20&30
30&45
मसूर 
20&30
30&60
राई-सरसों 
15&40 
15&30 
सूर्यमुखी 
30&45 
33&50 
कुसुम (करडी)
15&45 
35&60 
अलसी 
20&40
30&40 
गन्ना 
20&30
30&120
आलू 
30&60
20&40
गाजर 
70&80
15&20
प्याज व लहसुन 
60&70
30&75
मिर्च व टमाटर 
40&70
30&45
बैंगन 
30&50
20&60

खरपतावार नियंत्रण के प्रमुख  उपाय

खरपतवार प्रबन्धन के अंतर्गत खरपतवारों का निरोधन, उन्मूलन तथा नियंत्रण सम्मिलित होता  है । खरपतवार नियंत्रण की सीमा में  खरपतवारों की वृद्धि रोकना, खरपतवार तथा फसलों के बीच प्रतिस्पर्धा केा घटाना, खरपतवार का बीज बनने से रोकना तथा बीजों तथा अन्य वानस्पतिक भागों का प्रसरण रोकने के  अलावा खरपतवारों का सम्पूर्ण विनाश आता है जो खरपतवार प्रबन्ध का मुख्य उद्देश्य है । खरपतवार प्रबन्धन के  अन्तर्गत निरोधी एवं चिकित्सकीय विधियाँ आती है । चिकित्सकीय विधि के अंतर्गत उन्मूलन तथा नियंत्रण सम्मिलित होता  है । रबी फसलों  में खरपतवार नियंत्रण की  प्रमुख विधियाँ यहां प्रस्तुत है:
1.यांत्रिक विधिः भूपरिष्करण सम्बंधी क्रियाओ जैसे जुताई, खुदाई गुड़ाई आदि से खरपतवार, कटकर, उखड़कर, उलट पलट कर या दब कर समाप्त हो जाते है । कृषि कार्य करने हेतु श्रमिक  कम पारिश्रमिक पर सुगमता से उपलब्ध हो जाने के स्थिति में  रबी  फसलों  में उगने वाले खरपतवारों को फसल की बढवार अर्थात फसल-खरपतवार प्रतिस्पर्धा की क्रांतिक अवस्था (15 से 35 दिन के  मध्य का समय) में खुरपी, कुदाल या हैण्ड ह¨ से नष्ट किया जा सकता है । खरपतवारों में फूल व बीज बनने से पूर्व उखाड़ा जाना चाहिए ।  फसल बुवाई से पूर्व की जुताई भी खरपतवारों की संख्या को  कम करती है । आज कल मृदा सूर्यीकरण पद्धति  से भी खरपतवार नियंत्रित किये जा रहे है । इस विधि में ग्रीष्म ऋतु में खेतों की गहरी जुताई कर उनमे  सिंचाई करते है । एक-दो  दिन बाद पतली पारदर्शी प्लास्टिक (पोली इथाईलीन) की परत (50 माइक्रोन) खेत में विछाकर 10-20 दिनों के  लिए मिट्टी का तापक्रम बढ़ाया जाता है जिससे खरपतवार बीज और उनके अंकुर  नष्ट हो  जाते है । रबी की प्रमुख फसलों  में निराई गुड़ाई का समय सारणी में दिया गया है। 

सारणी-2 रबी की प्रमुख फसलों में निराई-गुड़ाई का उपयुक्त समय 

क्रमांक 
फसल का नाम 
निराई-गुड़ाई का उपयुक्त समय (दिन में)
1
गेंहू 
30&35
2
चना 
25&35
3
राइ-सरसों 
20&25
4
अलसी 
20&25
5
सूर्यमुखी h
30&45
6
राजमा 
30&35
7
गन्ना 
30&40

2. सस्य विधियाँ: खेत में ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई कर खेत को 25-35 दिन के लिए खुला छोड़  देने से अधिक तापक्रम के  कारण काफी खरपतवार नष्ट हो  जाते है । फसलों  की बुवाई  छिटकवाँ विधि की वजाय कतार विधि से करने में निराई-गुड़ाई में सुगमता होती है तथा उपज अधिक प्राप्त होती है । इसके  अलावा उपयुक्त फसल चक्र अपनाने से खरपतवार नियंत्रित रहते है, क्योकि  एक ही फसल को उसी खेत में  बार-बार उगाने  से उस फसल के  खरपतवारों  का प्रकोप  बढ़ जाता है । उदाहरण के टॉर  पर गेंहू में जंगली जई या गुल्ली डंडा की समस्या होने  पर गेंहू के  स्थान पर उस खेत में राय-सरसों  या बरसीम उगाना लाभप्रद पाया गया  है । फसलों  की कतारों के  बीच खाली स्थान पर पलवार यथा धान का पुआल या प्लास्टिक की चादरें विछा देने से  भी खरपतवार नहीं पनपते है ।
3.रासायनिक विधियाँ : परंपरागत रूप से खरपतवार नियंत्रण के  लिए निंदाई, गुड़ाई ही कारगर विधि मानी जाती थी । परन्तु प्रतिकूल मौसम  जैसे लगातार वर्षा अथवा मजदूर  न मिलने के  कारण यांत्रिक या सस्यविधियों  से खरपतवार नियंत्रण कठिन होता  जा रहा है । इन विषम  परिस्थितियों  में सीमित लागत तथा कम समय में अधिक क्षेत्रफल में फसल के  इन दुश्मनों  पर नियंत्रण पाने के  लिए रासायनिक विधियाँ कारगर साबित हो रही है । खरपतवारनाशियों के प्रयोग  से खरपतवार उगते ही नष्ट हो  जाते है जिससे उनकी पुर्नवृद्धि, फूल व बीज विकास रूक जाता है । खरपतवारनाशियों  को पमुख तीन वर्गों  में बांटा गया है ।
1.बुवाई से पूर्व प्रयुक्त खरपतवारनाषक (पी.पी.आई.) :  इस प्रकार के  खरपतवारनाषक बुवाई के पूर्व खेत की अंतिम जुताई के  समय छिड़काव कर मृदा में मिला दिये जाते है जिससे खरपतवार उगने से पूर्व ही समाप्त हो जाते है अथवा उगने पर नश्ट हो  जाते है । ये नींदानाषक उड़नषील प्रकृति  के होते  है । अतः छिड़काव के  साथ या तुरन्त पश्चात इन्हें  भूमि में मिलाना आवष्यक रहता है, अन्यथा इनका प्रभाव कम हो जाता है । उदाहरण के  लिए फ्लूक्लोरेलिन, ट्राईफ्लूरेलीन आदि ।
2. अंकुरण पूर्व एवं बुवाई पश्चात प्रयुक्त खरपतवारनाशक(पी.ई.):  इस प्रकार के  नींदानाशक बुवाई के  तुरन्त पश्चात (24-36 घण्टे तक) एवं अंकुरण से पूर्व पप्रयोग  में लाये जाते है । चूंकि ज्यादातर खरपतवार फसल उगने से पहले उग जाते है । अतः ये नींदानाशक उगते हुए खरपतवारों को नष्ट  कर देते है तथा अन्य  खरपतवारों को  उगने से रोकते है । ये  चयनित प्रकार के  खरपतवारनाशक होते है अर्थात फसल को  क्षति नहीं पहुंचाते है । इनका प्रयोग  करते समय भूमि में नमीं रहना अतिआवश्यक है अन्यथा इनकी क्रियाशीलता कम हो  जाती है । उदाहरण के  लिए एट्राजीन, एलाक्लोर, पेन्डीमेथालीन आदि ।
3.अंकुरण पश्चात खड़ी फसल में प्रयुक्त खरपतवारनाशक (पी.ओ .ई.):  इस प्रकार के  नींदानाशक फसल उगने के  पश्चात खड़ी फसल में छिड़के  जाते है । ये  चुनिंदा (वरणात्मक) प्रकार के नींदानाशक  होते है, जो कि खरपतवारों को  विभिन्न रासायनिक क्रियाओं द्वारा नष्ट करते है तथा फसल को नुकसान नहीं पहुँचाते है । अनेक बार अन्य फसलों की बुवाई में व्यस्तता, लगातार वर्षा होने  या अन्य किसी वजह से बुवाई पूर्व (पी.पी.आई.) या अंकुरण पूर्व (पी.ई.) नींदानाशकों  का प्रयोग  नहीं संभव हो सके तो बुवाई पश्चात खड़ी फसल में (पी.अ¨.ई.) खरपतवारनाशकों  का प्रयोग  किया जा सकता है । खड़ी फसल में इनका प्रयोग  करते समय थोड़ी सावधानियाँ रखना आवश्यक रहता है, जैसे विशिष्ट खरपतवारों के  लिए संस्तुत उचित खरपतवारनाशक की सही मात्रा, उचित समय एवं सही विधि द्वारा छिड़काव करना चाहिए अन्यथा फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है । खड़ी फसल में इनका प्रयोग  करते समय चिपकने वाला पदार्थ (सर्फेक्टेन्ट) जैसे साबुन, शैम्पू, सैंडोविट  आदि  0,5 प्रतिशत (500 मिली प्रति हैक्टर) को  मिलाकर छिड़काव करने से  ये  पदार्थ  खरपतवारों  की संपूर्ण पत्तियों पर फैलकर  चिपक जाते है एवं उनकी क्रियाशीलता को बढ़ाते है । ध्यान रखे कि स्प्रेयर की टंकी में पहले खरपतवारनाशक मिलाये तथा बाद में सर्फेक्टेन्ट को  डाल कर छिड़काव करें । जैसे 2,4-डी, मेटसल्फूरोन  मिथाइल, सल्फोसल्फुरान, क्यूजालोफ्प  इथाईल, क्लोडिनोफाप  आदि फसल विशेष खरपतवारनाशक है ।
रबी की प्रमुख फसलों  में खरपतवार नियंत्रण

