बुधवार, 17 अप्रैल 2013

चावल सघनीकरण पद्धति (एस .आर .आई .): सीमित संसाधनों से धान की अधिकतम उपज

                                                      डॉ गजेन्द्र सिंह तोमर 

                                                                      प्राध्यापक (सश्यविज्ञान)
                                                                 इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय, 
                                                                  कृषक नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़)

                                    चावल सघनीकरण पद्धति (एस .आर .आई .)

                      भारतीय किसानो ने उन्नत किस्मों का चुनाव, खाद एंव उर्वारकों का प्रयोग तथा पौधे सरंक्षण उपायों को अपनाकर धान की उपज बढ़ाने में सफलता हासिल की है परंतु बीते कुछ वर्षो से धान की उत्पादकता में संतोषजनक वृद्धि नही हो पा रही है।शोध संस्थानों तथा प्रदर्शन प्रक्षेत्रों पर 50-60 क्विंटल  प्रति हेक्टेयर धान की उपज प्राप्त की जा रही है। बढ़ती जनसंख्या और घटते संसाधन को देखते हुए वर्तमान समय में संकर किस्मों को अपनाते हुए नई तकनीक  से खेती कर प्रति इकाई उत्पादन बढ़ाने के अलावा हमारे पास उपज बढ़ाने के और कोई विकल्प शेष नहीं है। उपलब्ध संसाधनों के बेहतर प्रबंधन से, जिसमें उर्वरक तथा जल उपयोग क्षमता बढ़ाना शमिल है, धान की उत्पादन लागत भी कम की जा सकती है।
चावल सघनीकरण पद्धति क्या है ?
           प्रति इकाई क्षेत्र से कम-से-कम लागत में धान का अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने मेडागास्कर में फादर हेनरी  डी लौलनी ने धान उत्पादन तकनीक विकसित की, जो सघनीकरण पद्धति अर्थात् मेडागास्कर तकनीक के नाम से लोकप्रिय हो रही है। भूमि, श्रम, पूँजी और पानी के समक्ष उपयोग से धान उत्पादन में अच्छी वृद्धि की जा सकती हैं।श्री पद्धति में कम दूरी पर कम उम्र का पौधा रोपा जाता है जिसमें उर्वरक एंव जल का न्यूनतम एंव सक्षम उपयोग करते हुए प्रति इकाई अधिकतम उत्पादन लेने की रणनीति अपनाई जाती है। इस पद्धति में धान के पौधे से अधिक कंशे निकलते हैं तथा दाने पुष्ट होते हैं। एशिया के विकासशील देशोें यथा चीन, बंगलादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, आदि ने कापी समय से इस पद्धति को अपना लिया है। भारत में भी अनेक स्थानों पर इस पद्धति से 7-10 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन लिया जा चुका है। भारत के दक्षिणी राज्यों में श्री पद्धति से धान उगाने का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है। इस तकनीक को अपनाने से छत्तीसगढ़ में सिंचित अवस्था में धान की औसत उत्पादकता कम से कम 6-7 टन प्रति हेक्टेयर तक ली जा सकती है।
पौध रोपणी एंव खेत की तैयारी 
                    संकर अथवा अधिक कल्ले देने वाली उन्नत किस्मों का प्रयोग करें। रोपणी हेतु चुने गये खेत की दो तीन बार जुताई कर मिट्टी  भुरभूरी कर लें। एक मीटर चौड़ी  एंव आवश्यकतानुसार लंबी तथा 15-30 सेमी. ऊँची क्यारी बनायें। क्यारी के दोनों ओर सिंचाई नाली बनाना आवश्यक है। एक हेक्टर क्षेत्र के लिए 100 वर्ग मीटर की रोपणी पर्याप्त है। क्यारी में 50 किलोग्राम कम्पोस्ट मिलाकर समतल कर दें। प्रति हेक्टेयर 7-8 किग्रा. बीज का प्रयोग करें। उपचारित बीज को (प्रति क्यारी 90-100 ग्राम बीज या 9-10 ग्राम प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से ) समान रूप से छिड़क कर पुनः कंपोस्ट या गोबर खाद से बीज ढँक दें।रोपणी पर धान के पैरा की तह बिछाने से बीज सुरक्षित रहते है। क्यारियों में 1-2 दिन के अंतराल से फब्बारा से सिंचाई करें। बोने के 3 दिन बाद रोपणी में बिछाई गई धान के पैरा की परत हटा दें।
