गुरुवार, 16 मार्च 2017

बेबी कॉर्न का वादा कम समय में अधिक फायदा

डॉ.गजेंद्र सिंह तोमर,
प्रमुख वैज्ञानिक (शस्य विज्ञान) 
इंदिरा गाँधी कृषि विश्व विद्यालय, रायपुर  (छत्तीसगढ़)
         
          मक्का एक महत्वपूर्ण लोकप्रिय खाद्य फसल है जिसका  मानव ,पशु और पक्षिओं की खाद्यान्न सुरक्षा में विशेष योगदान है। उच्चतम आनुवंशिक उत्पादन क्षमता के कारण मक्का को विश्व में खाद्यान्न फसलों की रानी का ख़िताब प्राप्त है । भारतवर्ष में   धान व गेंहूँ   के बाद मक्का सबसे अधिक क्षेत्रफल ( लगभग 9.3 मिलियन हैक्टयर) में बोई जाती है जिससे 23.70 मिलियन टन उत्पादन प्राप्त होता है।  इसका उपयोग मानव आहार (25%), मुर्गी आहार (25%), पशु आहार (12%), स्टार्च (2%) एवं बीज (2%) के रूप में किया जा रहा है।  मक्का एक ऐसी फसल है जिसे विभिन्न परिस्थितिओं, जलवायु, मृदा आदि में वर्ष के हर मौसम में सफलता पूर्वक उगाया जा सकता है।  मक्का न केवल विभिन्न परिस्थितिओं में उगाई जाने वाली फसल है वरन यह विविध उपयोगों जैसे दाना, भुट्टा, क्वालिटी प्रोटीन मक्का, स्वीट कॉर्न, बेबी कॉर्न, पॉप कॉर्न तथा चारा आदि के लिए उगाया जा रहा है। आमतौर पर  शहरों के इर्द-गिर्द मक्के की खेती हरे भुट्टो के लिए की जाती है।  कम समय में अधिक आय अर्जन के लिए बेबी कॉर्न की खेती किसानों की आत्मनिर्भरता और रोजगार के लिए उत्तम विकल्प हो सकता है।

क्या है बेबी कॉर्न ?

                  बेबी कॉर्न मक्का फसल का अंगुलिका आकार  का एक अनिषेचित भुट्टा होता है जो सिल्क (भुट्टा के ऊपरी भाग में 2-3 सेमी. आयी रेशमी कोपलें) आने के 2-3 दिन के अन्दर पौधे  से तोड़ लिया जाता है।  इस अवस्था में दाने अनिषेचित (अनफर्टिलाइज्ड ) होते हैं।  अच्छे बेबी कॉर्न लंबाई 6-10 सेमी., व्यास 1-1.5 सेमी तथा रंग हल्का पीला होना चाहिए।   बेबी कॉर्न की पौष्टिकता कुछ मौसमी सब्जिओ के समतुल्य या उनसे भी अच्छी होती है. प्रोटीन, विटामिन तथा लौह के अलावा यह फॉस्फोरस का एक बेहतर स्त्रोत है।  रेशेदार प्रोटीन का भी अच्छा स्त्रोत है जो आसानी से पच जाता है।  बेबी कॉर्न का उपयोग सलाद, अचार, भजिया-पकोड़े, सूप,सब्जी, खीर आदि बनाने में किया जाता है। 
बेबी कॉर्न फसल की खेती से लाभ 

1.फसल विविधिकरण  अल्पावधि में (50-60 दिन) तैयार होने के कारण फसल विविधिकरण के लिए यह एक आदर्श  फसल है।  बेबी कॉर्न के साथ सब्जिओं, दालों, फूलों आदि की अन्तः फसली खेती आसानी से की जा सकती है। उत्तरी भारत के अत्यधिक ठण्ड वाले समय (दिसम्बर-जनवरी) को छोड़कर बेबी कॉर्न को  साल भर उगाया जा सकता है I यह शहरी क्षेत्र के आसपास उगाये जाने के लिए उपयुक्त है। 
2.रोज़गार सृजन : बेबी कॉर्न के उत्पादन, विपणन, प्रसंस्करण और निर्यात की प्रक्रिया में बहुत से लोगो को रोज़गार प्राप्त होता है। 
3. कम समय में धनोपार्जन : सामान्यतः किसानो को फसल से आय प्राप्त करने के लिये लंबे समय तक इंतज़ार करना पड़ता हैI बेबी कॉर्न एक अल्प अवधी(50-60 दिन) वाली फसल हैI अतः किसान कम से कम समय में अधिक आय प्राप्त कर सकते हैं। पंच  सितारा होटलों, शादी-विवाह समारोहों और पार्टियों में बेबी कॉर्न उत्पादों की अच्छी मांग रहती है अतः बाजार में बेबी कॉर्न सर्वोत्तम दामों में बिक जाती है।   
4. निर्यात की संभावनाएँ : अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बेबी कॉर्न की बहुत मांग है, अतः अधिक मात्रा में गुणवत्ता युक्त पैदावार का निर्यात कर अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। 
5. पशुओं के लिए उत्तम चारा : बेबी कॉर्न की फसल लेने के पश्चात् इससे प्राप्त हरे चारे को पशुओं के खीलाया जा सकता है I इसका हरा चारा खिलाने से दुग्ध उत्पादन में बढोत्तरी होती है। 
6. मूल्य संवर्धन : बेबी कॉर्न से नाना प्रकार के व्यंजन यथा सब्जी, आचार, चटनी, सूप, सलाद, खीर, हलवा, पकौड़ा, केंडी  इत्यादी बनाये जा सकते है  जिनकी सितारा होटलों में अच्छी मांग होती है।
                     बेबी कॉर्न की फसल से अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए शस्य कार्य 
उपयुक्त भूमि और खेत की तैयारी 

               बेबी कॉर्न की खेती उचित जल निकास वाली बलुई मटियार से दोमुट मृदाओं  जिसमे वायु संचार अच्छा हो और पी एच मान 6.5-7.5 के मध्य हो, में सफलता पूर्वक की जा सकती है। इसकी खेती के लिए मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई करने के उपरांत एक बार कल्टीवेटर से जुताई करें।  अंत में  पाटा  चलाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए।  आज कल शून्य भू परिष्करण पद्धति से भी मक्के की खेती की जा रही है।

सही क़िस्मों का चुनाव

              मध्यम ऊँचाई की जल्दी तैयार होने वाली किस्म/प्रजाति एवं एकल क्रास संकर का चयन करना चाहिए, जिनकी सिल्किंग अवधि खरीफ में 45-50 दिनों, वसंत में 75-80 और उत्तरी भारत की शीत ऋतू में 100-120 दिन हो  | बेबी कॉर्न की खेती के लिए एचएम-4, गंगा सफेद-2, पूसा अर्ली हाइब्रिड मक्का-3, वही.एल.-1  व पूसा अर्ली हाइब्रिड मक्का-5 आदि किस्मों का इस्तेमाल करें। निजी कंपनियों के प्रमाणित बीजों को भी उगाया जा सकता है। 

बुवाई का समय
                 उत्तर भारत में दिसम्बर एवं जनवरी महीनों को छोड़ कर  बेबी कॉर्न की बुवाई वर्ष भर की जा सकती है | आमतौर पर खरीफ में जून के अंतिम सप्ताह से लेकर मध्य जुलाई, रबी में अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से मध्य नवम्बर तथा वसंत ऋतू में जनवरी के प्रथम सप्ताह में बुआई करना उचित रहता है।  आमतौर पर अगस्त से नवम्बर के बीच लगाई गई फसल के बेबी कॉर्न गुणवत्ता में  श्रेष्ठ होते है।  दक्षिणी भारत और छत्तीसगढ़ में इसे वर्ष भर  उगाया जा सकता है पूरे खेत में एक साथ बेबी कॉर्न की बुवाई न करें। बल्कि, 15 -15  दिन के अंतराल पर बुवाई करें। उदाहरण के लिए यदि आप  दो  एकड़ में बेबी कॉर्न की खेती करना चाहते हैं, तो पहली बार में एक  एकड़ जमीन में बुवाई करें, बाकी जमीन के दो भाग कर 15 दिन के अंतराल से  बुवाई करें। अलग अलग समय में  बेबी कॉर्न तैयार होने से फसल का  बाजार में अच्छा भाव मिलता है।  इस प्रकार बाजार में बेबी कॉर्न की माँग के समय को ध्यान में रखते हुए बुवाई की जाए तो इस फसल से अधिक लाभ प्राप्त हो सकता है।