सारणी-3 गेंहू फसल   में खरपतवार नियंत्रण

खरपतवारनाशी का
वैज्ञानिकनाम
खरपतवारनाशी का
व्यपारिक नाम
प्रयोग दर  (सक्रिय तत्व/व्यापारिक दर प्रति हेक्टेयर)
प्रयोग का  समय
दिन बाद
खरपतवार नियंत्रण हेतु अनुसंशा
मेटस्लफयूरोन मिथाइल
आलग्रिप
4 ग्रा. सक्रिय तत्व (20-30 ग्राम)
बुआई के 35-40
चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार
पेन्डिमेथालिन 30 र्इ.सी. (स्टाम्प) 
स्टाम्प
750-1000 मिली. सक्रिय तत्व  (2500-3000 मिली.)
बुआई के तुरन्त बाद
चौड़ी पत्ती और सकरी पत्ती वाले खरपतवार ।
मैट्रीब्युजिन
सेंकार, टाटा मैट्री
175-210 ग्रा. सक्रिय तत्व (250-300 ग्रा.)
बुआई के 30-35 दिन बाद
सकरी पत्ती वाले खरपतवार
कारफेट्राजोन 40 डी.एफ.
एफीनिटी
20 ग्रा. सक्रिय तत्व (50 ग्राम)
बुआई के 25-30
चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार
क्लोडीनोपोप 15 डव्लू पी
टोपिक
60 ग्रा ए.आई /हे
(400 ग्राम/हे)
बुआई के 25-30
सकरी पत्ती वाले खरपतवार
फिनोक्सा प्रोपइथाईल 10 ई.सी
प्यूमासुपर, व्हिप सुपर
80-120 ग्रा सक्रिय तत्व (800-1200  ग्राम/हे )
बुआई के 35-40
सकरी पत्ती वाले.. गेहू और रार्इ के अंतरवर्तीय खेती के लिये उपयुक्त
सल्फोस्लफयूरोन
लीडर, सफल, फतेह
25 ग्रा. सक्रिय तत्व (33 ग्रा..)
बुआई के 25-30
सकरी पत्ती वाले ए वम कुछ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार
पीनोक्साडीन  5 या  10 र्इ.सी.
एक्सिल
35-40 ग्राम सक्रिय तत्व (400-800  मिली.)
बुआई के 35-40
सकरी पत्ती वाले खरपतवार
सल्फोसल्फुरोन 75% + मेटासल्फुरोन 5% डब्ल्यू.जी.
 टोटल, टोपेल, बैकेट टिवन
 32 ग्रा./हे सक्रिय तत्व (40 ग्रा /हे )
बोनी के 25-30 दिन बाद
चौड़ी  और संकरी पत्ती वाले
ट्रालकोक्सीडीम 10 ई सी
ग्रास्प
350 ग्रा.ए.आई./हे (3500  मिली/हे )
बोनी के 30 -35  दिन बाद
सकरी पत्ती वाले खरपतवार


नोट-पानी की दर 250 से 300 लीटर प्रति हेक्टेयर रखना चाहिए। 

रबी दलहनों में खरपतवार नियंत्रण 

रबी दलहनों में मुख्य रूप से चना, मटर एवं मसूर की खेती की जाती है। इन फसलों में उगने वाले खरपतवारों को निम्न शाकनाशियो के प्रयोग से नियंत्रित किया जा सकता है। 
  • बुआई से पूर्व फ्लूक्लोरेलिन (बासलिन) 1000  ग्राम सक्रीय तत्व/हे.  की दर से मृदा में मिलाना चाहिए 
  • बुआई के बाद परंतु अंकुरण से पूर्व पेंडीमिथालिन (स्टाम्प)1000-1250 ग्राम सक्रिय तत्व/हे. की दर से छिकावे किया जा सकता है। 
  • मेट्रिब्यूजिन (सेंकर) 500  ग्राम सक्रिय तत्व/हे. बुआई के तुरंत बाद अथवा बुआई के 15-20 दिन बाद केवल मटर में खरपतवार नियंत्रण हेतु प्रयोग किया जा सकता है। 
  • क़्यूजालोफाप (टरगा सुपर) 50 ग्राम सक्रिय तत्व/हे की दर से बुआई के 25-30 दिन बाद छिड़काव करें।   

