मंगलवार, 30 अक्टूबर 2018

कृषि विज्ञान के प्रणेता कौटिल्य का कृषि शाष्त्र


डॉ गजेंद्र सिंह तोमर, प्रोफ़ेसर(एग्रोनोमी)
इंदिरा गाँधी कृषि विश्व विद्यालय,
राज मोहिनी देवी कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र,
अंबिकापुर (छत्तीसगढ़)
                    कौटिल्य को कृषि विज्ञान का प्रणेता माना जाता है।  कृषि विज्ञान के क्षेत्र में जो भी शोध हुए है और आगे भी होना है, उन सबके पीछे हमारे वेद-पुराणों और कौटिल्य के अर्थ शाष्त्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। मेगस्थनीज और चन्द्रगुप्त मौर्य शासन कल में कौटिल्य का अर्थशास्त्र लिखा गया है ।  इस महँ एतिहासिक ग्रन्थ में कृषि को एक धार्मिक कार्य बताया गया है।   मेगस्थनीज ने अपने विवरण में लिखा है की भूमि के अधिकांश भाग पर सिंचाई होती है तथा उसमे एक वर्ष में दो  फसलें तैयार होती है, परन्तु  कौटिल्य ने एक वर्ष में तीन  फसलें पैदा करने का विवरण दिया है।  कौटिल्य के अनुसार वर्षा ऋतु के प्रारंभ में शालि (धान), कोद्रव (कोदो), प्रियंगु (कंगनी),वरक (मोठ) तथा कुछ दलहन बोये जायें. वर्षा के मध्य में मुदग (मूंग), उड़द आदि बोये जायें. वर्षा ऋतु की समाप्ति के बाद कुसुंबा, मसूर, कुलत्थ(कुल्थी),यव (जौ),गोधूम (गेंहू),कलाय (चना) और सर्षद (सरसों) आदि को बोया जायें। कौटिल्य ने अन्य फसलों का भी उल्लेख किया है, इनमे ईक्षु(ईख) और कार्पास(कपास) आदि शामिल है।  मेगस्थनीज ने उपरोक्त फसलों के अतिरिक्त ज्वार, अनेक प्रकार की दालें, विविध प्रकार की धान, तथा वास्फोरम नामक एक अनाज का भी उल्लेख किया है।  कौटिल्य धान आदि की फसलों को श्रेष्ठ मानते थे तथा साग-सब्जी की फसल को मध्यम.आधुनिक युग में दो फसलें लेने को ही उन्नत कृषि माना जाता है, पर कौटिल्य के समय तीन फसलें पैदा होती थीं-जो हैमन (रबी), ग्रैष्मिक (खरीफ) और केदार (जायद) कहलाती थीं। 
         कौटिल्य ने इस बारे में भी लिखा है की कौन-सी भूमि में कौन-सी फसल बोई जाए. उनके अनुसार जो भूमि फेनाघट (नदी के जल से आप्लावित हो जाती हो) उस भू में वल्ली फल (खरबूजा, तरबूज, ककड़ी आदि) बोयी जाए, जो भूमि परिवाहान्त (सिंचित) हो उस पर पिप्पली, मृद्धीका (अंगूर) और गन्ना बोया जाये, जो भूमि कूप पर्यन्त (कुओं के समीप स्थित) हो, उस पर साग सब्जी और मूल (गाजर,मूली, शकरकंद) आदि बोये जायें, जो भूमि हरणीपर्यन्त (जहाँ पहले तालाब रहते हों और उनके सूख जाने पर भूमि में नमीं रहती हो) उस पर हरी फसलें बोई जायें और क्यारियों की मेंड़ों पर सुगंध देने वाले और औषधियों के लिए उपयोगी पौधे लगाये जायें।
        कौटिल्य अर्थशास्त्र में अनेक फलों, फूलों, खाद्यान्नों, कांड-मूल, मसालों आदि का उल्लेख है।  इनमे मरीच (मिर्च), श्रंगि (अदरक), धनिया, जीरा, नींबू, आम, आंवला, बेर, झरबेरी, जामुन, कटहल और अनार आदि के नाम तो है ही, कई ऐसी वस्तुओं और फसलों के नाम है, जिनका अर्थ हमें ज्ञात नहीं है।  चाणक्य ने गन्ने के रस से गुड़ मत्स्यन्डिका (चीनी) के उपयोग से नीबू, आम तथा अन्य फलों का शरबत बनाने का भी उल्लेख किया है.कौटिल्य कृषि कर्म को धार्मिक अनुष्ठान मानते थे।  इसलिए उन्होंने लिखा है जब बीजों को बोना प्रारंभ किया जाये तो कुछ बीजों को पानी में भिगोकर तथा इन भीगे हुए बीजों के बीच में स्वर्ण (सोना) रख कर यह मंत्र पढ़ा जाय-
                                         प्रजापतये काश्यपाय देवाय च नमः सदा
                                         सीता में ऋदध्यतां देवी बीजे च धनेषुच.. (कौटिल्य अर्थशास्त्र 2/24)
            अर्थात प्रजापति और कश्यप देवताओं को सदा नमस्कार है।  हमारी कृषि में सदा वुद्धि हो और हमारे बीजों और धन में देवी का निवास हो।
          मोर्य काल में अच्छी फसल की कामना के लिए देवी-देवताओं की पूजा अर्चना की जाती थी. यद्यपि सिंचाई के पर्याप्त प्रबंध थे, फिर भी वर्षा कब होगी और कैसे होगी इसे भी ज्योतिष के आधार पर जानने का प्रयत्न किया जाता था।  कौटिल्य के मतानुसार बृहस्पति ग्रह की स्थिति और गति से, शुक्र के उदय और अस्त से और सूर्य के स्वरुप और विकार से वर्षा के सम्बन्ध में अनुमान लगान चाहिए।
              भारत में कृषि मात्र व्यवसाय नहीं थी, इसे एक पवित्र कर्म, धार्मिक अनुष्ठान तथा सामाजिक दायित्व का कार्य माना जाता था।  यह धार्मिक और सामाजिक कर्म सफलता और सुगमतापूर्वक संपन्न हो इसलिए अनेक देवी-देवताओं की अराधना की जाती थी। वैसे आज भी इस परम्परा का पालन अनेक राज्यों के किसान और ग्रामीण भाई  कर रहे है। कई गावों में खेतों में हल चलाने, बीज बोने, कुआ खोदने आदि का मुहूर्त निकलवाने की आज भी परम्परा है।  इसके पीछे धारणा यही है की पवित्र कार्य, शुभ समय पर निर्विघ्न संपन्न हो।  फसल कट कर घर  आ जाने पर त्यौहार मनाने तथा देवी-देवताओं की पूजा-उपासना की परम्परा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में कायम है। दीपावली पर गाय और बैलों की पूजा हमारी प्राचीन परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा से की जाती है।  होली, बैसाखी, लोहड़ी, नवाखाई आदि त्यौहार नई फसल आने के उपलक्ष्य में ही तो आयोजित होते है। 
नोट:   कृपया ध्यान रखें बिना लेखक की आज्ञा के इस लेख को अन्यंत्र प्रकाशित करना अवैद्य माना जायेगा। यदि प्रकाशित करना ही है तो लेख में  ब्लॉग का नाम,लेखक का नाम और पता देना अनिवार्य रहेगा। साथ ही प्रकाशित पत्रिका की एक प्रति लेखक को भेजना सुनिशित करेंगे।