बीज दर एवं बीजोपचार

           बेबी कॉर्न की किस्म/प्रजाति के दानों  के वजन के अनुसार लगभग 22-25   कि॰ ग्रा॰ प्रति हेक्टेयर बीज का प्रयोग करना चाहिए।  मक्का की फसल को टी॰एल॰ बी॰एम॰ एल॰ बी॰बी॰ एल॰ एस॰ बी॰ आदि बीमारियों से बचाने हेतु  बुवाई से पहले  बीज को  एक ग्रा॰ बावीस्टीन तथा एक ग्रा॰ केप्टान मिला कर उपचारित करना चाहिए।  रसायन उपचारित बीज को छाया में सुखाना चाहिए।  तना भेदक (शूट फ्लाई) से बचाव के लिए फिप्रोनिल 4-6 मि॰ ली॰/ कि॰ ग्रा॰ बीज में मिलाना चाहिए।

बुवाई की सही विधि  

              बेबी कॉर्न की अच्छी उपज के लिए अनुकूल पौध संख्या स्थापित होना नितांत आवश्यक होता है। छिड़कवाँ विधि से बीज की बुआई करना फायदेमंद नहीं रहता है।  बीज की बुवाई  समतल खेत में कतार विधि से करना चाहिए। उचित पादप संख्या स्थापित करने के लिए उठे हुए बेड पर इसकी बुआई करना सर्वथा उचित रहता है। इसमें बीज की बुआई नियमित दूरी पर बेड पर की जाती है। बुआई के लिए रेज़्ड बेड प्लांटर उपलब्ध है।  इस विधि से बुआई करने पर पानी की वचत होती है और आदान उपयोग क्षमता में 20-25 % की वचत होती है। इसके अलावा बिना किसी जुताई (शून्य जुताई विधि) के भी सीधे प्लान्टर से भी  मक्के की बुआई की जा सकती है।पौधों के आकर के हिसाब से पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 से॰ मी॰ तथा पौधे से पौधे के मध्य  15-20 से॰ मी॰  दूरी रखना चाहिए।

सही उपज के लिए संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन  
            मक्के में उर्वरक उपयोग जमीन की उर्वरा शक्ति तथा  मृदा परीक्षण के आधार पर करना चाहिए   अच्छी उपज के लिए खेत की अंतिम जुताई के समय  सड़ी हुई गोबर की खाद  8-10 टन/हे॰ को मिटटी में मिलाना  चाहिए। समान्यतौर पर 150-180: 60:60 :25  कि॰ ग्रा॰/हे. की दर से क्रमशः   नत्रजन:स्फुर:पोटाश तथा जिंक सल्फेट का प्रयोग करना चाहिए।   सम्पूर्ण फास्फोरस, पोटाश, जिंक एवं 10% नाइट्रोजन की मात्रा बुवाई के समय कूंड  में डालना चाहिए। नाइट्रोजन की शेष मात्रा को चार किस्तों  में अर्थात, 4 पत्तियों की अवस्था में 20%,  8 पत्तियों की अवस्था में 30%,  नर मंजरी (झंडो)को तोड़ने से पहले 25% तथा  नर मंजरी को तोड़ने के बाद 15% प्रयोग करने से उर्वरक उपयोग क्षमता और उपज में बढोत्तरी होती है।

समय पर सिचाई  
             मक्का की फसल को मौसम, फसल की अवस्था तथा मिट्टी के अनुसार सिंचाई की जरूरत होती है।  पहली सिंचाई युवा पौध की अवस्था, दूसरी पौधों  के घुटने तक  ऊंचाई के समय, तीसरी फूल (झण्डा) आने से पहले तथा चौथी सिचाई  तुड़ाई के ठीक पहले करना  चाहिए।  वर्षा ऋतु में सिचाई की आवश्यकता नहीं होती है परंतु खेत से जल निकासी का  समुचित प्रबंध जरूरी है। 

खरपतवार प्रबंधन 

             बेबी कॉर्न की अधिकतम उपज के लिए खरपतवार प्रबंधन एक आवश्यक घटक है।  खरपतवारों की समय पर रोकथाम नहीं करने से उपज में 30-40 % तक कमी आ।    बेबी कॉर्न की फसल की उचाई  घुटनों तक हो जाये तो एक बार हेंड हो  से  निराई गुड़ाई कर पोधो पर मिटटी चढ़ाने का कार्य  करना चाहिए।  इससे खरपतवार नियंत्रित होते है और फसल गिरने से बच जाती है।  खेत में खरपतवार उगने के पूर्व  एट्राजिन (एटाट्राफ)  1.0-1.5 किग्रा॰/ हे. की दर से 500-600  ली॰ पानी मे घोलकर छिड़काव करने से अधिकतर  चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों की रोकथाम हो जाती  है।  छिड़काव करने वाले व्यक्ति को आगे के बजाय पीछे की ओर बढ़ना चाहिए ताकि मृदा में बनी एट्राजीन की परत को क्षति ना पहुंचे।  जरुरत पड़ने पर 1-2 बार खुरपी से गुड़ाई कर देने से बाकी बचे हुए खरपतवारों की रोकथाम हो जाती है।

अंतः फसली खेती से अतिरिक्त आय 
  
              अन्तः फसल से बेबी कॉर्न की उपज पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है, बल्कि दलहनी अन्तः फसलें मृदा उर्वरता को बढ़ाती है | खरीफ मौसम में बेबी कॉर्न के साथ लोबिया, उड़द, मूँग,ग्वारफली  आदि फसलें  उगाई जा सकती है | रबी के मौसम में आलू, मटर, राजमा, चुकन्दर, प्याज, लहसुन, पालक, मेथी, फूलगोभी, पत्ता गोभी, ब्रोकली, शलजम, मूली, गाजर, राजमा, हरी प्याज आदि फसलें  ली जा सकती है ग्रीष्म ऋतु  में बेबी कॉर्न के साथ  लोबिया, गुआरफली, मुंग, उर्द आदि को उगाया जा सकता है।

गुणवत्ता के लिए आवश्यक है नर मंजरी निकलना 
  
             बेबी कॉर्न की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए नर मंजरियों को निकालना  (डिटेसलिंग) एक अनिवार्य प्रक्रिया है। पौधों की सबसे ऊपरी पत्ती (फ्लेग लीफ) से झण्डा बाहर दिखाई देते ही इसे तुरंत निकाल देना चाहिए | पौधो से अलग की गई नर मंजरियां पोष्टिक चारा होती है अतः इन्हें  पशुओं को खिलाना चाहिए।  ध्यान रखे नर मंजरियां हटाते समय  पौधों से पत्तों को नहीं हटाना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जिसके कारण उपज में गिरावट आ सकती है।

सही अवस्था पर करें तुड़ाई  

              बेबी कॉर्न की तुड़ाई सही समय पर करना आवश्यक होता है। देर से बुआई करने से भुट्टों की गुड़वत्ता ख़राब हो जाती है। यह फसल खरीफ में लगभग 50-60 दिनों रबी (शीत ऋतू) में 80-100    दिनों तथा जायद (वसंत) में 60 -70  दिनों में तैयार हो जाता है शिशु  भुट्टे  (गुल्ली) को 2-3 सेमी॰ रेशमी कोपले (सिल्क) आने पर तोड़ लेनी चाहिए। भुट्टा तोड़ते समय उसके ऊपर की पत्तियों को नहीं हटाना चाहिए।   पत्तियों को हटाने से ये जल्दी  खराब हो जाती है। खरीफ़ में प्रतिदिन एवं रबी में एक दिन के अन्तराल पर सिल्क आने के 1-3 दिन के अन्दर भुट्टे की तुड़ाई कर लेनी चाहिए। एकल क्रॉस संकर मक्का में 3-4 तुड़ाई जरूरी होती  है।  पौधे के निचले भाग में आई गुल्ली तुड़ाई के लिए पहले तैयार हो जाती है।