रबी तिलहनों में खरपतवार नियंत्रण 

रबी मौसम में सरसों, तोरिया और अलसी प्रमुख फसलें है। रबी मौसम उगने वाले  चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों में प्याजी, बथुआ, सेनजी, कृष्णनील, हिरनखुरी,सत्यानाशी, अकरी प्रमुख है।  संकरी पत्ती वाले खरपतवारों में गेंहू का मामा, जंगली जई तथा डूब घांस प्रमुख है।  इनके अलावा मोथा का भी प्रकोप बहुतायत में होता है। इन खरपतवारों के  नियंत्रण हेतु अधो लिखित खरपतवारनाशियों में से उपलब्धता के अनुसार 600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से सामान रूप से नेपसैक स्प्रेयर के साथ फ़्लैट फैन नोज़ल लगाकर सामान रूप से छिड़काव करना चाहिए। 
  • एलाक्लोर (लासो) 1000-1500 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई के तुरंत बाद  छिड़ककर मृदा में मिला देना चाहिए। 
  • फ्लूक्लोरेलिन (बासलिन) 1000 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई के पहले छिड़ककर भूमि में अच्छी प्रकार मिला देना चाहिए। 
  • पेंडीमिथालीन (स्टाम्प) 1000 ग्राम सक्रिय तत्व अथवा क्लोडिनाफाप (टॉपिक) 60 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई के बाद परंतु अंकुरण से पूर्व छिड़काव करना चाहिए। 
  • आइसोप्रोट्यूरॉन (ऐरीलान, धानुलान) 100 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से  बुआई के बाद परंतु अंकुरण से पूर्व छिड़काव करना चाहिए।
  • क़्यूजालोफोप (टरगा सुपर) 40 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से  बुआई के बाद परंतु अंकुरण से पूर्व छिड़काव करना चाहिए। 
  • चना + अलसी या चना + सरसों की अंतरवर्ती खेती में खरपतबार नियंत्रण हेतु  पेंडीमिथालीन (स्टाम्प) 1000 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई के बाद परंतु अंकुरण से पूर्व छिड़काव करना चाहिए।
  • गेंहू + सरसों या अलसी + मसूर की  अंतरवर्ती खेती में खरपतबार नियंत्रण हेतु आइसोप्रोट्यूरॉन (स्टाम्प) 1000 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर  की दर से छिड़काव करना चाहिए। 

गन्ना फसल में खरपतवार नियंत्रण

गन्ना  लगभग पूरे वर्ष भर की फसल है  इसलिए इसके खेत में  रबी, खरीफ और शायद ऋतू के खरपतवारो का प्रकोप होता है। गन्ने में खरपतवारों की समस्या  फसल की रोपाई से लेकर खरीफ ऋतु तक अधिक होती है। गन्ने में खरपतवार प्रतिस्पर्धा की क्रांतिक अवस्था बुआई के बाद 40-70 दिन के बीच होती है। गन्ने की पंक्तियों के बीच खली स्थान में गन्ने की सूखी पत्तियों अथवा धान के  पुआल  की 7-12 सेमि. मोटी तह बिछा देने से खरपतवार प्रकोप कम होता है। दो कतारों के मध्य खाली स्थान में कम अवधि और तेजी से बढ़ने वाली फसलों की अंतरवर्ती खेती करने से भी खरपतवार कम पनपते है। गन्ने की फसल में खरपतवार नियंत्रण हेतु निम्न उपाय अपनाये जा सकते है।

  • एट्राजिन (एट्राटॉफ) 2.0 -2.5 किग्रा. सक्रिय तत्व (भारी भूमि) तथा  1.0 -1.5 किग्रा. सक्रिय तत्व (हल्की भूमि) प्रति हेक्टेयर की दर से गन्ने की बुआई के बाद परंतु उगने से पहले छिड़कना चाहिए।
  • मेट्रिब्यूजिन (सेंकार) 1.0 -1.5 किग्रा. सक्रिय तत्व प्रति  हेक्टेयर की दर से बुआई के बाद परंतु उगने से पहले छिड़काव करने से संकरी पत्ती वाले खरपतवार कम उगते है।
  • चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार और मौथा के नियंत्रण हेतु 2,4-डी  1.5 -2.5 किग्रा. सक्रिय तत्व  प्रति हेक्टेयर की दर से गन्ने की बुआई के बाद परंतु उगने से पहले छिड़कना चाहिए। गन्ने की फसल में अंकुरण के बाद इस रसायन की 1.0 किग्रा प्रति हे. मात्रा प्रयोग करने से चौड़ी  पत्ती वाले खरपतवार जैसे पत्थरचटा, नोनिया, छोटा गोखरू आदि नियंत्रित रहते है।
  • डाईयूरान ( एग्रोमेक्स, कारमेक्स) की 2.5 -3.0  किग्रा. सक्रिय तत्व  प्रति हेक्टेयर की दर से गन्ने की बुआई के बाद परंतु अंकुरण  से पहले प्रयोग करने से खरपतवार नियंत्रण में रहते है।
  • पैराक्वाट (ग्रेमोक्सोन)  0.5-1.0  किग्रा. सक्रिय तत्व  प्रति हेक्टेयर की दर से  10-20 % गन्ना उगने पर प्रयोग करने से सभी प्रकार के खरपतवारों पर काबू पाया जा सकता है।
  • घांस कुल के खरपतवारों तथा मोथा  के नियंत्रण हेतु एलाक्लोर 2.0 -3.0  किग्रा. सक्रिय तत्व  प्रति हेक्टेयर की दर से गन्ने की बुआई के बाद परंतु  अंकुरण से पूर्व प्रयोग करना चाहिए।

नोट- उपरोक्त खरपतवारनाशियों की आवश्यक मात्रा को 600 लीटर पानी में घोल कर पार्टी हेक्टेयर की दर से समान रूप से छिड़कना चाहिए।

शाकनाशी रसायन  के इस्तेमाल में  सावधानियां

  • शाकनाशियों  के डिब्बों पर अंकित निर्देशों  के अनुसार ही खरपतवार नाशियों  का प्रयोग  करें । रसायन को कभी भी देखकर या सूॅंघ कर पहचान न करें क्योंकि  प्रत्येक शाकनाशी रसायन हाँनिकारक पदार्थ होता है ।
  • बुआई से पुर्व या बुआई के तुरंत बाद प्रयोग किये जाने वाले खरपतवार नाशियों को प्रयोग करते समय भूमि में पर्याप्त नमीं होनी चाहिए। 
  • शाकनाशी का प्रयोग तेज हवा रहने पर, अथवा तीव्र धूप के समय भी नहीं करना चाहिए । छिड़काव के समय वायु की दिशा पर भी ध्यान देना चाहिए।
  • छिड़काव करने वाले स्प्रेयर की कार्य क्षमता को छिड़काव से पूर्व चेक कर लेना चाहिए । यदि स्प्रेयर के छिद्र बन्द हों तो उसे मुंह से फूकंकर खोलने का प्रयास नहीं करना चाहिए ।
  • छिड़काव से पूर्व तथा छिड़काव के पश्चात स्प्रेयर को अच्छी प्रकार साफ कर लेना चाहिए तथा जिस स्प्रेयर से शाकनाशी का प्रयोग किया जा रहा है उससे बिना अच्छी प्रकार सफाई किए कीटनाशक या अन्य पदार्थो का छिड़काव नहीं किया जाना चाहिए।
  • शाकनाशी की संस्तुत मात्रा का उचित समय पर  प्रयोग करना चाहिए । संस्तुत मात्रा से कम मात्रा प्रयोग करने से वांछित खरपतवार-नियंत्रण नहीं होता तथा इससे अधिक मात्रा प्रयोग करने से फसलों पर कुप्रभाव पड़ सकता  है जिससे उपज कम होने की सम्भावना रहती है ।
  • फसलों मेें प्रयोग हेतु संस्तुत वरणात्मक शाकनाशी का ही प्रयोग किया जाए । संस्तुति के अतिरिक्त शाकनाशी का प्रयोग हानिकारक हो सकता है ।
  • छिड़काव के समय ध्यान देना चाहिए कि शाकनाशी के घोल का खेत में समान वितरण हो । 
  • छिड़काव कार्य समाप्त होने के पश्चात हाथ, मुँह साबुन से अच्छी तरह से धो लेना चाहिए। 
नोट: यह लेख सर्वाधिकार सुरक्षित है।  अतः बिना लेखक की आज्ञा के इस लेख को अन्यंत्र प्रकाशित करना अवैद्य माना जायेगा। यदि प्रकाशित करना ही है तो लेख में लेखक का नाम और पता देना अनिवार्य रहेगा। साथ ही प्रकाशित पत्रिका की एक प्रति लेखक को भेजना सुनिशित करेंगे।