रविवार, 28 अक्टूबर 2018

बिना जुताई गेंहूँ की बुआई से करें भरपूर कमाई


                                          डॉ गजेंद्र सिंह तोमर, प्रोफ़ेसर(एग्रोनोमी)
                                              इंदिरा गाँधी कृषि विश्व विद्यालय,
                               राज मोहिनी देवी कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र,
                                                   अंबिकापुर (छत्तीसगढ़)
खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से धान-गेंहू एक महत्वपूर्ण फसल प्रणाली है जिसके अंतर्गत लगभग 11 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र आता है. देश में यह प्रणाली पंजाब, हरियाणा,बिहार,उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ राज्यों में प्रचलित है।  इन प्रदेशों में लम्बी अवधि की धान किस्मों  की कटाई नवम्बर के अंतिम सप्ताह  से लेकर 15 दिसम्बर या और विलम्ब से हो पाती है।  भारी मिटटी वाले धान के खेतों में नमीं की अधिकता होने के कारण गेंहू बुवाई हेतु खेत तैयार करने हेतु उपयुक्त दशा नहीं मिल पाती है जिससे गेंहू की बुआई काफी विलंब से हो पाती है. विलंब से बुवाई करने से गेंहूँ की पैदावार कम होने के साथ-साथ दानों की  गुणवत्ता पर भी  विपरीत प्रभाव पड़ता है।  सही समय और कम लागत में  गेहूं की खेती करने के लिए जीरो टिलेज अत्यन्त लाभकारी तकनीक है।
क्या है जीरो टिलेज  तकनीक  
  
