मंगलवार, 3 जून 2014

वर्षा आश्रित क्षेत्रों में धान उत्पादन के लिए वरदान है-व्यासी पद्धति

                                                                   डॉ.गजेन्द्र सिंह तोमर
                                                         प्राध्यापक (सस्य विज्ञानं विभाग )
                                  इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषक नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़)


                   पूर्वी भारत यथा आसाम, बिहार, ओडिसा, पश्चिम बंगाल तथा छत्तीसगढ एवं उत्तर प्रदेश के  पूर्वी भाग की निचली भूमियों  में बारानी धान की खेती का महत्वपूर्ण स्थान है । धान के  अन्तर्गत कुल क्षेत्रफल का 58 प्रतिशत हिस्सा पूर्वी भारत में है जबकि राष्ट्रीय धान उत्पादन में इस क्षेत्र की 48 प्रतिशत हिस्सेदारी है । पूर्वी भारत की निचली बारानी भूमियों (वर्षा आश्रित क्षेत्र) में उथले व मध्यम जल के  साथ 50-80 प्रतिशत क्षेत्र के  किसानों  द्वारा परम्परागत रूप से ब्यासी पद्वति से धान की खेती वरदान साबित हो रही है क्योंकि वर्षा की अनिश्चितता और जल की अनुपलब्धता में भी किसानों  को  सीमित मेहनत,  काम पूंजी व आदानो  के  भी धान की सुनिश्चित उपज प्राप्त हो  जाती है । यह विधि अस्थिर जलवायु एवं विषम मौसम वाले क्षेत्रों  के  छोटे व मझोले  किसानों  द्वारा अपनाई जाती है ।  प्रभावी नींदा नियंत्रण, उत्तेजित जड़ विकास, भरपूर कंशों  के  साथ आदर्श पौध संख्या की वजह से ब्यासी विधि स्थिर उत्पादन देने में सहायक सिद्ध होती है। इस विधि में ज्यादातर किसान मध्यम कंशे युक्त 120 -140  दिन में तैयार होने वाली  किस्मो का उपयोग करते है । उन्नत किस्मो  का प्रयोग सीमित मात्रा में किया जाता है । ब्यासी पद्धति के  अन्तर्गत खेत में मुख्यतः दो  प्रक्रियाएं संपन्न  की जाती है
1.    परंपरागत लंबी अवधी वाली किस्मो  को  अधिक बीज दर के  साथ सीधे बोया जाता है ।
2.    अंकुरण के 25-35 दिन पश्चात जब खेत में 15 सेमी पानी एकत्रित हो जाता है, तब खड़ी फसल में जुताई कर पाटा चलाया जाता है । कुछ क्षेत्रों  में जुताई के  बाद खेत में पौधों  का समान वितरण भी किया जाता है ।
भारत के पूर्वी हिस्सों में   निचले खेतों  में ब्यासी एक प्राचीन  पद्धति है जिसमें सूखे खेतो  में छिटकवां विधि से बोये  गये खेत में 25-35 दिन पश्चात  15-20 सेमी. पानी जमा हो  जाने पर आड़ी-खड़ी जुताई की जाती है । तत्पश्चात पाटा चलाकर खेत में पौधों  का पुनः समान वितरण संपन्न किया जाता है । इससे असामान्य जलवायु एवं कम आदानों  में भी अच्छी उपज प्राप्त की जाती है ।