शनिवार, 25 मार्च 2017

परम्परागत कृषि पद्धति उतेरा से अधिक उत्पादन

डॉ. गजेंद्र सिंह तोमर
प्राध्यापक (शस्य विज्ञान)
इंदिरा गाँधी कृषि विश्व विद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़)

भारत में फसलोत्पादन  की नाना प्रकार की  परंपरागत कृषि पद्धितियों की श्रृंखला में से  उतेरा या पैरा कृषि अथवा वेगबद्ध खेती  एक महत्वपूर्ण पद्धति है । आधार फसल अर्थात धान की कटाई से पूर्व अन्य फसल की बुवाई आधार फसल की खड़ी अवस्था में करना ही उतेरा कृषि पद्धति कहलाता है तथा अनुवर्ती फसल उतेरा फसल कहलाती है । इस कृषि प्रणाली का प्रमुख उद्देश्य ख्¨त में उपस्थित नमी का उपय¨ग अनुवर्ती उतेरा फसल के  अंकुरण  तथा पौध  वृद्धि के लिए करना है । छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों  में जहाँ की कृषि  का बड़ा हिस्सा वर्षा पर आधारित है।  यहाँ  सिंचाई के सीमित साधन  होने के कारण  धान कटाई के पश्चात रबी मौसम  में या तो ज्यादातर  खेत  परती पड़े रहते है या फिर कुछ खेतों  में उतेरा  पद्धति अपनाई जाती है जिसे वर्षा आधारित क्षेत्रों  में द्विफसली खेती  हेतु उपयोगी  विकल्प  कहा जा सकता है  । उतेरा कृषि पद्धति से प्रायः सभी किसान परिचित रहते है, परन्तु उससे जुड़े वैज्ञानिक पहलुओं  तथा आधुनिक सस्य क्रियाओं  के अभाव के कारण वे उतेरा फसल से काफी कम उत्पादन ले  पाते है । अतः प्रति इकाई उत्पादन वढ़ाने के लिए उतेरा खेती  की वैज्ञानिक विधियों  का व्यापक उपयोग  अत्यन्त आवश्यक है । आधार फसल की ब¨वाई के समय ही उतेरा फसल के लिए भी य¨जना बना ल्¨ना चाहिए । उतेरा खेती  से निम्नलिखित लाभ है:
  1. उतेरा कृषि से  सबसे बड़ा लाभ यही है कि रबी मौसम  में जो खेत परती पड़े  रहते  है उनका  समुचित उपयोग हो  जाता है  जिससे  क्षेत्र की फसल सघनता में भी वृद्धि होती है। 
  2. उतेरा कृषि अन्य दोहरी फसल  वाली  खेती की अपेक्षा सस्ती एवं सरल फसल पद्धति है ।
  3. इस पद्धति से धान की खेती के बाद बची  नमीं  का सदुपयोग हो जाता है ।
  4. सीमित संसाधनों  एवं कम लागत से ही रबी दलहन तथा तिलहनी फसलों  की अतिरिक्त उपज प्राप्त हो जाती है अर्थात अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त  होता है ।
  5. उतेरा कृषि के अन्तर्गत दलहनी फसलों की खेती से  मिट्टी में नत्रज़न स्थरीकरण से इस तत्व की उपलब्धता बढ़ जाती है, जिससे  किसान को  अनुवर्ती अन्य फसल की  खेती में नत्रज़न युक्त उर्वरकों की कम आवश्यकता पड़ती है। 
  6. तिलहनी  फसलों  से तेल के अलावा  खल्ली के रूप में कार्बनिक खाद भी प्राप्त हो जाती  है ।

भूमि का चुनाव
उतेरा खेती  के लिए भारी या मटियार दोमुट  मिट्टी उपयुक्त पायी गई  है । अतः उतेरा की सफल खेती के लिए मध्यम तथा निचली भूमि का चुनाव करना चाहिए । भारी मिट्टी में जल धारण क्षमता अधिक होती  है साथ ही काफी लम्बे समय तक  इस  मिट्टी में नमी बरकरार रहती है । ऊपरी या टांड़ भूमि उतेरा फसल के लिए उपयुक्त नहीं ह¨ती है क्योंकि  यह जल्दी ही सूख जाती है । उतेरा फसलों की बुआई  के समय खेत  में पानी का जमाव नहीं होना  चाहिए । पानी के जमाव से बीज सड़ जाने का खतरा रहता है । अतः खेती से  जल निकासी का प्रबन्ध कर लेना  चाहिए ।
फसल एवं किस्मों  का चयन
धान छत्तीसगढ की प्रमुख खरीफ फसल है जिसकी खेती मुख्यतः वर्षा पर आधारित है।  धान के बाद अधिकांश खेत परती छोड़ दिया जाते है या फिर उनमे उतेरा फसलो की खेती की जाती है।  निचली या मध्यम भुमिओं में लगाये गए  धान के खेतों में नमी रहने पर ही उतेरा फसलें अच्छी हो सकती है।   उतेरा के लिए  धान को  आधार फसल के रूप में लिया जाता है । उतेरा फसल के रूप में खेसारी (तिवड़ा), अलसी, मसूर, मटर, चना आदि का चुनाव किया जा सकता है ।आधार फसल (धान) की किस्म तथा प्रस्तावित अनुवर्ती उतेरा फसल के बीच समय का सामंजस्य अति आवश्यक है । दोनों फसलों  के बीच समय का तालमेल इस प्रकार से हो  कि हथिया नछत्र में  पड़ने वाली वर्षा का लाभ दोनों फसलों को मिल जावे  साथ ही उतेरा फसल वृद्धि एवं विकास के लिए पर्याप्त समय भी उपलब्ध हो जाए । अतः आधार फसल के लिए मध्यम अवधि वाली अर्थात 120 से 125 दिनों  में पकने वाली उन्नत किस्मों (जैसे चन्द्रहासिनी, इंदिरा राजेश्वरी, क्रांति, अभया, इंदिरा एरोबिक-1,कर्मा महसूरी आदि ) का  चयन करना चाहिए । लम्बी अवधि की आधार फसल का चुनाव करने से उतेरा फसल की  वृद्धि और विकास के लिए कम समय मिलता है तथा नमी के अभाव के कारण उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।
उतेरा फसलों की बीज दर
उतेरा फसल के लिए बीज दर उस फसल की  सामान्य अनुशंसित मात्रा  से डेढ़ गुना  अधिक रखना चाहिए ।उदाहरण के लिए अलसी की अनुशंसित बीज दर 20 किल¨ प्रति हेक्टेयऱ है । उतेरा ख्¨ती हेतु 20 किल¨ का डेढ़ गुणा अर्थात 30 किल¨ अलसी बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता ह¨गी । प्रति इकाई उत्पादन बढ़ाने के लिए उतेरा फसलों  की उन्नत किस्मों का  चुनाव आवश्यक है ।
आधार फसल धान तथा उतेरा फसलोन  की उन्नत किस्में तथा बीज दर
धान की किस्में उतेरा फसल एवं  किस्में बीज  दर (किग्रा/हे.)
एमटीयू-1010   खेसारी- रतन, प्रतीक,महा तिवड़ा  85
आईआर-36 अलसी-दीपिका, इंदिरा अलसी-32  30
आईआर-64 मसूर-नूरी,जे.एल.-3 45
महामाया चना इंदिरा चना-1, वैभव, जे.जी.-14 110
पूसा बासमती मटर पारस, विकास, अम्बिका   115