जीरो टिल सीड ड्रिल (हैप्पी सीडर) फोटो साभार गूगल
जीरो टिलेज सुगमता से अपनायी जा सकने वाली ऐसी तकनीक है, जिसकी मदद से उत्पादन लागत में कमीं के साथ-साथ बिना जुताई गेंहू की समय से बुआई कर बेहतर उपज प्राप्त की जा सकती है।  जीरो टिलेज मशीन आमतौर पर प्रयोग में लायी जाने वाली सीड ड्रिल जैसी है।  सामान्य सीड ड्रिल में लगने वाले चौड़े फालों की जगह इसमें 9-11 पतले फाल लगे होते है जो कि बिना जुते हुए खेत में कूंड बनाते है जिसमे गेंहू के बीज एवं उर्वरक साथ-साथ कतार में गिरते है।  इस मशीन द्वारा धान कटाई के बाद शेष रहे धान के ठूंठों से युक्त खेत में भी सीधे बुवाई की जा सकती है।  इस प्रक्रिया में बुआई से पहले खेत की तैयारी में लगने वाले समय एवं धन दोनों की बचत होती है। जीरो टिल ड्रिल को 25 या उससे अधिक हॉर्स पॉवर वाले ट्रेक्टर से आसानी से चलाया जा सकता है।  नौ कतार वाली जीरो टिल ड्रिल मशीन से 2.5 घंटे में एक हेक्टेयर (2.5 एकड़) खेत की बुवाई की जा सकती है।
इस मशीन में पंक्ति से पंक्ति की दूरी आवश्यकतानुसार समायोजित की जा सकती है।
क्यों आवश्यक है जीरो टिल बुवाई 
            पारंपरिक तौर पर गेंहू की बुवाई हेतु खेत की तैयारी के लिए 4-5 बार जुताई की जाती है,  जिसका उपज में कोई विशेष लाभ नहीं होता है बल्कि खेती तैयारी में अधिक समय लगने के कारण बुवाई में देरी हो जाती है।  इससे उत्पादन लागत में वृद्धि के अलावा प्रति इकाई कम पौध संख्या स्थापित होने के कारण उपज कम प्राप्त होती है. प्रयोगों से ज्ञात होता है कि विलंब से बुवाई (10 दिसम्बर के बाद) की वजह से अधिक लागत के बावजूद उपज में 25-30 किग्रा. प्रति हेक्टेयर प्रति दिन की कमीं आ सकती है।  इससे किसानों को काफी नुकसान होता है। जबकि जीरो टिलेज तकनीक अपनाने से न केवल बुवाई के समय में 15-20 दिन की बचत संभव है, बल्कि उपज का स्तर  बरक़रार रखते हुए खेत की तैयारी पर आने वाली लागत भी बचाई जा सकती है।   अतः धान-गेंहू फसल प्रणाली अपनाने वाले किसान भाइयों को चाहिए कि वे जीरो टिलेज मशीन से गेंहू की बुवाई समय  पर संपन्न करें । इस विधि का प्रयोग कर चार हजार रुपये प्रति हेक्टेयर तक बचत होने के साथ ही अच्छी पैदावार प्राप्त होती है।
जीरो टिल मशीन से बुवाई ऐसे करें 
     बुआई शुरू करने के पूर्व मशीन को अच्छी तरह समायोजित कर लेना चाहिए। धान की कटाई के उपरान्त खेत में उपयुक्त नमीं होना आवश्यक है।  बिना जुताई वाले खेत में चलने पर यदि पैर का हल्का निशान पड़ता है तो बुवाई के लिए उपयुक्त दशा मानी जा सकती है। यदि खेत में नमीं कम है तो धान फसल कटाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करना चाहिए।   बुआई के पूर्व खरपतवार नष्ट करने  के लिए तीन दिन पूर्व एक लीटर ग्लाईफोसेट 41 % 1000 ग्राम सक्रीय तत्व (2.5 लीटर प्रति हेक्टेयर) अथवा पैराकाट 1000 ग्राम को 500  लीटर पानी में घोलकर बुआई के 2-3 दिन पूर्व छिड़काव फ्लेट फैन नोज़ल से करें। ध्यान रखें इन खरपतवारनाशी दवाओं का प्रयोग अंकुरित या जमीं हुए फसल में न करें। सीड ड्रिल के एक बॉक्स में बीज और एक बॉक्स में आवश्यकतनुसार बीज भर कर बुआई की जा सकती है। 
जीरो टिलेज विधि से बुवाई के फायदे 
           जीरो टिलेज तकनीक से गेहूं की खेती करने से कम लागत के साथ ही उत्पादन भी ज्यादा प्राप्त होता है। इस पद्धति को अपनाने से फसल के अवशेष कार्बनिक पदार्थों के साथ-साथ पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की वृद्धि होती है तथा भूमि की उर्वरा शक्ति कायम बनी रहती है।  फसल में कीट व्याधि लगने का खतरा भी कई गुणा कम हो जाता है। इसमें  बीज एवं उर्वरक की कम मात्रा लगती है और खरपतवार जैसे जंगली जई और गुली डंडा आदि का प्रकोप कम होता है। इस पद्धति को बढ़ावा देने के लिए सरकारी स्तर पर  सीड ड्रिल मशीन पर अनुदान का भी प्रावधान है। अतः  गेंहू फसल से अधिकतम उपज और मुनाफा  प्राप्त करने के लिए किसान भाइयों को इस तकनीक का उपयोग करना चाहिए । 
नोट:   कृपया ध्यान रखें बिना लेखक की आज्ञा के इस लेख को अन्यंत्र प्रकाशित करना अवैद्य माना जायेगा। यदि प्रकाशित करना ही है तो लेख में  ब्लॉग का नाम,लेखक का नाम और पता देना अनिवार्य रहेगा। साथ ही प्रकाशित पत्रिका की एक प्रति लेखक को भेजना सुनिशित करेंगे।