धान में व्यासी की प्रक्रियाएँ

          उन  खेतों  में जहाँ ब्यासी पद्धति से धान लिया जाना है, 2-3 बार ग्रीष्मकालीन जुताई की जाती है जिससे खरपतवार, कीट-ब्याधियां नष्ट हो  जाए ।  मिट्टी को बगैर पलटे खेत की जुताई बैल चलित हल से की जाती है । मानसून की प्रथम वर्षा होने पर यदि खेत में खरपतवार दिखते है तो  एक बार पुनः जुताई करते है । इसके  बाद मई के  अंतिम सप्ताह में खेत में धान का बीज छिड़क कर हैरो  चलाते है । किसानों  का मानना है कि मई के अंतिम सप्ताह में धान की बुवाई करने से बेहतर उपज मिलती है क्योकि अक्टूबर माह में के  अन्त में संभावित सूखे से पूर्व फसल पक कर तैयार हो  जाती है । धान अंकुरण के  25-35 दिन बाद, खेत में 15-20 सेमीं जल भरने पर गीली जुताई की जाती है। ब्यासी करने से पूर्व कुछ किसान फसल चराने हेतु पशुओं  को  छोड़ देते है । ऐसा करने से पौधों  में कंशो  का विकास अधिक होता है तथा खेत में बांछित पौध  संख्या स्थापित होती है । जुताई करने के  बाद 1-2 बार पाटा चलाया जाता है जिससे पौधों के  पास मिट्टी मुलायम हो जाए । पाटा चलाने से खरपतवार मिट्टी में मिल जाते है जोकि खाद का कार्य करते है । अधिक घने पौधों को  उखाड़कर रिक्त स्थानों पर रूप दिया जाता  है ।