कब और  कैसे लगाएँ उतेरा 
उतेरा फसलों की समय पर बुआई करना आवश्यक है।  उचित समय से पहले या फिर विलम्ब से बुआई करने से उपज में गिरावट होती है।  अच्छी उपज के लिए धान फसल  में 50 प्रतिशत फूल आने के दो  सप्ताह बाद अर्थात अक्टूबर माह  के मध्य से नवम्बर के प्रथम सप्ताह के बीच उतेरा फसल की बुआई छिटकवां विधि से  करना चाहिए । बुआई के समय खेती  में अधिक  नमी नहीं रहना चाहिए अन्यथा उतेरा फसलों का  बीज सड़ सकता है  । खेत में नमी इतनी रहें कि बीज गीली मिट्टी में चिपक जाएं ।  अतः आवश्यकता से अधिक पानी खेत से बाहर  निकाल देना चाहिए अर्थात खेत  में जल निकासी का उत्तम प्रबन्ध आवश्यक होता है। 
खाद एवं उर्वरक
अन्य फसलों की भांति उतेरा के रूप में बोई जाने वाली दलहनी फसलों में खाद-उर्वरकों  की आवश्यकता होती है।  अच्छी उपज के लिए   यूरिया 6  किलो डीएपी 50   किग्रा. डी ए पी  तथा  15 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई के  समय देना चाहिए । अलसी या अन्य तिलहनी फसलों  में 25  किग्रा यूरिया  की अतिरिक्त  मात्रा  बुआई  के 20 दिन बाद देना लाभप्रद होता है  ।
खरपतवार प्रबंधन 
धान कटाई के 25-30 दिन बाद उतेरा फसल में एक निंदाई करना चाहिए । चना तथा खेसारी  जैसी उतेरा फसलो की परम्भिक  अवस्था के समय की शीर्ष शाखाओं की खुटाई कर भाजी के रूप में बाजार में बेच  देना चाहिए अथवा पशुओं को खिलाना चाहिए  । खुटाई करने से इनमें अधिक शाखाएँ बनती है जिससे उपज में बढ़ोत्तरी होती है।  अलसी में खरपतवार नियंत्रण  के लिए आइसोप्रोट्रोन  धूल (25 प्रतिशत) का छिड़काव बोआई के 15 दिन बाद करने से नींदा नियंत्रित रहते  है । दलहनी फसलों  में खरपतवार नियंत्रण  हेतु एलाक्लोर  50 ईसी का प्रयोग  बोआई  के 2 दिन बाद करना चाहिए  ।
पौध  संरक्षण
दलहनी फसलों  जैसे चना, मटर, मसूर, खेसारी  तथा तिलहनी फसल जैसे अलसी में उकठा रोग होने  पर उक्त खेत  में 2  से 3 साल तक इन फसलों  की खेती रोक  देनी चाहिए या फिर रोग रोधी किस्मों  का प्रयोग  करना चाहिए । मटर के फंफूदी रोग नियंत्रण  हेतु कैराथेन  (0.1 %) या सल्फेक्स (0.3 %) और डायथेन  एम-45 (0.2 %) के मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए । अलसी में गाल मीज का प्रकोप  तथा दलहनी फसलों  में फली छेदक से फसल सुरक्षा हेतु मिथाइल डिमेटान (10 मिली. प्रति 10 ली. पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए ।
उतेरा फसलों की  कटाई और उपज
आधार फसल यानि धान  की कटाई उतेरा फसल को  बचाते हुए सावधानी से करनी चाहिए । किसान भाई यदि आधार फसल धान जैसे ही उतेरा फसल की खेती  पर समुचित  ध्यान दें तो  निश्चित रूप से प्रति इकाई अधिकतम उपज ली जा सकती है । उतेरा खेती के मध्यम से  काफी कम लागत में  खेसारी से 7-10  क्विंटल, अलसी 6-8 क्विंटल, मसूर 2.5-3.5 क्विंटल, चना 3-5 क्विंटल, तथा मटर से 6-8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती  है ।

मंगलवार, 21 मार्च 2017

वृक्ष और वन सरंक्षण के लिए समर्पित विश्व वानिकी दिवस

डॉ.गजेंद्र सिंह तोमर,
प्राध्यापक (शस्य विज्ञान)
                 इंदिरा गाँधी कृषि विश्व विद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़)                

                 
          आज के  दिन यानि 21 मार्च को  हम लोग विश्व वानिकी दिवस मनाते है और भारत में यह परंपरा वर्ष 1950  से चली आ रही है।  दुनिया के सभी देश वन सम्पदा के महत्त्व को समझें  तथा  अपने अपने देश के वनों-जंगलों का सरंक्षण और वृक्षारोपण के प्रति जन जागरूकता अभियान चलाने के उद्देश्य से वानिकी दिवस का आयोजन किया जाता है । प्राक्रतिक संसाधनों में वनों का सबसे अधिक महत्व है और इसे पर्यावरण का महत्वपूर्ण घटक माना गया है।  वृक्षों से ही जल हैं, जल से  रोटी है और रोटी ही जीवन का प्रमुख आधार है। भारत की अमूमन 65 % कृषि भूमि असिंचित है अर्थात इतने बड़े भूभाग पर खेती-किसानी पूरी तरह  वर्षा जल पर निर्भर करती है।  बीते 10-15 वर्षों से भारतीय मानसून का मिजाज बदला बदला सा लगता है क्योकि प्रति वर्ष देश के अनेक राज्यों में या तो भारी सूखा-अकाल या फिर अनेक क्षेत्रों में किसान बाढ़ की बिभीषिका से झूझते नजर आते है।  दरअसल  आज सभी भारतीय हृदयों में असन्तोष भरा है। क्योंकि हमारे खाने को अन्न नहीं। हमारे पास अन्न नहीं है; क्योंकि पानी संग्रह करने की पुरानी पद्धति हम हस्तगत नहीं कर सके। हमारे पास पानी नहीं है, वर्षा अनिश्चित है; क्योंकि हमने  तरु-महिमा की कभी  परवाह नहीं की है । वृक्षों को हम काटने लगे। वृक्षारोपण आज कागजी कार्यवाही और  फैशन बन गया है, परन्तु उसमें जो धार्मिक श्रद्धा का तत्त्व था, वह अब देखने को नहीं मिलता है ।मानसून आगमन होते ही प्रति वर्ष वृक्षारोपण के विश्व रिकॉर्ड बनाए जाते है परंतु  वृक्षारोपण के बाद पेड़-पौधे पानी के आभाव में दम तोड़ देते है या फिर वो पशुओं का भोजन बन जाते है।  इसी वजह से  हमारे धरातल से हरियाली दिन प्रति दिन गायब होती जा रही है।   वृक्षों की अंधाधुंध कटाई के कारण जलवायु परिवर्तन,  वर्षा जल में गिरावट और अनिश्चितता,  भारी वर्षा के कारण मृदा अपरदन के परिणामस्वरूप भूस्खलन का होना, जैव विविधता में गिरावट, जंगली पशुओं का आबादी क्षेत्र में प्रवेश करना, प्राकृतिक पर्यटन में गिरावट, निचले क्षेत्रों में बाढ़ का पानी आने जैसे तमाम कारणों से देश का  जन जीवन अस्त व्यस्त हो जाता है और भारी मात्रा में आर्थिक क्षति भी भुगतना पड़ती है ।