रविवार, 27 मई 2018

बारानी खेती में सुनिश्चित पैदावार हेतु सस्यवैज्ञानिक उपाय



 डॉ गजेन्द्र सिंह तोमर,
प्रोफ़ेसर (सस्य विज्ञान)
इंदिरा गाँधी कृषि विश्व विद्यालय,
कृषि महाविद्यालय एवं अनुसन्धान केंद्र, अंबिकापुर (छत्तीसगढ़)

       फसलोत्पादन में जल एक महत्त्वपूर्ण एवं अत्यावश्यक आदान है जिसकी अधिकता और कमी दोनों ही फसल की बढ़वार और उपज को प्रभावित करती है देश में 60  प्रतिशत से अधिक क्षेत्र बारानी खेती की परिधि में आता है जिसमे वर्षा की मात्रा और वितरण के अनुसार फसल उत्पादन कम/ज्यादा होता रहता है।  इन क्षेत्रों में सुनिश्चित उत्पादन के लिए किसान भाइयों को फसलोत्पादन की उन्नत तकनीक का सहारा लेना होगा।  कम और असामयिक वर्षा वाले क्षेत्रों में नमीं सरंक्षण करते हुए फसल उत्पादन तकनीक को इस प्रकार अपनाना जिससे अधिक से अधिक उत्पादन हो सकें, बारानी कृषि कहलाता है जलवायु परिवर्तन के कारण दिन प्रति दिन वर्षा के दिन और मात्रा  कम होती जा रही है।  अब वर्षा के दिन गिनती के रह गए है और वर्षा का विभाजन भी अनिश्चित होता जा रहा है, कभी तो इतनी अधिक वरिश होती है जिसके चलते एक तरफ तो  कृषि कार्य संपन्न करने का मौका भी नहीं मिलता है और भूमि कटाव से उपजाऊ भूमि भी नष्ट हो जाती है।  कभी कभी वर्षा केवल छिडकाव की भांति होती है।  मानसून कभी समय से पहले या फिर बुआई समय निकल जाने के बाद आता है।  इसके अलावा कई बार वर्षाकाल में भी लम्बा सूखा पड़ने से फसल चौपट हो जाती है।  इन परिस्थितिओं में वर्षा आश्रित क्षेत्रों में खेती बाड़ी करना मानसून पर जुआ खेलने जैसा ही है इन विषम परिस्थितिओं में बारानी क्षेत्रों में खेती से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए फसलोत्पादन की उन्नत विधियां अपनानी चाहिए तभी हमें खेती की लागत का भरपूर प्रतिसाद मिल सकता है

खेत की तैयारी में समझदारी  

बारानी खेती से अधिकतम उत्पादन भूमि में संचित नमी पर निर्भर करता है।  इसके लिए रबी फसल कटने के तुरंत बाद अथवा पड़ती पड़े खेतों की ग्रीष्म ऋतु में मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करने से भूमि की जल धारण क्षमता बढती है तथा  खरपतवार भी नियंत्रित रहते है।  अल्प वर्षा वाले रेतीले क्षेत्रों  में गर्मी जुताई नहीं करना चाहिए।  खेत की तैयारी से सम्बंधित निम्न बाते ध्यान में रखना चाहिए।
Ø  खेतों की जुताई कर पाटा के माडल से समतल बनाकर, वर्षा जल को समान रूप से फैलने देवे जिससे वर्षा जल खेत में सरंक्षित हो सके, बहकर नहीं जावें।  इस सरंक्षित नमीं से लम्बे तक वर्षा नहीं होने पर भी फसल पर सूखे का प्रभाव कम होता है।
Ø  खेतों में ढाल के विपरीत जुताई करे जिससे कूड में पानी इकट्ठा होगा जिससे मृदा को पानी सोखने का अधिक समय मिलेगा।
Ø  खेतो में ढाल के विपरीत थोड़ी थोड़ी दूरी पर डोलियाँ बनाये और वानस्पतिक अवरोध लगाये जिससे वर्षा जल रूककर भूमि में प्रवेश कर सके।
Ø  पड़ती खेतो में खरपतवार नियंत्रण तथा मृदा में जल धारण की क्षमता बढ़ाने हेतु वर्षा ऋतु में दो-तीन बार जुताई कर खेत में पाटा लगाना  चाहिए जिससे नमी का सरंक्षण अधिक होगा जो की आगामी फसल के लिए लाभकारी होती है। 
Ø  प्रत्येक तीसरी वर्ष खेत में वर्षा पूर्व 20-25  टन प्रति हेक्टेयर की दर से सड़ी हुई गोबर की खाद/कम्पोस्ट डालना चाहिए जिससे भूमि में जीवांश कार्बन में वृद्धि के साथ साथ मृदा में नमीं संचयन में भी उपयोगी सिद्ध होती है।