उपज एवं रखरखाव  

            बेबी कॉर्न की उपज बोई  गई  क़िस्मों की उत्पादन क्षमता, सस्य प्रबंधन  एवं मौसम पर निर्भर करती है | एक अच्छी फसल से औसतन 50  से 100  क्विंटल/हे. (छिलका सहित बेबी कॉर्न) या 12-18 क्विंटल/हे. (छिली हुई बेबी कॉर्न) की उपज प्राप्त हो सकती है।  इसके अतिरिक्त 150-400 क्विंटल/हे. हरा चारा भी प्राप्त होता है। 
                 बेबी कॉर्न तुड़ाई के बाद शिशु भुट्टो से छिलका उतार लेनी चाहिए।  यह कार्य छायादार और हवादार स्थान पर करना चाहिए। बेबी कॉर्न का भंडारण ठन्डे स्थान पर करना चाहिए। छिलका उतरे  हुए बेबी कॉर्न को कभी भी ढ़ेर लगा कर नहीं रखना चाहिए, बल्कि प्लास्टिक की टोकनी ,थैला या अन्य कन्टेनर में रखना चाहिए। बेबी कॉर्न को तुरंत मंडी या संसाधन इकाई (प्रोसेसिंग प्लान्ट) में पहुँचा देना चाहिए। मृदा एवं जलवायु के आधार पर किसान भाई एक वर्ष में बेबी कॉर्न की 3-4  फसलें आसानी से  ले सकते है।
बेबी कॉर्न फसल का आर्थिक विश्लेषण  (प्रति हेक्टर)
माना की बेबी कॉर्न की खेती में  लागत मूल्य- रु.25 ,000/-हे. आता है। 
बेबी कॉर्न शिशु भुट्टा की  उपज-14  क्विंटल/हे., चारा उपज-200  क्विंटल/हे. प्राप्त होती है। 
माना की बाजार में  शिशु भुट्टा 50 रुपये प्रति किलो और हरा चारा 1.5 रुपये प्रति किलो की दर से बेचा जाता है तो 
कुल प्राप्तियां : 70,000/- बेबी कॉर्न और  30 000/- हरे  चारे से मिलते है। 
शुद्ध लाभ = कुल प्राप्तियां-लागत मूल्य (100000 -25000=75000 )
इस प्रकार एक फसल से लगभग  75000/- रुपये प्रति हेक्टर का शुद्ध लाभ  संभावित है। 
एक साल में बेबी कॉर्न की तीन  फसल लेने पर प्रति हेक्टर लगभग 225 000  रु॰ (दो लाख पच्चीस हज़ार) शुद्ध आमदनी प्राप्त की जा सकती है।   बेबी कॉर्न के साथ लोबिया या ग्वार फली की अन्तः फसली खेती करने से अतिरिक्त आमदनी अर्जित की जा सकती है। 
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कृषि में प्लास्टिक मल्चिंग से प्रभावी पौध सरंक्षण

डॉ.गजेंद्र सिंह तोमर
प्रमुख वैज्ञानिक (शस्य विज्ञान)
इंदिरा गाँधी कृषि विश्व विद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़)
भारत में बसने वाली दुनिया की 17.84 प्रतिशत आबादी की आवश्यकता 2.4 प्रतिशत जमीन और 4 प्रतिशत जल संसाधनों से पूरी होती है।  देश के कई क्षेत्रों में विषम जलवायु,मानसूनी वारिश की अनियमितता से  जल स्त्रोतो की कमी तथा विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं जैसे- सूखा, बाढ़, पालाओला आदि के कारण हमारी खाद्यान्न सुरक्षा खतरे में पड़ती जा रही है  । अब हमें प्राकृतिक संसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग करते हुए खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए आधुनिक तकनीक का प्रयोग करना चाहिए। कृषि में  प्लास्टिक मल्चिंग  भारत में दूसरी हरित क्रांति शुरू करने के लिए एक साध्य समाधान है। पानी की कमीं, कीट-रोग और खरपतवार प्रकोप के कारण फसल उत्पादकता में गिरावट होती जा रही है। कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए दिन प्रति दिन जहरीले रासायनिकों का उपयोग किया जा रहा है जो न केवल मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है वल्कि पर्यावरण के लिए भी घातक हो रहे है। मृदा में नमी सरंक्षण, सिचाई जल का किफायती उपयोग, खरपतवार, कीट रोग नियंत्रण के लिए प्लास्टिक मल्चिंग का उपयोग वरदान साबित हो रहा है। कृषि और उद्यानिकी में प्लास्टिक मल्चिंग के अनुप्रयोग से भारतीय कृषि में  द्वितीय हरित क्रांति का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। 

पेड़-पौधों के आसपास की मिट्टी को प्लास्टिक फिल्म से व्यवस्थित रूप से ढकने की क्रिया को मल्चिंग कहते है। वास्तव में प्लास्टिक मल्चिंग पौधों के चारों तरफ की भूमि को ढकने में प्रयोग की जाने वाली एक प्लास्टिक फिल्म होती है जो की फसलों, सब्जियों, फलों आदि की समुचित वृद्धि, विकास एवं उत्पादन हेतु पौधो को अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराने के अलावा पौधो की जड़ों के आस पास विद्यमान सूक्ष्म जलवायु और मिट्टी के तापमान में समन्वय स्थापित करने में मददगार साबित हो रही है।  दरअसल मल्चिंग से मिट्टी में नमीं सरंक्षण, तापमान में वृद्धि  और माइक्रोबियल सक्रियता  बढती है जिसके फलस्वरूप फसल उत्पादन और गुणवत्ता में इजाफा होता है।  वर्तमान समय में कार्बनिक पलवार की बड़ी मात्रा में आसानी से उपलब्धता नहीं होने तथा ज्यादा लागत की वजह सेप्लास्टिक पलवार का उपयोग एक बेहतर  वि‍कल्प सिद्ध हो सकता है। प्लास्टिक मल्च  सस्तीआसानी से उपलब्ध एवं सभी  मोटाई व रंगों में उपलब्ध होती है। मिट्टी से नमी के वाष्पीकरणपानी का कम उपयोग और मिट्टी कटाव को रोकती है। इस प्रकार पलवार जल सरंक्षण में एक सकारात्मक भूमिका निभाती है तथा पैदावार बढ़ाने में मदद करती है।
प्लास्टिक मल्च के फायदे 
Ø   मृदा नमी संरक्षण में सहायक: मृदा नमी का सबसे अधिक ह्रास वाष्पोत्सर्जन द्वारा होता है।  प्रति इकाई अधिकतम उत्पादन लेने के लिए मिट्टी में नमी सरंक्षण आवश्यक होता है।  प्लास्टिक मल्च जल एवं  वायु रोधी होती है।  मिट्टी की नमी का जब वाष्पोत्सर्जन होने पर पानी की बूंदे मल्च की अंदरूनी सतह पर जमा हो जाती है जो की पौधो को पुनः प्राप्त हो जाती है, जिससे सिचाई जल की वचत होती है। 
Ø  प्लास्टिक मल्च से  रात्रि के समय भी भूमि में उष्ण तापक्रम कायम रहता है जिससे बीज अंकुरण और नवोदित  पौधों  की जड़ो का विकास शीघ्रता से होता है। 
Ø  अपारदर्शक (काली) प्लास्टिक मल्च सूर्य के प्रकाश को भूमि की सतह तक जाने से रोकती है, जिससे प्रकाश संश्लेषण नहीं होने के कारण खरपतवार  वृध्दि  अवरुद्ध  हो जाती है। 
Ø  प्लास्टिक मल्च से भूमि और मल्च के मध्य एक सूक्ष्म वातावरण स्थापित होता है जिससे सुक्ष्मजीवियो की सक्रियता बढ़ने से कार्बन डाई ऑक्साइड का स्टार बढ़ जाता है जिसके फलस्वरूप पौधो में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया तेजी से होती है। 
Ø   वर्षा और हवा के कारण होने वाले  मृदा क्षरण को रोकने में  प्लास्टिक मल्च सहायक होती है
Ø  प्लास्टिक मल्च मृदा नमी के वाष्पोत्सर्जन को रोककर भूमि लवणों को भू-सतह पर आने से रोकती है। 
  • Ø  प्लास्टिक मल्च के प्रयोग से फसल उत्पादन और उत्पाद की गुणवत्ता में वृद्धि होती है। 
  •                               विभिन्न फसलो के लिए उपयुक्त पलवार का उपज पर प्रभाव