वृक्षारोपण का महत्त्व और वनों से लाभ

      भारत के आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक क्षेत्रों में वन वृक्षों का विशेष महत्त्व है . महात्मा बुद्ध ने ‘पीपल वृक्ष’ के नीचे तपस्या करके ज्ञान प्राप्त किया था, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण आज भी बौद्ध गया में देखा जा सकता है।  हमारे चारे वेद  वनों में ही लिखे गए।  अग्निपुराण में वृक्षों की पूजा का महात्म्य बताया गया है, जिसके अनुसार जो मनुष्य लोगों के हित के लिये वृक्ष लगाता है, वह मोक्षपद प्राप्त करता है। वृक्ष लगाने वाला मनुष्य अपने 30,000 भूत और भावी पितरों को मोक्ष दिलाने में सहायक होता है। मत्स्यपुराण में कहा गया है—10 कुएँ बनवाना एक ताल बनवाने के समान है। 10 तालों का निर्माण एक झील के निर्माण के बराबर है। 10 झील बनवाना एक सुपुत्र प्राप्त करने के समान पुण्यकारक है। अग्निपुराण में कहा गया है- ‘दशपुत्रो समोद्रुमः’ अर्थात् दस पुत्र एक वृक्ष के समान हैं। इसीलिए जितने अधिक वन होंगे, उतना अधिक पर्यावरण सुरक्षित रहेगा। वास्तव में वन किसी भी देश की राष्ट्रीय  आय के मूल स्त्रोत होते है  क्योंकि वनों में छुपे बहुमूल्य खजाने से कोई भी राष्ट्र समृद्धशाली बन सकता है।  पर्यावरण सरंक्षण और जीवन दायिनी ऑक्सीजन और वर्षा जल देने के अलावा  वन हमें  कई प्रकार के उत्पाद प्रदान करते हैं जैसे फर्नीचर, घरों, रेलवे स्लीपर, प्लाईवुड, ईंधन या फिर चारकोल एव काग़ज़ के लिए लकड़ी,  प्लास्टिक, रेयान और नायलॉन आदि के लिए प्रस्संकृत उत्पाद आदि. फल और बिभिन्न प्रकार के मसाले भी वनों से एकत्र किए जाते हैं।   नाना प्रकार के औषधीय और सगंधीय  पौधे भी वनों में ही पाये जाते हैं । पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधे  रखती है और इस प्रकार वह भारी बारिश के दिनों में मृदा का अपरदन और बाढ भी रोकती हैं।  पेड़ वायुमंडल की कार्बन डाइ आक्साइड अवशोषित करते हैं और प्राणवायु ऑक्सीजन छोड़ते हैं जिसकी मानवजाति को सांस लेने के लिए जरूरत पड़ती है. वनस्पति स्थानीय और वैश्विक जलवायु को प्रभावित करती है. पेड़ पृथ्वी के लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं और जंगली जंतुओं को आश्रय प्रदान करते हैं. वे सभी जीव-जन्तुओ  को सूर्य की गर्मी  और वर्षा से बचाते हैं और पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करते हैं।  इन सब के अलावा वन प्रकाश की  परावर्तन घटाते हैं, ध्वनि को नियंत्रित करते हैं और हवा की दिशा को बदलने एवं गति को कम करने में भी  मदद करते हैं । अध्ययनों से ज्ञात होता है  की एक वृक्ष अपने  50 वर्ष के जीवन काल में अदृश्य रूप से 33.50 लाख रुपये मूल्य की अमूल्य सेवाएँ जैसे ऑक्सीजन उत्पादन, वायु शुद्धिकरण, वर्षा, मृदा सरंक्षण, पशु-पक्षिओं को आश्रय, प्रोटीन रूपांतरण, छाया, इंधन फल-फूल, ओषधियाँ आदि हमें प्रदान करता है।   एक अन्य अध्ययन के मुताबिक एक हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रति वर्ष ओसतन तीन मीट्रिक टन अशुद्ध वायु ग्रहण करता है तथा एक मीट्रिक टन शुद्ध वायु देता है । इसके  अतिरिक्त 70 मीट्रिक टन धुल को वृक्ष अपने पत्तों-टहनियो आदि पर रोक लेते है . इस प्रकार हम कह सकते है की वन पर्यावरण प्रदुषण के नियंत्रण में महत्वपूर्ण योगदान तो देते ही है साथ ही प्रथ्वी के जैव मंडल के लिए फेफड़ो की भूमिका भी बखूबी से निभाते है। 

देश में वन क्षेत्र की वर्तमान स्थिति 

                   भारत वन स्थिति रिपोर्ट-2013  के अनुसार  देश में कुल  वनावरण  69.79  मिलियन हेक्टेयर (697898  वर्ग किमी.) है जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 21.23 % है .  इसी रिपोर्ट के अनुसार कुला वनावरण और वृक्षावरण  का क्षेत्रफल 78. 92 मिलियन हेक्टेयर (789164 वर्ग किमी) बैठता है  जो कि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 24.01 %  है। भारत के राज्यों में क्षेत्रफल की दृष्टि से सर्वाधिक अभ्लिखित वन क्रमशः मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ तथा ओडिशा में है जबकि न्यूनतम क्रमशः गोवा, हरियाणा, पंजाब, सिक्किम तथा त्रिपुरा में है।  राज्यों/संघीय क्षेत्रों में भौगोलिक क्षेत्र के प्रतिशत की दृष्टि से सर्वाधिक अभिलिखित वन क्रमशः अंडमान निकोबार (86.93%), सिक्किम (82.31%), मिज़ोरम  (79.30%), मणिपुर (78.01), हिमाचल प्रदेश (66.52%)तथा उत्तराखंड(64.79%) में है।  हमारे  मध्य प्रदेश में 30.72% क्षेत्र में वन है जबकि छत्तीसगढ़  में कुल भौगोलिक क्षेत्र के 44.21% क्षेत्र में वन है , जो की राष्ट्रीय औसत से अधिक है।  वास्तव में देश और प्रदेशों में  घने प्राकृतिक वन घट रहे हैं और जो वृक्षारोपण हो रहा है, वह उतना प्रभावी नहीं कि घने वनों की कमी की भरपाई कर सके। इसलिए छितरा वन क्षेत्र बढ़ रहा है। सरकार ने वनों को तीन क्षेत्रों में विभाजित कर दिया है। अति सघन वन, मध्यम सघन वन तथा छितरे वन हैं। यद्यपि पहले की अपेक्षा  देश में कुल वन क्षेत्र बढ़ा है लेकिन घने और मध्यम स्तर के घने वन कम हुए हैं और छितरे वन ( कहीं -कहीं पेड़ और झाड़ियाँ )  बढ़ रहे हैं। ये प्रवृत्ति वनों के अंधाधुंध कटाई  की तरफ ईशारा करती है। अब छितरे वनों को घने वनों में परिवर्तित करने की आवश्यकता है  ।
कितने होंन चाहिए  वन क्षेत्र 
             राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार भू-भाग का 33.33  फीसदी हिस्सा वनों से आच्छान्दित होना चाहिए। लेकिन देश के 21.02 फीसदी हिस्से पर ही वन हैं। करीब 2.82 फीसदी भू भाग पर पेड़ हैं। यदि इन्हें भी वन मान लिया जाए तो देश का कुल वन क्षेत्रफल 23.84 फीसदी ही बैठता है। जो लक्ष्य से बेहद कम है। हां, उत्तराखंड, हिप्र, जम्मू-कश्मीर समेत पूर्वोत्तर के राज्यों में 33 फीसदी से अधिक हिस्से पर वन हैं। छत्तीसगढ़, उड़ीसा, गोआ ऐसे हैं जहां वन क्षेत्रफल 33 फीसदी से ज्यादा है। लेकिन विकास परियोजनाओं के चलते यहां भी वनों पर संकट मंडरा रहा है।