सही फसल एवं किस्म का चयन

वर्षाधीन क्षेत्रों हेतु शीघ्र तैयार होने वाली, सूखा सहनशील तथा अधिक उत्पादन देने वाली फसलें एवं उनकी उन्नत किस्मों का चयन करना चाहिए।  फसलों के चयन में भूमि की किस्म और संभावित वर्षा को भी ध्यान में रखना चाहिए।  हलकी एवं बलुई मिट्टी में खरीफ ऋतु में जुआर, बाजरा,मूंग, उड़द बरवटी,ग्वारफली आदि की शीघ तैयार होने वाली किस्मो को लगाना चाहिए. रबी में गहरी हल्की और दोमट मिट्टी में सरसों, चना, कुसुम आदि की फसलें लगाना चाहिए. अच्छी वर्षा तथा माध्यम से भारी मिट्टी में खरीफ में सोयाबीन, अरहर, मक्का, तिल, मूंगफली,अरंडी आदि तथा रबी में गेंहू, चना, जौ,अलसी, धनियाँ आदि फसलें अधिक उत्पादन देती है। अन्न वाली फसलों की अपेक्षा दलहनी फसलें सूखे को अधिक सहन करती है. मक्का, जुआर, सोयाबीन, मूंगफली आदि उन्ही क्षेत्रों लगाये जहाँ की मृदाओ की जल धारण क्षमता अच्छी होती है तथा  पर्याप्त वर्षा होती है।  औसत वर्षा वर्षा वाले क्षेत्रों की भारी भुमिओं में जुआर तथा कम वर्षा और बलुई मिट्टी में बाजरा की खेती करना चाहिए. रबी में बारानी क्षेत्रों में चना और सरसों की खेती अच्छी रहती है।

उचित समय पर करें बुआई  

कृषि क्षेत्र की लोकप्रिय कहावत ‘का वर्षा जब कृषि सुखाने’ बारानी क्षेत्रों के लिए सटीक बैठती है।  वर्षा आश्रित क्षेत्रों में फसलों की बुआई सही समय पर करना अत्यावश्यक है.खरीफ फसलों की बुआई मानसून की प्रथम वर्षा के साथ ही कर देना चाहिए।  इससे बीजों का जमाव और पौध स्थापन सही होगा, साथ ही फसल को वर्षा का पूरा लाभ मिलेगा।  सामान्यतौर पर खरीफ फसलों का बुआई का समय मध्य जून से जुलाई का प्रथम सप्ताह है।  यदि समय पर वर्षा हो तो सबसे पहले खाद्यान्न फसलें तथा इसके बाद दलहनी-तिलहनी फसलों की बुआई संपन्न करना चाहिए। रबी में बारानी क्षेत्रों में गेंहूँ और जौ की बुआई अक्टूबर अंत से मध्य नबम्बर तक, चने की बुआई अक्टूबर प्रथम सप्ताह में और राई-सरसों की बुआई मध्य सितम्बर से मध्य अक्टूबर तक मौसम तथा तापमान को ध्यान में रखते हुए संपन्न करें.

अपनाये बुआई की कतार विधि  

 बारानी क्षेत्रो में फसलों की बुआई छिटकवा पद्धति से की जाती है जो की अवैज्ञानिक है और इन क्षेत्रों में कम उत्पादन के लिए उत्तरदायी है।  अतः भरपूर उत्पादन के लिए देशी हल की सहायता से पोरा विधि या सीड ड्रिल से बीज की बुआई कतारों में करें. पानी की कमी होने पर कतारों के बीच की दूरी बढ़ाना लाभकारी होता है।  बीज की बुआई ऊर कर (कतारों में) करने से बीज उपयुक्त गहराई पर मृदा के नमीं क्षेत्र में गिरता है जिससे बीज का अंकुरण सुनिश्चित हो जाता है. ढालू खेतों में बीज की बुआई ढाल की विपरीत दिशा में कतारों में करना चाहिए।

खेत में हो ईष्टतम पौध संख्या

सफल फसल उत्पादन के लिए प्रति इकाई क्षेत्र में पौधों की समुचित संख्या स्थापित होना अत्यावश्यक है. वर्षा आश्रित क्षेत्रों में बीज अंकुरण प्रायः कम होता है और इसी वजह से प्रति हेक्टेयर बीज दर सामान्य से 20 % अधिक रखी जाती है. अंकुरण पश्चात पास-पास घने उगे पौधों में से कमजोर/बीमारू पौधों एवं साथ उगे खरपतवारों को उखाड़ देना चाहिए।  पौधों की अधिक संख्या होने से उनमे आपस में नमी और पोषक तत्वों को ग्रहण करने हेतु प्रतिस्पर्धा होती है जिससे पौधों का पूर्ण विकास नहीं हो पाता है. ऐसे पौधो में फूल और फलन भी कम हो पाता  है जिससे उपज बहुत कम होती है. अतः प्रति इकाई पौधों की संख्या कम रखना चाहिए, परन्तु यह कतारों के मध्य दूरी बढाकर करना चाहिए. इससे भूमि में दीर्धकाल  तक नमी बनी रहती है।