चटाईयुक्त रोपणी : इसमें अंकुरित बीज बोये जाते हैं। समतल स्थान पर प्लास्टिक शीट बिछायें। इसके ऊपर 1 मीटर लम्बा, आधा मीटर चौड़ा  तथा 4 सेमी गहरा लकड़ी का फ्रेम  रखें। इस फ्रेम  में मिट्टी  का मिश्रण (70 प्रतिशत मृदा, 20 प्रतिशत गोबर की सड़ी हुई खाद व 10 प्रतिशत धान की भूसी ) तथा 1.5 किग्रा डायआमोनिसयम फास्फेट (डीएपी) मिलाकर भर दिया जाता है।बीज की निर्धारित मात्रा को 24 घंटे पानी में भिगोकर रखने के बाद पानी निथार देते है। अब 90-100 ग्राम बीज प्रति वर्ग मीटर की दर से समान रूप से बोकर सूखी मिट्टि की पतली तह (5 मिमि) से ढँक देते हैं। अब इस पर झारे की सहायता से पानी का छिड़काव करें जब तक कि फेम की पूरी मिट्टी  तर न हो जाए। अब लकड़ी का फ्रेम  हटाकर उपर्युक्तानुसार अन्य क्यारियाँ तैयार करें। इन क्यारियों में 2-3 दिन के अंतराल से सिंचाई करें। बोआई के 6 दिन बाद क्यारियों में पानी की पतली तह बनाएं रखे तथा रोपाई के 2 दिन पूर्व पानी निकाल दें। बोने के 8-10 दिन में चटाई युक्त रोपणी तैयार हो जाएगी।
पौध रोपाई: रोपाई हेतु पारंपरिक धान की खेती के समान खेती के समान खेत की जुताई करें एंव समुचित मात्रा में गोबर की खाद मिलाएँ। खेत में पानी भर कर अच्छी तरह से मचाई पश्चात पाटा चलाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए। प्रत्येक 3-4 मीटर की दूरी पर क्यारी का निर्माण करें जिससे जल निकासी संभव हो सके।रोपाई पूर्व खेत से जल निकाल देना चाहिए। मार्कर की सहायता से दोनों ओर 25 ग 25 सेमी. कतार (लाइन) बनायें और दोनों कतारों के जोड पर पौधा लगाएँ।
कम उम्र की रोपणी: धान की पौध 15 दिन से अधिक की होने पर पौधों की वृद्धि को कम कर देती है। सामान्यतौर पर 12-14 दिन के पौधे इस पद्धति से रोपाई हेतु उपयुक्त रहते हैं।दो पत्ती अवस्था या 8-10 दिन के धान के पौधे के कंसे व जड़ दोनों में सामान्यत: 30-40 दिन की रोपणी की तुलना में ज्यादा वृद्धि देखी गई है, जिससे पौधे नमी व पोषक तत्वों को अच्छे से ग्रहण करते हैं, फलस्वरूप अधिक पैदावार प्राप्त होती है। पौधे उखाड़ने के बाद शीघ्र रोपाई करना आवश्यक है। रोपाई वाले खेत में पानी भरा नहीं होना चाहिए।
एक स्थान पर एक पौध की रोपाई: परम्परागत रूप से एक स्थान पर 2-3 पौधों की रोपाई की जाती है, जबकि इस विधि में एक स्थान पर केवल एक ही पौधा 2 सेमी. की गहराई पर सीधा लगाया जाता है। एक पौधे को बीज व मिट्टि सहित अँगूठे व कनिष्का अँगुली की सहायता से दोनों कतार के जोड़ पर रोपित करना चाहिए।
 पौधे-से-पौधे की समान दूरी: कतारों में रोपाई की तुलना में चैकोर विधि से धान की रोपाई करने से पौधे को पर्याप्त प्रकाश मिलता है व जड़ों की वृद्धि होती है। कतार तथा पौधे-से-पौधे की दूरी 25 ग 25 सेमी. रखते हैं। मिट्टी के प्रकार व उर्वरकता के आधार पर यह दूरी घटाई-बढाई जा सकती है। पौधों की दूरी अधिक रखने से जडो़ की वृद्धि ज्यादा होती है तथा कंसे भी अधिक बनते हैं, साथ ही वायु का आगमन व प्रकाश संश्लेषण भी अच्छा होगा जिससे पौधे स्वस्थ व मजबूत कंसे अधिक संख्या में निकलेंगे जिनमें दानों का भराव भी अधिक होगा।
रोपणी से पौधे इस प्रकार उखाड़े जिससे उनके साथ मिट्टी,बीज और जड़े बिना धक्का के यथास्थिति में बाहर आ जाएँ तथा इन्हें उखाड़ने के तुरन्त बाद मुख्य खेत में इस प्रकार रोपित करें कि उनकी जड़े अधिक गहराई में न जाएँ ।ऐसा करने से पौधे शीघ्र ही स्थापित हो जाते हैं।