कड़ाई से पालन हो  वन सरंक्षण क़ानून

              देश में वन संरक्षण कानून  कड़ाई से पालन होना चाहिए । विकास या अन्य प्रयोजनों के लिए काटे गए वन क्षेत्रफल के एक तिहाई हिस्से की  भरपाई  वृक्षारोपण के माध्यम से होना चाहिए । वन संरक्षण हेतु प्रतिवर्ष उत्साह के साथ वन महोत्सव का आयोजन, वर्षा ऋतु में सामुदायिक वानिकी द्वारा नए छोटे पौधे रोपने, वनों को लगाकर वन क्षेत्रफल में वृद्धि करना और लोगों को वनों के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार कार्यक्रम व जागरूकता फैलाना ऐसे आवश्यक कदम उठाये जा सकते हैं।

आप भी करें वृक्षारोपण और पर्यावरण सरंक्षण में सहयोग  

             पर्यावरण सरंक्षण और वृक्षारोपण सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है।  इसमें देश के हर नागरिक का योगदान और भागीदारी होना चाहिए तभी हम स्वच्छ और सुन्दर धरा की कल्पना साकार होते देख सकते है।अपने बगीचे, खेतों, कल खरखानों, सार्वजनिक स्थानों पर ज्यादा से ज्यादा पेड़-पौधे लगाने के लिए आगे आये और लोगों को प्रेरित भी करें । हम सभी को अपने आवागमन के लिए  निजी वाहनों की बजाय पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग करना चाहिए । अपने बगीचे और सार्वजनिक स्थानों पर ज्यादा से ज्यादा पेड़-पौधे लगाएं। पानी का किफायत से उपयोग करें। पवन उर्जा, सौर उर्जा और जल उर्जा से चलने वाले उपकरणों को तरजीह दें। एयर कंडीशन और इस प्रकार की चीजों का कम से कम इस्तेमाल करें, क्योंकि इससे क्लोरो फ्लोरो कार्बन गैस उत्सर्जित होती है, जो वायुमंडल की ओजोन परत को काफी नुकसान पहुंचाती है। नदियों और अन्य जल स्त्रोतों को प्रदूषित न करें, उनमें कचरा न डालें। पॉलीथीन का इस्तेमाल बंद करें। इसकी जगह ईको-फ्रेंडली उत्पाद (कागज के थैले आदि) प्रयोग में लाएं।

शनिवार, 18 मार्च 2017

कुट्टू एक उत्कृष्ट अन्न और शक्ति का भण्डार

डॉ.गजेन्द्र सिंह तोमर
प्राध्यापक (शस्य विज्ञान)
इंदिरा गाँधी कृषि विश्व विद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़)
                कुट्टू (फेगोपाइरम एस्कुलेन्टम एल.) अनाज नहीं है, लेकिन यह अनाज की तरह ही प्रयोग किया जाता है। पोष्टिकता के हर मापदंड में यह गेहूं, चावल, मक्का आदि से उत्कृष्ट है। उत्तर भारत में  व्रत के समय  कुट्टू  के आटे की बनी चीज़ें खाते हैं, जैसे की कुट्टू  की पूरी और कुट्टू  के पकौड़े आदि । कुट्टू   को कहीं-कहीं  ऊगल व फाफर के नाम से भी जाना जाता हैं।  कुट्टू के आटे से चपाती, बिस्कुट, केक, नूडल्स आदि पौष्टिक खाद्य पदार्थ बनाए जा रहे है।  जापान में इससे बने नूडल्स को महत्वपूर्ण डिस माना जाता है, यहाँ तक जापानीस इंटरनेशनल फ्लाइट में यात्रिओं को नाश्ते में कुट्टू नूडल्स परोसे जाते है। पहाड़ी क्षेत्रों में कुट्टू से अनेक प्रकार के पेय पदार्थ और बियर, व्हिस्की आदि भी तैयार किये जाते है। 