भूमि को दें पोषक तत्वों की संतुलित खुराक

बारानी क्षेत्रो की भूमियाँ न केवल प्यासी है वरन वे भूखी भी है. अतः बेहतर फसल उत्पादन के लिए फसलों में उचित पोषक तत्व प्रबंधन आवश्यक है. पोषक तत्वों की पूर्ती रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक खादों से करना चाहिए।  जैविक खाद के आभाव में समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन के माध्यम से पोषक तत्वों की पूर्ती करना चाहिए. इससे फसलोत्पादन में बढ़ोत्तरी होने के साथ साथ भूमि की उर्वरा शक्ति भी बरकरार रहती है. संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन के लिए खेत की मिट्टी का परिक्षण करवा कर आवश्यकतानुसार खाद एवं उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए।  
फसलोत्पादन में नत्रजन उर्वरक की पूर्ती हेतु बहुधा यूरिया का इस्तेमाल किया जाता है जिसमे केवल 45 % नत्रजन पाया जाता है, जबकि हमारे वायुमंडल में लगभग ७८% नत्रजन विद्यमान होती है.प्रकृति प्रदत्त इस नत्रजन को राइजोबियम और एजोटोबेक्टर नामक  जीवाणु खाद की मदद से पौधो को उपलब्ध कराया जा सकता है। राइजोबियम जीवाणु दलहनी फसलों की जड़ों में वायुमंडलीय नत्रजन स्थिर कर पौधों को उपलब्ध करा देते है एजोटोबेक्टर स्वतंत्र रूप से भूमि में रहते है तथा वायुमंडल की नत्रजन को पौधों (अनाज वाली फसलों) को उपलब्ध करा देते है. इसी प्रकार से फॉस्फेट विलेयक जीवाणु खाद के प्रयोग से भूमि में बेकार पड़ी फॉस्फोरस पौधो को उपलब्ध करते है इससे पूर्व में उपयोग किये गए सिंगल सुपर फॉस्फेट और डी ए पी उर्वरको का भी समुचित उपयोग हो जाता है बीज को जीवाणु कल्चर से उपचारित करने हेतु २५० ग्राम गुड को  आवश्यकतानुसार पानी गरम कर उसका  घोल बना लेवे इस घोल के ठंडा होने पर इसमें ६०० ग्राम जीवाणु खाद मिला देना चाहिए.इस मिश्रण से एक हेक्टेयर में बोये जाने वाले बीज में इस प्रकार से मिलाये कि बीजों पर एक समान परत चढ़ जाये इसके बाद बीजों को छाया में सुखाकर बुआई की जा सकती है

फसल पद्धति में बदलाव

बारानी खेती में एकल फसल पद्धति की बजाय मिश्रित और अंतरवर्ती फसल प्रणाली लाभदायक होती है अतः विभिन्न फसलों को अलग अलग कतारों में एक निश्चित अनुपात में बोना चाहिए. उपयुक्त अंतरवर्ती फसलें लेने से मुख्य फसल की उपज पर कोई विपरीत प्रभाव नही पड़ता है वल्कि लाभ में वृद्धि होती है और सूखे के कुप्रभाव से भी बचा जा सकता है अंतरवर्ती खेती हेतु एक फसल अधिक ऊँची हो तथा दूसरी कम ऊंचाई वाली, या एक फसल गहरी जड़ वाली तथा दूसरी उथली जड़ो वाली होना चाहिए.खाद्यान्न फसलो की डॉ कतारों के बीच  एक कतार दलहनी फसलों की बोई जा सकती है  
 रबी में सरसों, चना और अलसी की बुआई की जा सकती है. ढलवां खेतों में खाद्यान्न व् तिलहनी फसलों को एक के बाद दूसरी पट्टी में ढाल के विपरीत बोना चाहिए जिससे पानी को खेत में रोकने में मदद मिलेगी साथ ही विभिन्न वर्ग की फसलें भूमि के  अलग-अलग स्तरों से नमी और पोषक तत्व ग्रहण करेगी इस प्रकार अंतरवर्ती खेती से भूमि की उर्वरा शक्ति कायम रहती है तथा किसानों को अतरिक्त आमदनी भी हो जाती है।

खरपतवार नियंत्रण एवं गुड़ाई

बारानी क्षेत्र की  फसलों में खरपतवार प्रकोप से  उत्पादन घट जाता है।  खरपतवार फसल से अधिक तेजी से भूमि से नमी और पोषक तत्वों का अवशोषण करते है अतः फसल बुआई से २०-२५ दिन बाद निदाई-गुड़ाई कर खेत से खरपतवारों को निकाल देना चाहिए।  सूखे की स्थिति में भूमि की उपरी परत की गुड़ाई कर देने से नमीं सरंक्षित रहती है