व्यासी पद्धति: कृषक अवधारणा

1. श्रमिक बचतः व्यासी पद्धति  में श्रमिकों  की बचत होती है क्योंकि  रोपा विधि में पौधशाला निर्माण, खेत की जुताई (पडलिंग), रोपाई, निंदाई में अधिक श्रमिक, मेहनत व पैसा लगता है । ब्यासी में सिर्फ प्रारंभिक जुताई और  खड़ी फसल में जुताई में ही श्रमिकों  की आवश्यकता होती है। व्यासी की विभिन्न प्रक्रियाओं  में 120 से 130 मानव दिवस लगता है जबकि रोपा पद्धति में प्रति हैक्टर 209 मानव दिवस की आवश्यकता होती है । इसके  अलावा ब्यासी विधि में पशु शक्ति का प्रयोग भी कम (42 दिन प्रति है) होता है जबकि रोपा विधि में अधिक पशु बल (50 दिवस प्रति है.) की जरूरत होती है ।
2.उर्वरकों की बचत: व्यासी पद्धति में धान की देशी-ऊँची किस्मों का उपयोग किया जाता है जिन्हे कम उर्वरकों  की आवश्यकता होती है । अधिक उर्वरक देने से लाभ नहीं होता है । किसानों  का मानना है कि उन्नत किस्मों  को  रासायनिक उर्वरको  की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है तथा व्यासी विधि के लिए ये किस्में  उपयुक्त नहीं होती है । यहां तक की बहुत से किसान रोपा विधि में भी उन्नत किस्मों  की खेती से परहेज करते है।  किसानों को इस अवधारणा को बदल देना चाहिए। भारत के बिभिन्न स्थानों पर किये गए शोध परिणामों से ज्ञात होता है की अधिक उपज और आर्थिक लाभ के लिए उन्नत किस्मों का प्रयोग करना फायदेमंदहोता है। क्षेत्र विषेश के लिए अनुसंसित उन्नत किस्मो का प्रयोग करते हुए व्यासी विधि से धान की अधिक उपज ली जा सकती है।  
3.व्यासी पद्धति में पौधशाला की जरूरत नहीं: अधिकांश धान उत्पादक राज्यों में ग्रीष्मकाल के  दौरान जानवरो  की खुल्ला चराई प्रचलित है जिसके  कारण पौध शाला की सुरक्षा करने में समस्यायें आती है । जबकि व्यासी विधि से उगाये गए धान में यह समस्या नहीं आती है।
4.खेत मचाने की आवश्यकता नहीं: रोपा विधि में किसान को  खेत में पर्याप्त पानी भरजाने हेतु प्रतीक्षा करनी होती है जो कि सामान्य वर्षा की स्थिति में भी मध्य या जुलाई अंत में ही संभव हो  पाता है । अतः रोपण विधि  में फसल स्थापना में न केवल विलंब होता है बल्कि फसल में फूल आने के  समय (मध्य अक्टूबर) संभावित सूखे से फसल को  नुकसान  सकता है । व्यासी विधि में शीघ्र बुवाई के  कारण फसल को  सूखे से क्षति की संभावना कम रहती है ।
5.खरपतवार व कीट प्रकोप कम : व्यासी पद्धति के अन्तर्गत गर्मी में  खेत की जुताई हो  जाने के  कारण खरपतवार व कीट नष्ट हो जाते है । खड़ी फसल में पनपने वाले खरपतवार ब्यासी के  समय मिट्टी में मिला दिये जाते हैजो कि  हरी खाद का कार्य करते है।
6.कम नकदी और आदानों की आवश्यकता: व्यासी पद्धति मे पौधशाला की स्थापना और  खेत मचाने की क्रियाविधि नहीं किये जाने के  अलावा खाद-उर्वरकों  पर भी अधिक पैसा  व्यय नहीं करना पड़ता है ।  ब्यासी विधि में श्रमिक आवश्यकता का वितरण लंबे समय तक होने के  कारण अधिकतर कार्य पारिवारिक मजदूरों से ही संपन्न हो जाता है । रोपण कार्य एक माह के  अंदर संपन्न किये जाने के  कारण अधिक श्रमिको  की एक साथ सभी किसानों को आवश्यकता पड़ती है । इस प्रकार से ब्यासी विधि आर्थिक रूप से अधिक लाभकारी है ।
7.    सूखा और  अधिक जलभराव वाले क्षेत्रों के लिए ब्यासी आदर्श पद्धति: असमान वर्षा और  ऊँची-नीची भूमि के  कारण सूखा या बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों  में रोपा विधि या धान की सीधी-बुवाई आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं है । एक ही समय में वर्षा के  आधार पर फसल को  सूखा या बाड़ से क्षति की सम्भावना रहती है । रोपण कार्य समय पर संपन्न होना अति आवश्यक होता है क्योकि विलंब से रोपाई करने से पौध  अधिक उम्र की हो जाती है, उसमें कल्लों  का विकास कम होगा, सूखा की संभावना बढ़ जाती  है तथा नवम्बर-दिसम्बर में तापमान कम होने के  कारण दाना विकास पर प्रतिकूल असर पड़ता है ।
8.मिट्टी की भौतिक दशा एवं अगली फसल पर विपरीत प्रभावः रोपा विधि में खेत मचाने के  कारण मिट्टी की भौतिक दशा खराब हो जाती है । मृदा सतह सख्त हो  जाने के  कारण आगामी फसल की स्थापना में कठिनाई होती है । रोपण धान की कटाई ब्यासी धान की अपेक्षा 2-3 सप्ताह बाद की जाती है । इसके  पश्चात बोई जाने वाली फसल को  प्रारंभ में ही सूखा का सामना करना पड़ता है । व्यासी धान में यह समस्या नहीं आती है ।