क्र.स.
फसल
पलवार मोटाई (माइक्रोन)
उपज में वृध्दि (प्रतिशत)
1
आलूबैंगनशिमला                   मिर्च
25
30-40
2
टमाटरफूलगोभी
25
40-45
3
मूंगफली
07
60-70
4
गन्ना
50
50-55
5
अमरुद
100
25-30

                                          प्लास्टिक मल्च के प्रकार  

प्लास्टिक मल्च  विभिन्न रंगो जैसे- काले, पारदर्शी, पीला/ काला, सफेद/काला, काला/लाल पलवार बाजार में उपलब्ध है ।
1.पारदर्शी मल्च: पारदर्शी मल्च में सूर्य का प्रकाश भू-सतह तक पहुँचता है. अतः इसके माध्यम से तापीय उपचार द्वारा मृदा जनित रोगों एवं बीज जनित खरपतवारो पर काबू पाया जा सकता है. पौध शाला में इस मल्च के प्रयोग से रोग रहित शत प्रतिशत अंकुरण प्राप्त किया जा सकता है। 
2. काली मल्च: काली प्लास्टिक मल्च खरपतवार नियंत्रण के लिए बहुत उपयोगी है  क्योंकि अपारदर्शी होने के कारण सूर्य का प्रकाश भू-सतह तक नहीं पहुँचने से पौधो में प्रकाशसंश्लेषण की क्रिया नहीं हो पाती है जिससे  फिल्म के नीचे उगने वाले खरपतवार नष्ट हो जाते है। 
3. सफ़ेद-काली मल्च: यह मल्च भूमि को अनुकूल तापक्रम प्रदान करने के साथ साथ कुछ कीड़ो जैसे एफिड और थ्रिप्स को प्रतिकर्षित यानि भगाने का कार्य करती है .
4. पीली-काली मल्च: यह मल्च  अधिक गर्म दिनों में  भूमि को उच्च तापक्रम से सुरक्षित कर  अनुकूल तापक्रम प्रदान करती है जिससे फसल वृद्धि अच्छी होती है। 
5. लाल-काली मल्च: यह एक अर्द्ध पारदर्शी (धुंधली) मल्च है जो सूर्य के प्रकाश को अवशोषित कर भूमि का तापक्रम बढ़ाने के अलावा सूर्य प्रकाश को परावर्तित कर पौधों की नीचे की पत्तियों को सूर्य प्रकाश उपलब्ध करने में सहायक होती है, जिससे पौधो की बढ़वार, पुष्प और फल निर्माण शीघ्रता से और  अधिक मात्रा में होता  है. 
6. द्वि तरफ़ा रंगीन मल्च: इस प्रकार की मल्च में बाहरी परत द्वारा सूर्य का प्रकाश प्रवेश करता है तथा अन्दर की परत द्वारा विशेष तरंग दैर्ध्य की किरने परावर्तित होकर पौधों पर पड़ती है। 
कैसे करें प्लास्टिक पलवार का  चयन
   प्लास्टिक मल्च का चयन खेती के उद्देश्य  के अनुसार ही किया जाता है। जैसे खरपतवार नियन्त्रणमृदा तापमान को कम व ज्यादा करने  एवं रोग नियन्त्रण इत्यादि। सामान्यत: काली या सफेद काले रंग की प्लास्टिक पलवार का ही कृषि में उपयोग किया जाता  है। प्लास्टिक पलवार फिल्म की चौड़ाई ऐसी होनी चाहिए ताकि फसल में शस्य क्रियाए आसानी से संपन्न की जा सके. सामान्यतौर पर फिल्म की चौड़ाई 90  से 120 सेमी अच्छी मानी जाती है । फिल्म  की मोटाई  फसल के प्रकार एवं उसकी अवधि के अनुसार होता है। वार्षिक (लघु अवधि), द्वि-वार्षिक (मध्यम अवधि) एवं बहुवर्षीय (लम्बी अवधि) फसलों  के लिए प्लास्टिक मल्च की मोटाई क्रमशः 20-25, 40-45 एवं 50-100 माइक्रोन की अनुशंसा की गई है। 

ऐसे बिछाएं प्लास्टिक मल्च 
    पलवार को बीजाई एवं रोपाई से पूर्व ही लगाया जाता है। खेत में क्यारी बनाने के साथ ही पलवार को बिछा कर किनारे से दबा दिया जाता है। इस प्रक्रिया को श्रमिको के द्वारा करवाने से समय व धन का व्यय होता है। अत: वर्तमान में ट्रेक्टर द्वारा पलवार बिछाने वाली मशीन भी उपलब्ध है।
सब्जियों की फसल में प्रयोग
   सब्जी वाली फसल लगाये जाने वाले खेत की अच्छी प्रकार साफ़ सफाई और जुताई कर गोबर की खाद मिलाने के पश्चात पाटा चलाकर खेत को  समतल कर लेना चाहिए . मिटटी परीक्षण करवाने के पश्चात आवश्यकता अनुसार संतुलित मात्रा में उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए ।  खेत में उठी हुई क्यारी बनाने के उपरान्त उनके उपर ड्रिप सिंचाई की पाइप लाइन को बिछा ले।फिर  सब्जी वाली फसलो के लिए 25 से 30 माइक्रोन प्लास्टिक मल्च फिल्म बेहतर रहती है . इस फिल्म को  उचित तरीके से सावधानी पूर्वक बिछा दे .  फिल्म के दोनों किनारों को मिटटी की परत से दबा दिया जाता हे। आज कल  ट्रैक्टर चालित यंत्र से भी  फिल्म बिछाने का कार्य किया जाने लगा  है। अनुसंशित पौध से पौध  की दूरी के हिसाब से   फिल्म पर आवश्यक लाई में पाइप से छिद्र कर लिए जाते है । किये हुए छेदों में बीज या नर्सरी में तैयार पोधों का रोपण करना चाहिए ।

फल वाली फसल में प्रयोग
       फलदार पोधों की छाँव जितने क्षेत्र में रहती है, उसमे प्लास्टिक मल्च बिछाना उचित रहता है। पलवार बिछाने के पूर्व फल वृक्षों के नीचे  से  घास-पात उखाड़ के सफाई करने के उपरांत ड्रिप सिंचाई की पाइप लाइन अच्छी प्रकार से  सेट  लेना चाहिए .  फल वृक्षों के नीचे पलवार लगाने हेतु  100 माइक्रोन की प्लास्टिक की फिल्म मल्च उपयुक्त रहती है। उसे हाथों से पौधे के तने के आसपास अच्छे से बिछा देते  है। इसके बाद मल्च के  चारों कोनों को 15  से 20 सेमी. मोटी मिटटी की परत से दबा देना चाहिए ।