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गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

राजमा एक बेहतर आमदनी वाली दलहनी फसल

डॉ. गजेंद्र सिंह तोमर 
प्राध्यापक (शस्य विज्ञान)
इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़) 


राजमा (फेसियोलस वल्गेरिस) को फ्रेंच बीन  कहते है। इसकी फलियां किडनी के आकार जैसी होती है, इसलिए इसे किडनी बीन के नाम से भी जाना जाता है ।  मटर एवं बरबटी की तरह राजमे की खेती भी  द्विउद्देश्य यानि  सब्जी एवं दाना के लिए की जाती है । स्वाद  और सेहत के लिहाज से राजमा की फलियां (बीन्स) सबसे महत्वपूर्ण होती है और इसकी जायकेदार सब्जी प्रायः सभी लोग बेहद पसंद करते है। अधिक मांग होने की वजह से बाजार में इसकी बीन्स सबसे मंहगे दामों में बिकती है। इसलिए राजमा को नकदी फसल के रूप में उगाया जाने लगा है।  नरम एवं गूदेदार फलियो वाली किस्मों का फ्रेन्चबीन के रूप में सब्जी के लिए तथा तुलनात्मक कड़ी फलियो वाली किस्मों को दाना के लिए उगाया जाता हैं। राजमा खाने में स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक होता है और मुनाफे की दृष्टि से अन्य दलहनों से बेहतरीन फसल है।  राजमा के दानों में सामान्यतः 22.9 प्रतिशत प्रोटीन, 60.6 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है। इसके 100 ग्राम दानों में 260 मिली ग्राम कैल्शियम, 410 मिली ग्राम फाॅस्फोरस एवं 5.8 मिली ग्राम लौह तत्व पाये जाते हैं जो मानव स्वास्थ्य के लिए बहुत ही उपयोगी हैं।

उपयुक्त जलवायु

          भारत के मैदानी क्षेत्रों में राजमा की खेती रबी ऋतु में की जाती है। इसकी फसल वृद्धि के लिए वातावरण का तापक्रम 20-25 डिग्री सेग्रे.  के मध्य होना उचित रहता है। राजमा की फसल अन्य रबी दलहनो की अपेक्षा पाले के प्रति अधिक संवेदनशील है।

भूमि  का चयन एवं खेत की तैयारी


          राजमा की खेती के लिए गहरे-हल्के गठन वाली बलुई दोमट से बुलई चिकनी मृदायें उपयुक्त रहती हैं। अधिक जल धारण क्षमता वाली छत्तीसगढ़ की डोरसा तथा कन्हार मिट्टियाँ उपयुक्त हैं। मृदा अभिक्रिया 6.5 से 7.5 उत्तम रहती है। लवणीय तथा क्षारीय मृदायें अनुपयुक्त रहती हैं। खेत में जल निकास की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए एवं खेत खरपतवार मुक्त होना चाहिये। भूमि में नमी की कमी होने पर पलेवा देकर खेत तैयार करना चाहिये। प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2 - 3 जुताईयाँ देशी हल या कल्टीवेटर से करने के पश्चात् पाटा चलाकर खेत समतल कर लेना चाहिए। दीमक से फसल सुरक्षा हेतु क्लोरपायरीफास 1.2 प्रतिशत 20 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिलाना चाहिए।


राजमा की उन्नत किस्में

उदय: यह बड़े दानों वाली किस्म है जिसके 100 दानों का वजन 44 ग्राम आता है तथा इसके दानों का रंग सफेद-चित्तीदार होता है। यह किस्म 125-130 दिनों में पककर तैयार हो जाती है तथा इसकी अधिकतम उत्पादन क्षमता 20 - 25 क्विंटल/हेक्टेयर हैं।
एच.यू.आर.-137: इसके दाने बड़े, भूरा-लाल रंग लिये तथा 100 दानों का वजन 45 ग्राम होता है। यह 100-110 दिनों में पककर औसतन 15-16 क्विंटल/हेक्टेयर उत्पादन देती है। 
व्ही.एल.60: यह खरीफ एवं रबी दोनों मौसम के लिये उपयुक्त हैं। इसके दानों का रंग भूरा एवं 100 दानों का वजन 36 ग्राम होता है। यह 110 - 115 दिन में पककर 15 - 20 क्विंटल/हेक्टेयर दाना उपज देती है।
एच.यू.आर.15: सफेद दानों वाली किस्म है। इसके 100 दानों का वजन 40 ग्राम है तथा 120-125 दिनों में पककर तैयार होती है। इसकी उत्पादकता 18 – 22 क्विंटल/हेक्टेयर है।