व्यासी पद्धति की सीमाएं

           जहां व्यासी पद्धति से धान की खेती करने के अनेक लाभ है तो  कुछ सीमाएं भी है । व्यासी पद्धति की प्रमुख कमियाँ या सीमाएं निम्नानुसार है
1.अपर्याप्त पौध संख्या: बीज बोवाई पश्चात कम या अपर्याप्त वर्षा के  कारण बीज अंकुरण प्रभावित होता है जिसके  कारण प्रति इकाई बांक्षित पौध  संख्या स्थापित नहीं हो पाती है । उत्तम बीज अंकुरण एवं पौध  विकास के  लिए पर्याप्त वर्षा अथवा भूमि में नमीं आवश्यक  है तभी प्रति इकाई बांक्षित पौध  संख्या और  अधिक उपज प्राप्त हो  सकती है । ब्यासी प्रक्रिया के  परिणामस्वरूप कुछ पौधे क्षतिग्रस्त होकर मर जाते है और  कुछ पौध  का स्थापन्न असमान  हो जाता है । इस नुकसान से बचने के  लिए प्रायः किसान प्रति इकाई अधिक बीज दर का उपयोग (130-200  किग्रा. प्रति हैक्टर) करते है । व्यासी के  तुरंत पश्चात भारी वर्षा के  कारण खेत में जलभराव होने से पौध मृत्य दर अधिक हो  जाती है ।
2.अप्रभावी नींदा नियंत्रण: पूर्वी भारत में सूखा-बाढ़ के  बाद खरपतवार प्रकोप धान की खेती की दूसरी सबसे बड़ी समस्या है । निचले खेतों  में सीधे बोये गये धान में खरपतवारों  से अधिक क्षति होती है । छत्तीसगढ़ में धान के खेत में करगा (जंगली धान) की ज्वलंत समस्या है । इसके  नियंत्रण हेतु परंपरागत ब्यासी विधि तभी कारगर होती है जब फसल की प्रारंभिक अवस्था के  समय पर्याप्त मात्रा में वर्षा हो । वर्षा की प्रत्याशा में विलंबित ब्यासी की स्थिति में खरपतवारों  की  बढ़वार भरपूर हो जाती है जिससे वे भूमि में उपस्थित प©षक तत्वों  का शीघ्र अवशोषण कर लेते है और  धान में कंशा विकास अवरूद्ध कर देते है ।
3.उन्नत किस्मों  का अभाव: शीघ्र तैयार होने वाली अर्द्ध-बौनी किस्में ब्यासी पद्धति के लिए अनुपयुक्त ह¨ती है क्योंकि ब्यासी एवं पाटा करते समय उनके  तने टूट जाते है । इस प्रकार से कहा जा सकता है कि निचली धनहा भूमियों के  लिए धान की सभी किस्में उपयुक्त नहीं है ।
4.कम उपज: अपर्याप्त पौध  संख्या, उन्नत किस्मों  का कम फैलाव, फसल गिरना (लाजिग), कम उर्वरक उपय¨ग व न्यूनतम उर्वरक दक्षता, पौध  संरक्षण उपायों  को  न अपनाना, सूखा और  बाढ़ के  कारण ब्यासी विधि से उगाये जाने वाले धान की पैदावार कम आती है ।
              धान की परंपरागत ब्यासी पद्धति उपज के  मान से रोपण विधि की तुलना में कमतर आंकी जा सकती है परन्तु यह धान की अधिक टिकाऊ (सस्टेनेबल) विधि है । जलवायु परिवर्तन के कारण दिन प्रति दिन वर्षा के दिनों एवं मात्रा में  गिरावट हो रही है जिसका सीधा कुप्रभाव धान उत्पादन पर पड़ सकता है। इसके आलावा यह भी माना जाता है की रोपण पद्धति से धान उत्पादन करने से पर्यावरण को भारी क्षतिहोती है।  इस विधि में बहुत अधिक पानी की आवश्यकता होती है और खेत में लगातार पानी भरा रहने से भूमि से हानिकारक गैसे पर्यावरण को दूषित कर रही है तथा वातावरण के तापमान को बड़ा रही है।  व्यासी पद्धत्ति से धान की खेती पर्यावरण अनुकूल तो है। इसके आलावा कम श्रम व खर्च में धान की टिकाऊ खेती होती है। कृषि वैज्ञानिकों ने धान की व्यासी पद्धति को अधिक उपज के लिए परिष्कृत किया है जिसे अपनाकर किसान भाई  कम लागत में भूमि एवं पर्यावरण को  बगैर क्षति पहुंचाये प्रति इकाई अधिकतम उपज एवं  आय अर्जित कर सकते है ।
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