पलवार बिछाते समय  ध्यान रखें

  • Ø पलवार फिल्म में छिद्र पाइप अथवा पंच के माध्यम से  सावधानी पूर्वक करें । फिल्म को फटने से बचाए जिससे इसका दुबारा उपयोग किया जा सकें
  • Ø फसल के लिए आवश्यक खाद एवं उर्वरकों को पलवार बिछाने से पहले भूमि में मिला देना उपयुक्त रहता है।
  • Ø बीजो की बीजाई एवं पौधों की रोपाई पलवार के छिद्रो में सीधी करनी चाहिए।
  • Ø पलवार हमेशा सुबह अथवा शाम के वक्त बिछाना चाहिए .
  • Ø मल्च फिल्म को बिछाने के बाद उसमें ज्यादा तनाव नहीं होना चाहिये अन्यथा मौसम के तापमान में वृद्धि व कृषि क्रियाओं के समय इसके फटने की संभावना रहेगी।
सिंचाई व्यवस्था
 पलवार लगाई गई फसलों में ड्रिप (बूंद-बूंद) सिंचाई विधि उपयुक्त होती है। इस विधि में लेटरल को पलवार के नीचे रखा जाता है जिससे सिंचाई एवं उर्वरकीकरण आसान रहता है तथा भूमि में नमी का संरक्षण रहता है।
पलवार को हटाना एवं निस्तारण
पलवार को फसल की कटाई के बाद खेत से हटा कर सही तरह से दुबारा उपयोग के लिए रख देना चाहिए। अगर यह प्रक्रिया नहीं की जाती है तो पलवार मिट्टी में अपघटित नहीं होती है जिससे खेत में प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या हो सकेती है।
प्लास्टिक मल्चिंग की लागत 
खेत में लगाई जाने वाली फसल के प्रकार और बुवाई विधि के अनुसार पलवार की लागत कम या अधिक हो सकती है . आमतौर पर सब्जी वाली फसलों में 80 % क्षेत्र में प्लास्टिक पलवार बिछाने की अनुमानित लागत 20-22 हजार प्रति हेक्टेयर यानी 2-2.5 प्रति मीटर आ सकती है।  इसी प्रकार फल वाली फसलो में 40% क्षेत्र के आवरण के आधार पर इसकी अनुमानित लागत 14-15 हजार यानि 1.5 प्रति मीटर आ सकती है। 
प्लास्टिक मल्चिग में शासन का अनुदान कितना है। कृषि में पलवार के प्रयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से  राज्य  सरकार के उद्यानिकी  विभाग द्वारा किसानों को  अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा। इस योजना का लाभ लेने के लिए अपने जिले के   उधान  बिभाग से सपंर्क कर सकतेहै ।
 नोट: यह लेख सर्वाधिकार सुरक्षित है।  अतः बिना लेखक की आज्ञा के इस लेख को अन्यंत्र प्रकाशित करना अवैद्य माना जायेगा। यदि प्रकाशित करना ही है तो लेख में लेखक का नाम और पता देना अनिवार्य रहेगा। साथ ही प्रकाशित पत्रिका की एक प्रति लेखक को भेजना सुनिशित करेंगे। 


मंगलवार, 22 मार्च 2016

जीवनाशी रसायन: मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के दुश्मन

डॉ जी. एस. तोमर 
प्रोफेसर (एग्रोनॉमी)
इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़) 
                सघन खेती के अंतर्गत विस्तारित खाद्यान्न फसलों, दलहन, तिलहन, गन्ना, फल और सब्जिओं से उपज में आशातीत वृद्धि हुई है, परन्तु इन फसलों को प्रभावित करने  वाले विभिन्न कीट, रोग खरपतवारों के नियंत्रण के लिए जीवनाशी रसायनों जैसे कीटनाशियों, फफूंदनाशियों  और खरपतवारनाशियों का प्रयोग अपरिहार्य हो गया है। इन जहरीले जीवनाशियों के अन्धाधुंध और बेरोकटोक प्रयोग से मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर घातक प्रभाव पड़ रहा है। दरअसल विभिन्न कीट-व्याधियों के नियंत्रण हेतु फसलों में प्रयुक्त पीडकनासी रसायनिकों का काफी अंश  खाद्य पदार्थों (खाद्यान्न, फल, फूल और सब्जी) में रह जाता है जो भोजन के माध्यम  से मानव शरीर में पहुँचकर बसा कोशिकाओं में जमा हो जाते है, जिसके परिणामस्वरूप हेपेटाइटिस, कैंसर, मिर्गी,लकवा जैसी जानलेवा बीमारियां पनपने लगती है। इन बीमारियों के अलावा अंधता, दमा,अतिसार,आन्तसोथ, स्तन कैंसर, रुधिर में स्वेत रक्त कड़िकाओं की कमी, शरीर में खून की कमी, चेहरे में काले धब्बे आदि रोग मनुष्य में परिलक्षित हो रहे है। इन रसायनिको के अंधाधुन्ध इस्तेमाल से पारिस्थिकीय संतुलन भी गड़बड़ा रहा है, जिसमें  कीट और रोगों में  पीड़कनाशियो के प्रति अधिक प्रतिरोधिता, पर्यावरण और  श्रृंखला का प्रदूषण तथा खेतों में पाये जाने वाले प्राकृतिक मित्र पछियों और कीटों का विनाश भी शामिल है। विश्व बैंक द्वारा किये गए अध्यन के अनुसार दुनिया में 25 लाख लोग प्रतिवर्ष कीटनाशकों के दुष्प्रभावों  के शिकार होते है, उसमे से 5 लाख लोग तक़रीबन काल के गाल में समा जाते है । अमेरिका में हुए अनुसन्धान के परिणामों से ज्ञात होता है कि जब कीटनाशी रसायनों का पेड़-पौधों, सब्जियों और फलों पर छिड़काव किया जाता है तो इन रसायनों का 1 % मात्रा ही सही लक्ष्य तक प्रभावी हो पाती है , शेष 99 % रसायन पर्यावरण को प्रदूषित करता है। कीटनाशकों का एक बड़ा भाग पेड़-पौधों, सब्जियों एवं फलों पर ही रह जाता है जो की घुलने के पश्चात भी साफ़ नहीं हो पाटा है। भोजन और फलों के साथ यह जहरीला रसायन मनुष्यो और पशुओं के शरीर  में प्रवेश कर जाता है। अध्ययनों से पता चला है की अधिकतर कीटनाशी हमारे शरीर में सब्जियों के माध्यम से पहुँचते है, क्योंकि अन्य फसलों की अपेक्षा सब्जी वर्गीय फसलों में रासायनिक कीटनाशकों का सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है। सब्जियों को कीटनाशकों से उपचारित करने के पश्चात बिना निश्चित अंतराल पर ध्यान दिए  हुए बिक्री हेतु बाजार में भेज दिया जाता है। आज के समय में बाजार में उपलब्ध फूलगोभी, पत्तागोभी,बैगन, टमाटर, भिन्डी, परवल, पालक, शिमला मिर्च, लौकी, तोरई,टिंडा,पट्टीदार हरा प्याज आदि सब्जियां अत्यंत खतरनाक कीटनाशियों के अवशेषों से युक्त  होती है।   आजकल मुनाफे के फेर में अनेक व्यापारी और दुकानदार भी हमारी खाद्य श्रृंखला को दूषित और जहरीला बनाने में अहम भूमिका निभा रहे है। छदम और बेईमान व्यापारी हरी सब्जियों का बाजार में भेजने से पूर्व उन्हें बनावटी रंग दे देते है जिससे उन्हें बेहतर दाम मिल सकें। बाजार में उपलब्ध सभी प्रकार की दालों और चावल को पोलिश करने के नाम पर कृत्रिम रसायनों का रंग दिया जाता है जिससे वे अधिक चमकीली हो जाती है। सुगन्धित चावल के नाम पर कृत्रिम रूप से सुगन्धित बासमती, दुबराज, बादशाह भोग आदि चावल महंगे दाम पर बेच कर उपभोक्ताओं को ठगा ही नहीं जा रहा है वल्कि उनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
            कीटनाशकों के अलावा अधिक उत्पादन के लिए रासायनिक उर्वरकों का भी धड़ल्ले से अंधाधुन्ध प्रयोग किया जा रहा है। हालत यहाँ तक हो गए है की बिना इन उर्वरकों के उपयोग से फसलोत्पादन संभव नहीं हो रहा है और कही कही तो उर्वरकों के भरपूर प्रयोग के वावजूद भी उपज में यथोचित बढ़ोत्तरी नही हो पा रही है। देश की उर्वरा भूमियाँ गैर उपजाऊँ होती जा रही है, साथ ही जल और वायु भी प्रदूषित होती जा रही है। अनेक स्थानों पर उर्वरकों के प्रयोग के कारण  भूमिगत जल 25 से 30 मीटर की गहराई तक प्रदूषित हो गया है। सरकार को चाहिए की स्वस्थ्य के लिए खतरनाक कीटनाशकों एवं अन्य रसायनिकों के विक्रय और अंधाधुन्ध इस्तेमाल पर तत्काल  प्रभाव से रोक लगाये।  इसके अलावा उपभोक्ताओं को भी खाद्यान्न, फल और सब्जियां  विश्वशनीय स्थान और भरोसेमंद व्यापारी से ही खरीदना चाहिए और मिलावट खोर व्यापारियों की पुलिस में शिकायत दर्ज करें। 