कुट्टू का परिचय
          कुट्टू (बकव्हीट) का वानस्पतिक नाम फेगोपाइरम एस्कुलेन्टम एल. है जो की पोलीगोनेसी कुल का सदस्य है तथा कूट अनाज की श्रेणी में आता है।  यह सीधे बढ़ने वाला और पोले तने वाला वार्षिक पौधा है जिसमे एकांतर क्रम में त्रिकोड़ीय आकर की  पत्तिया होती है।  पौधों में  सफ़ेद रंग के फूल आते है। बीज सफ़ेद-भूरे रंग के त्रिकोड़िय आकर के होते है। 
पौष्टिकता और स्वास्थ्य दृष्टि से बेजोड़ फसल
                कूट्टू में गेंहूँ, चावल, मक्का और बाजरा में ज्यादा प्रोटीन होता है और इसमें लाइसीन और आरजिनीन नामक अमाइनो एसिड्स प्रचुर मात्रा में होता है जबकि अन्य मुख्य अनाजों में इनकी मात्रा बहुत कम होती है। इसमें ग्लूटीन नही होता है, अतः यह उनके लिए भी उत्तम भोजन है जिन्हें ग्लूटेन से एलर्जी है या सीलियक रोग है। इसमें अच्छे और संतुलित अमाइनो एसिड और भरपूर फाइबर होने के करण यह कोलेस्ट्रोल कम करता है और खून में ग्लूकोज की मात्रा को काबू में रखता है। अतः डायबिटीज और स्थूलता के रोगियों के लिए भी यह अच्छा आहार है। इसका शर्करा-सूचकांक  गेहूं, चावल, मक्का आदि से काफी कम हाता है। कूट्टू में विटामिन्स व खनिज-लवण जैसे जिंक, तांबा, मेंगनीज आदि प्रचुर मात्रा में होते हैं। इसमें मौजूद फैट्स में  मोनो-अनसेचूरेटेड वसा का प्रतिशत ज्यादा होता है जो हृदय के लिए लाभप्रद है, हालांकि इसमें अन्य अनाजों से कम फैट होते हैं। इसमें घुलनशील फाइबर अपेक्षाकृत अधिक होता है,   जो कोलेस्ट्रोल कम करता है और आंत के कैंसर से बचाता है। इसमें विशेष प्रकार का अधुलनशील स्टार्च भी होता है जो आंतों को स्वस्थ रखता है और रक्त में शर्करा के स्तर को काबू में रखता है। यह रक्तचाप, एल डी एल  कॉलेस्ट्रोल को कम करता है और स्थूलता कम करता है।  शोध परिणामों से ज्ञात हुआ है कि कूटू में फेगोपाइरीटोल नामक एक अनूठा कार्बोहाइड्रेट होता है जो रक्त-शर्करा के नियंत्रण में बहुत प्रभावशाली है। इस प्रकार सर्वगुण संपन्न कुट्टू को सुपर फ़ूड कहा जा रहा है।  
कृपया ध्यान रखें कुट्टू के दाने या आटा अधिक पुराना नहीं होना चाहिए। इन्हें किसी विश्वशनीय स्थान से ही ख़रीदे।  इसका आटा  ताजा पिसा होना चाहिए।  अधिक पुराना  अथवा मिलावटयुक्त आटा (10-12 दिन से अधिक) या दानों (एक वर्ष से अधिक) से बने खाद्य पदार्थ उपभोग करने से फ़ूड पोइज़निंग होने की संभावना हो सकती है।  इससे तैयार पदार्थो का दही के साथ सेवन भी हानिकारक हो सकता है। 
कुट्टू की खेती  के और भी है फायदे  
                 कुट्टू की खेती से  ना केवल पौष्टिक खाद्यान प्राप्त होगा वरन मधुमक्खी पालन के लिए  सर्वश्रेष्ठ साध्य फसल है।  कुट्टू एक पर परागित फसल है।  इसकी खेती के साथ साथ किसान भाई  मधुमक्खी पालन भी करते है तो कुट्टू फसल की उपज में बढोत्तरी होने के साथ साथ  उन्हें अतिरिक्त आमदनी मिल सकती है। मधुमक्खियाँ इसके  फूलों से  सर्वोत्तम किस्म का मधुरस  पैदा करती है।  भारत के उत्तरपूर्वी क्षेत्रों कुट्टू की मुलायम पत्तिओं का भाजी के रूप में प्रयोग किया जाता है, जो की पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक होती है।  कुट्टू के पौधे शीघ्रता से भूमि को ढँक लेते है। अतः मृदा क्षरण से प्रभावित क्षेत्रों में इसकी खेती फायदेमंद होती है। कुट्टू एक ऐसी फसल है जिसकी खेती समुद्र तल से 4500 मीटर की ऊँचाई तक सफलता पूर्वक की जा सकती है और इसलिए यह भारत के पहाड़ों में वसने वाले आदिवासिओ की प्रिय फसल है।  इसकी खेती पाकिस्तान, भारत, नेपाल, मैनमार के पहाड़ी इलाकों के अलावा चीन, जापान, कोरिया, ईरान और अफगानिस्तान में की जाती है।   भारत के पहाड़ी राज्यों विशेषकर अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर  राज्यों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।  छत्तीसगढ़ अंचल के सरगुजा-मैनपाट इलाके में भी कुट्टू की खेती प्रचलित है।  इसकी उपयोगिता को देखते हुए भारत के मैदानी क्षेत्रों  की उच्च्हन भुमिओं में इस फसल के क्षेत्राच्छादन  बढाने की आवश्यकता है।  अग्र वर्णित शस्य तकनीक के माध्यम से किसान भाई कुट्टू की फसल से अधिकतम उत्पादन और आर्थिक लाभ अर्जित कर सकते है। 
जलवायु और भूमि का चयन  
              कुट्टू फसल में पुष्पन और बीज विकसित होते समय  मध्यम ठंडी और नम जलवायु की आवश्यकता होती है।   शीघ्र तैयार होने और सभी प्रकार की मृदाओं में कुट्टू की सफल खेती की जा सकती है।  अतः  फसल विविधिकरण के लिए यह एक आदर्श फसल साबित हो सकती है  इसकी खेती उचित जल निकास वाली सभी प्रकार की भूमियों  में सरलता से की जा सकती है। अम्लीय एवं बंजर भूमि में भी इसकी खेती की जा सकेती है। खेत की 1-2 बार जुताई कर कुट्टू की बुआई की जा सकती है। 
बुआई का समय
            पहाड़ी क्षेत्रों में पानी की सुविधा होने पर इसकी बुआई मई-जून में की जा सकती है।  मैदानी क्षेत्रों में कुट्टू की बुआई मानसून आगमन के साथ अगस्त माह तक  की जा सकती है।   

बीज एवं बुवाई

           कुट्टू के पौधों के तने कमजोर होने के कारण फसल में  गिरने की समस्या आ सकती है . अतः खेत में पौध संख्या अधिक रखना चाहिए।   कुट्टू की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए  35-40  किलोग्राम बीज प्रति हैक्टर  की दर से प्रयोग करना चाहिए।  बुआई हल के पीछे अथवा पोरा विधि से  30 से.मी. की दूरी पर कतारों में कतारों में करना  चाहिए। उपयुक्त जलवायु और मृदा में पर्याप्त नमीं की  उपलब्धता होने पर कुट्टू के बीज बुआई के 4-5 दिन में अंकुरित हो जाते है। 

फसल का पोषण प्रबंधन

           उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना चाहिए । जहां भूमि की उर्वरता में कमी हो, वहां कुटटु की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए 50 किलोग्राम नत्रजन , 20  किलोग्राम फॉस्फोरस  एवं 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से बुआई के समय  प्रयोग करना चाहिए। कुट्टू की जैविक खेती के लिए उर्वरको के स्थान पर 4-5 टन गोबर की खाद खेत की अंतिम जुताई के समय खेत में मिलाने से अच्छी पैदावार ली जा सकती है। 

सिचाई और निराई- गुड़ाई

           कुट्टू की फसल में सूखा सहन करने की क्षमता होती है . वर्षा ऋतु की फसल होने के कारण फसल में सिचाई की आवश्यकता नहीं होती है।  कुट्टू फसल की बुआई के 20 दिन के अन्दर घने पौधों की छटाई (पौध विरलन) का कार्य संपन्न  कर  पौधे से पौधे के मध्य 10 सेमी. का अंतर कायम कर लेना चाहिए . खरपतवार प्रबन्धन के लिए आवश्यकतानुसार एक या दो गुड़ाई बुवाई के 20-40 दिन की अवधि में करना पर्याप्त होता है। दाना पड़ने की अवस्था के दौरान फसल की पक्षिओं से सुरक्षा करना आवश्यक होता है। 

उन्नत किस्में

           कुट्टू की देशी प्रजातियां देर से पकती है और उपज भी कम देती है।  उन्नत किस्मों से अधिक उपज प्राप्त होती है।  कुट्टू की प्रमुख उन्नत किस्मों का विवरण अग्र तालिका में प्रस्तुत है ;

कूटू की प्रजातियों की प्रमुख विशेषतायें
प्रजाति
पुष्पन का समय (दिन)
पकने का समय (दिन)
प्रोटीन की मात्रा (प्रतिशत)
औसत उपज (कुन्तल/हैक्टेयर)
वी. एल.- 7
34
72
10.8
8.0
हिमप्रिया
60
113
9.2
14.0
पी. आर. बी- 1
48
102
11.4
18.0


कटाई एवं उपज

            अपरमित बढ़वार वाले पौधे होने की वजह से  इस फसल के दाने एक साथ नहीं पकते हैं।  इसलिए दानों को झड़ने से बचाने के लिए विभिन्न अन्तराल में फसल की कटाई करें अथवा जब फसल में लगभग 80 प्रतिशत दाने पक जाने की स्थिति में फसल की कटाई करनी चाहिए। देर से कटाई करने पर दानों के झड़ने का अंदेशा रहता है और अधिक परिपक्व फसल के दाने नमीं के संपर्क में आने से उनमें अंकुरण प्राम्भ हो सकता है जिससे दानों की गुणवत्ता खराब होती है।  अतः फसल की कटाई सही वक्त पर करना आवश्यक है . फसल को काटने के बाद दो- चार दिन तक सूखाकर गहाई-मड़ाई करनी चाहिए। शीघ्र पकने वाली किस्मों से 7-10 कुन्तल प्रति हैक्टेयर तथा व देर से पकने वाली किस्मों  से 10-12  कुन्तल प्रति हैक्टेयर तक उपज प्राप्त हो जाती है।
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काबुली चने की खेती भरपूर आमदनी देती

                                                  डॉ. गजेन्द्र सिंह तोमर प्राध्यापक (सस्यविज्ञान),इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि महाव...