बुआई का समय

           राजमा के पौधों की अच्छी बढ़वार  और उपज के लिए सही समय पर बुआई करना आवश्यक है।  भूमि का तापमान 25 डिग्री सेग्रे. तापमान  आने पर राजमा की बुवाई करना चाहिए। समान्यतः यह तापमान अक्टूबर के तीसरे सप्ताह में आता है । सामान्यतौर पर 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर राजमा की बुआई हेतु अनुकूल समय होता  है। इसके बाद बुआई करने पर उपज घट जाती है।

बीज दर एवं बीजोपचार

          अधिक उपज के लिए स्वस्थ एवं उच्च गुणवत्ता वाला बीज बुआई हेतु प्रयोग करना चाहिए। सामान्यतः 100 से 110 किलो ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर का प्रयोग करते हैं। बड़े दानों वाली किस्मों, (100 दानों का वजन 35 - 40 ग्राम) का बीज 120 से 140 किलो प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए। फसल को बीज जनित रोगों से बचाने के लिए बुवाई से पूर्व बीज का शोधन फफूँदीनाशी रसायन जैसे थायरस या कार्बेन्डाजिम (बाविस्टीन 50 डब्लूपी) 3 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करना आवश्यक है।

बोआई की विधि

          राजमा की बोआई हल के पीछे कूड़ों मे करनी चाहिए। कतार- से-कतार की दूरी 30 - 40 से. मी. तथा पौधे-से-पौधे की दूरी 10 से. मी. रखे। बीज को 8 से 10 से. मी. गहराई पर बोना चाहिए। इसके लिए पाटा चलाकर बीज ढकना चाहिए। राजमा की अच्छी पैदावार लेके के लिए 2.5 से 3.0 लाख पौधे प्रति हेक्टेयर उपयुक्त रहते है। यदि भूमि मंे नमी कम है तो राजमा की बुवाई पलेवा देकर अन्यथा बुवाई के बाद हल्की सिंचाई करना लाभप्रद रहता है।

खाद्य एवं उर्वरक

          राजमा की अधिक उप लेने के लिए खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग करना आवश्यक है। गोबर की खाद या कम्पोस्ट 5-7 टन प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की अंतिम जुताई के समय मिलाना चाहिए। अनय दलहनी फसलों की अपेक्षा राजमा में नत्रजन की अधिकमात्रा लगती है क्योंकि इसकी जड़ें उथली होने के अलावा वायुमण्डलीय नत्रजन स्थिरीकरण के लिए आवश्यक ग्रन्थियाँ इसकी जड़ो मे नही पायी जाती है। सामान्यतः 100 किलो  नत्रजन, 60 किलो स्फुर, 20 किलो पोटाॅश तथा 20 किग्रा. जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा तथा स्फुर, पोटाश और जिंक सल्फेट की पूरी मात्रा बुवाई के समय कूड़ों में बीज के नीचे प्रयोग करना चाहिए। नत्रजन की शेष आधी मात्रा पहली सिंचाई के समय खड़ी फसल में देना लाभप्रद पाया गया है।

सिंचाई एवं जल निकास

          राजमा कि जड़ें उथली होने के कारण नम भूमि एव अधिक पानी की जरूरत पड़ती है। राजमा को 25 दिन की अन्तराल से तीन - चार सिंचाईयों (बुआई के 25, 50, 75 तथा 100 दिन बाद) की आवश्यकता पड़ती है।  सिंचाई हल्की करें  तथा खेत में पानी रूकना नहीं चाहिए। अतः समुचित जल निकास आवश्यक है।

खरपतवार नियंत्रण

          खरपतवार नियंत्रण के लिए राजमा की फसल में 1 - 2 निराई- गुड़ाई की आवश्यकता पड़ती है। पहली निंदाई  प्रथम सिंचाई के बाद करना चाहिए। गुड़ाई के समय पौधों पर थोड़ी मिट्टी चढ़ाना लाभप्रद रहता है। खरपतवार के रासायनिक नियंत्रण हेतु पेन्डीमेथलीन 0.75 से 1.0 किग्रा. प्रति हेक्टेयर को 500 - 600 लिटर पानी में घोल कर बुवाई के तुरंत बाद (अंकुरण से पूर्व) छिड़काव करना चाहिए। छिड़काव के समय भूमि में पर्याप्त नमी होनी चाहिये।

कटाई-गहाई एवं उपज 

          आमतौर पर अक्टूबर-नवम्बर में फसल पक जाती है। राजमा की फल्लियाँ पीली पड़कर पकने लगें तब कटाई करना चाहिए अन्यथा फल्लियाँ चटकने लगती हैं। कटाई करके फसल को सुखाकर गहाई की जाती है तथा दानों को खुली धूप में सुखा लेना चाहिए। आमतौर पर राजमा की उन्नत खेती से 25 - 30 क्विंटल/हेक्टेयर दानों की उपज प्राप्त हो जाती है। 

काबुली चने की खेती भरपूर आमदनी देती

                                                  डॉ. गजेन्द्र सिंह तोमर प्राध्यापक (सस्यविज्ञान),इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि महाव...