 

सोमवार, 21 मार्च 2016

मृदा सेहत कार्ड-स्वस्थ्य धरा तो सबका भला

डाॅ.गजेन्द्र सिंह तोमर
प्राध्यापक, सस्य विज्ञान विभाग
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषक नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़)

               भारत  की निरंतर बढ़ती हुई आबादी के  लिए भोजन की आवश्यकता की पूर्ति के  लिए कृषि उत्पादन बढाना और  उसे टिकाऊ बनाये रखना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य हो  गया है। वर्ष 2020 तक हमारे देश की जनसंख्या 1.2 अरब तक पहुँचने का अनुमान है जिसके  भरण पोषण के  लिए 280 मिलियन टन खाधान्न  की आवश्यकता होगी। जबकि हमारा खाद्यान्न उत्पादन बीते कुछ वर्षो  से 210 से 224  मिलियन टन के इर्द गिर्द हो  पा रहा है। वर्ष 2020 में प्रति व्यक्ति भूमि की उपलब्धता मात्र 0.11 हेक्टेयर रहने का अनुमान है । जाहिर है कि फसलोत्पादन बढ़ाने के  लिए कृषि योग्य भूमि में वृद्धि करना लगभग असंभव है। अब प्रति इकाई क्षेत्रफल से अधिक से अधिक पैदावार प्राप्त करने के  अलावा हमारे पास अन्य कोई विकल्प शेष नहीं है। कृषि उत्पादन बढ़ाने में सिंचाई के  बाद उर्वरक एक महत्वपूर्ण आदान है। भारत में ही नही अपितु सम्पूर्ण विश्व में फसलोत्पादन में 50 प्रतिशत बढ़ोत्तरी केवल रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से हुई है। हरित क्रांति की सफलता के  फलस्वरूप भारत खाद्यान्न उत्पादन के  मामले में आत्मनिर्भर हो  गया था, परन्तु अनेक क्षेत्रों में बीते कुछ वर्षों से खाद्यान्न उत्पादन में एक ठहराव सा आता जा रहा है।  दरअसल, हरित क्रान्ति के समय हमारी मृदाएँ  प्राकृतिक पोषक तत्वों से परिपूर्ण थी। फलस्वरूप खाद्यान उत्पादन में आशातीत सफलता मिली, परन्तु कृषि वैज्ञानिकों का मुख्य उद्देश्य उत्पादकता बढ़ाने के कारण मृदाओं के उर्वरा स्तर में निरन्तर कमी होती गयी। परिणाम स्वरूप पिछले दशक से अनुभव किया जा रहा है कि मुख्य फसलों के औसत उत्पादन में ठहराव की स्थिति आ गयी है। मृदा अकार्वनिक कणों, सड़े हुए कार्वनिक पदार्थो, वायु एवं जल का एक मिश्रण होती है। मृदा के भौतिक गुण, मृदा के उपयोग तथा पादप वृद्धि के प्रति इसके व्यवहार को प्रभावित करते हैं। ये गुण पौधों की जड़ों को मृदा में प्रवेश कराने, जल निकास एवं नमी धारण आदि में सहायक होते हैं। पादप पोषकों की प्राप्यता भी मृदा की भौतिक दशाओं से सम्बन्धित होती है लेकिन पिछले दशक में मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक क्रियाओं में तीव्र गिरावट हुई है। 
भारत की मृदाओं का बिगड़ता स्वास्थ्य 
               भूमि की उर्वरता किसी भी राष्ट्र के लिए बहुत महत्व रखती है किसी भी देश की सभ्यता का अंदाजा वहां की मृदा गुणवत्ता से आसानी से लगाया जा सकता है। अधिक अन्न उपजाओ की प्रतिस्पर्धा में रासायनिक उर्वरकों के  अन्धाधुंध इस्तेमाल एवं जैविक खादों  की सतत उपेक्षा के  कारण देश की मृदाओं  में जीवांश कार्बन का स्तर मात्र 0.17 ही रह गया है जिसके  फलस्वरूप मृदा स्वास्थ्य (भौतिक, रासायनिक तथा जैविक गुणों) जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति एवं उत्पादन क्षमता में ठहराव तथा अनेक क्षेत्रों  में उत्पादकता में गिरावट देखी जा रही है।  निरंतर सघन खेती अपनाने, उर्वरकों के असंतुलित उपयोग के साथ-साथ जैविक खाद के कम इस्तेमाल के चलते देश के अनेक क्षेत्रों  की मिट्टियों  में अनेक पोषक तत्वों की खासी कमी देखने को मिल रही है। देश के ज्यादातर क्षेत्रों में मिट्टी की सेहत और उसकी उर्वरता में तेजी से गिरावट आ रही है। भारत की करीब 90 फीसदी मिट्टी में अब नाइट्रोजन की कमी है जबकि 80 फीसदी में फॉस्फोरस और 50 फीसदी में पोटेशियम की कमी है। अन्य पोषक तत्वों में सल्फर, जिंक, मैंगनीज, बोरोन की कमी काफी चिंताजनक है।यहीं नहीं धान-गेंहू फसल चक्र वाले क्षेत्रों  में फसल को  जितनी मात्रा में मुख्य पोषक तत्व यानी नत्रजन, स्फुर व पोटाश उर्वरक के  रूप में प्रयोग किये जाते है उससे अधिक मात्रा में फसल इन तत्वों को  भूमि से ग्रहण कर लेती है जिससे भूमि में इन तत्वों  की बेहद कमी होती जा रही है। परिणामस्वरूप इनकी उर्वरता एवं उत्पादकता दिनो  दिन नष्ट होती जा रही है। वर्तमान में बिगड़ते मृदा स्वास्थ्य गंभीर चिंता का विषय है जिसके चलते देश में कृषि संसाधनों का अधिकतम उपयोग नहीं हो पा रहा है।
मृदा स्वास्थ्य में कमी के कारण 
  • मृदा में लगातार खेती होने एवं फसलों  की आवश्यकतानुसार संस्तुति अनुसार खाद उर्वरको का प्रयोग न किया जाना।
  • जैविक खाद के  अभाव के  कारण मृदा में जैविक कार्बन का लगातार घटता स्तर ।
  • उर्वरकों का उचित समय एवं सही विधि से प्रयोग न करने से उर्वरक उपयोग दक्षता कम होना।
  • वर्षा व वायु से मृदा क्षरण के  कारण पोषक तत्वों का धीरे-धीरे ह्रास होना।
  • फसलों  में उर्वरकों का असंतुलित प्रयोग।
  • सघन खेती के प्रचलन से खेतों  में एक साथ कई पोषक तत्वों की कमी होना।
  • मृदा मे  गौण  एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग न होना।

फसल के  लिए आवश्यक पोषक तत्व 
                       पौधों के  स्वस्थ विकास एवं संतुलित पोषण के  लिए प्रमुख रूप से 17 तत्वों  की आवश्यकता होती है जिनमें से कार्बन, हाइड्रोजन  एवं आॅक्सीजन पौधे  वायु एवं जल से ग्रहण करते हैं, शेष 14 तत्वों को  पौधे  मृदा से ग्रहण करते हैं। इनमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस  एवं पोटाश प्रमुख तत्व हैं। पौधों की वृद्धि एवं विकास के  लिए इन तत्वों  की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है । कैल्शियम, मैग्नीशियम एवं सल्फर द्वितीयक यानी गौण पोषक तत्व हैं। प्रमुख पोषक तत्वों  की अपेक्षा इन तत्वों  की कम मात्रा में आवश्यकता होती है। आयरन, मैंगनीज, काॅपर, जिंक, बोराॅन, मोलिब्डिनम, क्लोरीन  तथा निकल  सूक्ष्म पोषक तत्व हैं जिनकी पौधों को  अत्यंन्त कम मात्रा में आवश्यकता होती है । परन्तु फसल उत्पादन क्षमता को  प्रमुख तत्वों के  साथ-साथ सूक्षणे तत्व भी उतना ही प्रभावित करते हैं। यदि मिट्टी से पोषक तत्व निकलते रहें और  उनकी आपूर्ति न की जाए तो  मिट्टी की उर्वरता का ह्रास अवश्यम्भावी है। मृदा की उर्वरता को  उसमें उपस्थित पोषक तत्वों  की मात्रा तथा उसके  भौतिक, रासायनिक तथा उसके  जैविक गुण प्रभावित करते है। यदि किसी पोषक तत्व की मृदा में कमी हो  जाती है तो  उस पर उगने वाले पौधों  का जीवन-चक्र पूरा नहीं हो  पाता है। यही नहीं पौधे  पोषक तत्वों  की न्यूनता तथा अधिकता दोनों  से प्रभावित होते है जिससे उनकी उत्पादकता घट जाती है।
अन्तराष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य वर्ष-2015
कृषि भूमियों के  गिरते स्वास्थ्य की समस्या से भारत ही नहीं पूरा विश्व जूझ रहा है। अमूमन विश्व के  सभी देशों  की कृषि भूमियों  में पोषक तत्वों  की कम उपलब्धता की वजह तथा प्रति इकाई अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने की प्रतिस्पर्धा में  रासायनिक उर्वरकों  का बेझा इस्तेमाल किया जा रहा है जिससे भूमि में पोषक तत्वों  का न केवल संतुलन बिगड़ा है वरन पर्यावरण क¨ भी खासा नुकसान पहुँच रहा हैं। भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों के  लिहाज से बीमार मृदाओं  की उत्पादन क्षमता में तेजी से गिरावट आ रही है जिसके  कारण जनसंख्या के  भरण पोषण के  लिए आवश्यक अनाज पैदा करना जटिल समस्या बनती जा रही है। इसी तारतम्य में संयुक्त राष्ट्र संगठन द्वारा  वर्ष 2015 को  अन्तराष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य वर्ष घोषित किया गया है जिसमें मृदा के  गिरते स्वास्थ्य पर सभी देशों  में जन-जागृति एवं मृदा की उर्वरता एवं उत्पादन क्षमता बढ़ाने कारगर कदम उठाने का संकल्प लिया गया है।

                                    मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजनाः ईमानदार कोशिश आवश्यक

              मृदा स्वास्थ्य के  समुचित ज्ञान के  अभाव में फसलों  की पोषक तत्वीय आवश्यकता के  अनुरूप खाद-उर्वरकों  का इस्तेमाल न होने के  कारण मृदा उर्वरता एवं फसल उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। अगर हमें अपनी भावी पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित करना है तो भूमि के स्वास्थ्य को सुधारने ओर विवेकपूर्ण ढ़ग से उर्वरकों के इस्तेमाल पर किसानों को शिक्षित करना होगा । हमें किसानों को रासायनिक उर्वरकों के साथ साथ जैव उर्वरकों के प्रयोग को बढ़ावा देने हेतु प्रेरित करना होगा । इसी सोच के चलते प्रधानमंत्री ने  19 फरवरी 2015 को राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के सूरतगढ़ में राष्ट्रव्यापी ‘राष्ट्रीय मृदा सेहत कार्ड’ यानि सॉयल हेल्थ कार्ड योजना का शुभारंभ किया है। प्रधानमंत्री का कहना है कि वंदे मातरम राष्ट्र गान की सुजलाम-सुफलाम  भूमि बनाने का सपना पूरा करने के लिए मिट्टी का नियमित परीक्षण और उसका संतुलित पोषण जरूरी है । सॉयल हेल्थ कार्ड इसी सपने को पूरा करने की दिशा में एक कदम है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश भर के किसानों को सॉयल हेल्थ कार्ड दिये जाने के लिये राज्यों को सहयोग देना है। इस योजना के तहत केंद्र सरकार ने अगले तीन वर्षों के दौरान देश भर में लगभग 14.5  करोड़ किसानों को राष्ट्रीय मृदा सेहत कार्ड उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा है। यही नहीं तीन साल बाद मृदा सेहत कार्ड का नवीकरण भी किया जायेगा, ताकि इस योजना के तहत किसानों को मिलने वाले तरह-तरह के फायदों का सिलसिला आगे भी जारी बना रहे।इस महत्वाकांक्षी योजना का मूल प्रयोजन है-स्वस्थ धरा, खेत हरा। कृषि भूमि की सेहत और खाद एवं उर्वरकों  के बारे में पर्याप्त जानकारी न होने के चलते किसान आम तौर पर नाइट्रोजन का अत्यधिक प्रयोग करते हैं, जो न सिर्फ कृषि उत्पादों की गुणवत्ता के लिए खतरनाक है बल्कि इससे भूमिगत जल में नाइट्रेट की मात्रा भी बढ़ जाती है। इससे पर्यावरणीय समस्याएं भी पैदा होती हैं। किसान जब संतुलित मात्रा में खाद डालने लगेंगे, तो उनके खेतों की मिट्टी खराब नहीं होगी, फसलों की पैदावार में पर्याप्त इजाफा होगा, साथ ही किसानों की कमाई भी बढ़ेगी। इससे न केवल किसान, बल्कि आम जनता भी लाभान्वित होगी क्योंकि फसलों की ज्यादा पैदावार महंगाई को कम करने में भी सहायक होगी। इसलिए देश के  समस्त किसान भाईयों को  चाहिए कि  वे इस महती योजना का लाभ उठाते हुए अपने प्रत्येक खेत की मिट्टी के परीक्षण आधारित मृदा सेहत कार्ड तैयार करवा कर अपनी खेती-किसानी को  आर्थिक रूप से लाभकारी बनाने में अहम भूमिका निभाएँ। 
क्या है मृदा सेहत कार्ड ?
             मृदा सेहत पत्रक में मिट्टी की सेहत के विभिन्न संकेतकों यथा भूमि की क्षारीयता व लवणयता के गुणों के साथ साथ भूमि में कार्बनिक कार्बन का स्तर, उपलब्ध पोषक तत्वों (नत्रजन, स्फुर, पोटाश के  अलावा अन्य गौण व सूक्ष्म पोषक तत्वों  की मात्रा अंकित की जाती है  जिसके आधार पर फसल के लिए आवश्यक उर्वरकों की मात्रा की सिफारिस की जाती है । इसके  अलावा भूमि की भौतिक गुणों  की भी जानकारी दी जाती है। भूमि की उर्वरा क्षमता बढ़ाने के  आवश्यक उपाय भी सुझाये जाते है।  आजकल उर्वरक तथा अन्य आदान मंहगे होते जा रहे हैं।  अतः यह नितान्त आवश्यक हो जाता है कि किसान भाई मृदा की सेहत के आधार पर  उन आवश्यक तत्वों की भूमि में पूर्ति करें जिनकी जरूरत है ताकि उचित लागत पर  अधिक उपज ली जा सके । मृदा सेहत पत्रक से किसानों को अपनी भूमि की सेहत जानने तथा विभिन्न फसलों के  अनुरूप उर्वरकों के विवेकपूर्ण चयन में मदद मिलती है। 
मृदा सेहत कार्ड तैयार करने अर्थात मिट्टी परीक्षण की सुविधा राज्य कृषि विभाग की मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं, कृषि महाविद्यालयों  एवं कृषि विज्ञान केन्द्रों  पर उपलब्ध है। वैसे तो  प्रत्येक मौसम में फसल की बुआई से पहले मिट्टी की जांच करवा लेनी चाहिए । परन्तु कम से कम तीन वर्ष में किसान को  प्रत्येक खेत की मिट्टी का परीक्षण करवा कर मृदा सेहत कार्ड तैयार करवा लेना चाहिए।

मृदा सेहत कार्ड  के  लिए मिट्टी का नमूना
                     मिट्टी की जांच हेतु खेत से मिट्टी का नमूना लेने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना होता है। नमूना लेने से पूर्व खेत से नमूना लेने वाली जगह से खरपतवार, फसल अवशेष व कूडा-कचरा आदि हटा लें। मृदा नमूने की गहराई फसल के प्रकार, मृदा परीक्षण प्रयोगशाला की सलाह एवं कृषि पद्धतियों (ट्रेक्टर या हल से जुताई) पर निर्भर करती है। सामान्यतरू सही गहराई वह होती है जहां तक पौधों की जडों को अधिकांशतः पोषण प्राप्त होता है। जो कि फसलों के अनुसार अलग-अलग होती है। अनाज, सब्जी व फूलों की खेती के लिये नमूना 15 सेमी. की गहराई से लेना चाहिए। गहरी जड वाली फसलों के लिये नमूने की गहराई 30 सेमी तक होती है। नमूना लेने हेतु प्रत्येक खेत में 8 से 10 स्थानों का चयन करें । चयनित स्थानों पर पहले 15-20 सेन्टीमीटर की गहराई का “वी”  आकार का गडढा बनायें । फिर गड्ढे की दीवार के साथ पूरी गहराई तक मिट्टी की 2.5 सेमी मोटी, एक समान परत काटकर साफ बाल्टी या तगाड़ी में एकत्रित कर लें  तथा इससे जड़े और  कंकड़ आदि निकाल कर अलग कर दें। खेत के  विभिन्न भागों  सेे इस प्रकार एकत्रित मिट्टी को छाया में सुखाने के  पश्चात साफ कपड़े पर डालकर अच्छी तरह से मिला कर गोल ढेर नुमा बनाकर उसे चार बराबर भागों में बांट लेना चाहिए। फिर इन चार भागों में से आमने-सामने के दो भागों की मिट्टी रख लें । पुनः इन दोनों भागों की मिट्टी को मिलाकर चार भागों में बांट लें और आमने-सामने के दो भाग रख लें । यह क्रिया तब तक करते रहे जब तक नमूना आधा किलो न रह जाए । यह इसलिए किया जाता है ताकि लिया गया नमूना पूरे खेत का प्रतिनिधित्व करने वाला हो । इसके बाद इसे  कपड़े की थैली में डालने से पहले  छाया में अच्छी तरह से सुखा लें क्योंकि गीली मिट्टी का नमूना परीक्षण परिणामों को प्रभावित कर सकता है। ये सब करने के बाद कृषक संबंधी आवश्यक जानकारी की दो पर्चियां- एक थैली के अंदर डालें  तथा दूसरी थैली के साथ बाहर बाधें जिसमें कृषक का नाम ,गांव, तहसील, खेत की पहचान या खेत का क्रमांक, खसरा नम्बर, सिंचाई का साधन तथा पूर्व में बोयी गई एवं प्रस्तावित फसल का नाम तथा दिनांक, का  विवरण हो । प्रयोगशाला में मिट्टी की जांच के पश्चात मृदा स्वास्थ्य कार्ड में  जिन घटकों का उल्लेख किया जाता है वह है मिट्टी का पी एच मान, विद्युत चालकता, जैविक कार्बन, उपलब्ध फाॅस्फोरस, उपलब्ध पोटाश के  अलावा गौण व सूक्ष्म पोषक तत्वों  की मात्रा अंकित की जाती है ।  
खादीय सुझाव हेतु लिए गये मृदा न्यादर्श का प्रयोगशाला में विश्लेषण 
तत्वों के नाम                               न्यूनतम  मध्यम उच्चतम 
जैविक कार्बन (%) 0.5 से कम 0.5 से 0.75       0.75 से अधिक
उपलब्ध नत्रजन (किग्रा/हे.) 280 से कम 280-560          560 से अधिक
उपलब्ध फासफोरस (किग्रा/हे) 10 से कम 10-24.6          24.6 से अधिक
उपलब्ध पोटाश (किग्रा/हे)                 108 से कम 108 से 280       280से अधिक
उपलब्ध गंधक (मिग्रा/हे)                   10.0 10.0-25.0        25.0 से अधिक
उपरोक्त तालिका के अतिरिक्त अगर मृदायें ऊसर हैं तो पीएच,ईसी तथा ईएसपी के आधार पर मृदाओं का वर्गीकरण किया जाता है। मिट्टी में जैविक पदार्थ (कार्बन) की मात्र के आधार पर जैविक खाद की सिफारिश की जाती है । जैविक खाद से मिट्टी की भौतिक संरचना व गठन बना रहता है। जैविक कार्बन के आधार पर उपलब्ध नत्रजन की गणना कर, नत्रजन उर्वरकों की सिफारिश की जाती है । नत्रजन का प्रयोग फसल में फसल में दो से तीन बार करना अच्छा होता है। इसी तरह भूमि में  उपलब्ध फाॅस्फोरस का विश्लेषण कर फाॅस्फोरस उर्वरकों की सिफारिश की जाती है । फॉस्फोरस उर्वरक उपयोग पौधों की जड़ों की वृद्धि एवं  फूल तथा बीजों के निर्माण के लिए आवश्यक  होता है । फाॅस्फोरस युक्त उर्वरकों को पौधे के जड़ क्षेत्र के नीचे बुवाई के समय कतारों में प्रय¨ग करना  चाहिए । आमतौर  पर भारतीय मृदाओं  में पोटाश तत्व की पर्याप्त उपलब्धता होती है परन्तु सतत सघन खेती के  कारण आजकल मृदा में  पोटाश की कमी भी देखने को  मिल रही है । पोटाश का पौधों में पानी के उपयोग को नियंत्रित करने की क्षमता रखने के कारण, शुष्क खेती में पोटाश का विशेष  महत्व है।  यह पौधों को सूखा, गर्मी व सर्दी से बचाने व कीड़ों व बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता  बढ़ाने में भी मदद करता है । इसके अलावा नत्रजन, स्फुर के  साथ पोटाश के  प्रयोग से फलों एव उपज की गुणवत्ता एवं चमक बढ़ती है जिससे बाजार में उपज का बेहतर मूल्य प्राप्त ह¨ताहैं । रासायनिक उर्वरक की कितनी मात्रा दी जानी चाहिए यह उर्वरक में मौजूद पोषक तत्वों के प्रतिशत पर निर्भर करता है । मृदा स्वास्थ्य कार्ड में अंकित मिट्टी का पी एच मान मिट्टी की क्षारीयता व अम्लीयता को दर्शाता है ।  इसके आधार पर भूमि प्रबंध व सुधार की सिफारिश की जाती है । मृदा के  पी एच मान से मिट्टी के स्वास्थ्य और पोषक तत्वों की उपलब्धता की जानकारी प्राप्त होती है ।  अगर पी एच मान 6 से 7.5  के  मध्य है तो भूमि सामान्य प्रकृति की मानी जाती है अर्थात भूमि में अधिकांश पोषक तत्वों  की उपलब्धता रहती है । अगर पी एच मान 6 से कम अथवा 7.5 से  अधिक है तो पोंधों को पोषक तत्वों की उपलबधता कम या ज्यादा आंकी जाती है   जिसका फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।   मिट्टी का पी एच मान 8 से अधिक होने पर क्षारीयता की समस्या, कृषि उत्पादन को प्रभावित करती है । ऐसे खेतों में जांच आधारित जिप्सम डालने की सिफारिश की जाती  है । मृदा जीर्णोद्धार के अंतर्गत गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद, जिप्सम उपयोग, जीवाणु खाद  से बीजोपचार, सूक्ष्म तत्वों का प्रयोग इत्यादि पर ध्यान देना होगा ।

काबुली चने की खेती भरपूर आमदनी देती

                                                  डॉ. गजेन्द्र सिंह तोमर प्राध्यापक (सस्यविज्ञान),इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि महाव...