जल प्रबंध 

          श्री पद्धति में खेत को नम रखा जाता है। खेत में प्रत्येक 3-4 मीटर के अंतराल से जल निकास हेतु एक फीट गहरी नाली बनाएँ जिससे खेत से जल निकासी होती रहे। वानस्पतिक वृद्धि की अवस्था में जड़ों को आर्द्र रखने लायक पानी दिया जाता है, जिससे खेत में बहुत पतली दरारें उत्पन्न हो जाती हैं। ये दरारें पौधे की जड़ों को आॅक्सीजन कराती हैं, जिससे जड़ों का फैलाव व वृद्धि अच्छी होती है एवं जड़ें पोषक तत्वों को मृदा ग्रहण कर पौधे के विभिन्न भागों में पहुँचाने में अधिक सक्षम होती है। वानस्पतिक अवस्था के पश्चात् फूल आने के समय खेत को 2.5-3 सेमी. पानी से भर दिया जाता है और कटाई से 25 दिन पूर्व पानी को खेत से निकाल देते हैं।
खाद एंव उर्वरक उपयोग 
              किसी भी स्श्रोत द्वारा तैयार जैविक खाद या हरी खाद का उपयोग करने से पोषक तत्वों की उपलब्धता में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ भूमि में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा भी बढ़ती है,जो पौधे की अच्छी बढ़वार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मिट्टि परीक्षण कर पोषक तत्वों की मात्रा का निर्धारण करें। प्रारंभिक वर्षो में 10-12 टन हेक्टेयर गोबर की खाद देना चाहिए। गोबर की खाद की उपलब्धता कम होने पर 120:60:40 किग्रा. क्रमशः नत्रजन, स्फूर एंव पोटाश प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। स्फुर व पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा रोपाई से पहले तथा नत्रजन को तीन किस्तों में (25 प्रतिशत रोपाई के एक सप्ताह बाद, कंसे फूटते समय 50 प्रतिशत तथा शेष मात्रा गभोट प्रारंभ होते समय ) देना चाहिए।
खरपतवार नियंत्रण एंव निदाई 
                   खेत में पानी भरा नही रहने से खरपतवार प्रकोप अधिक हो सकता है। अतः रोपाई के 10-15 दिन बाद हस्तचलित निदाई यंत्र ताउची गुरमा(कोनो वीडर) द्वारा 15 दिन के अंदर से 2-3 बार निंदाई करते हैं, जिससे न केवल नींदा समाप्त होते हैं, वरन् जड़ों में वायु का प्रवाह भी बढ़ता है, जो जड़ों की वृद्धि व पौधों के पोषक तत्वों को ग्रहण करने की क्षमता में भी वृद्धि करता है। 
           इंदिरा गाँधी  कृषि विश्वविद्यालय व कृषि विभाग द्वारा किये गये परीक्षणों के उत्साहजनक परिणाम आये है। रायपुर में मेडागास्कर विधि के कुछ अवयवों जैसे रोपणी की उम्र, पौधे से पौधे की समान दूरी व एक स्थान पर एक पौधे की रोपाई के प्रयोग किये गये, जिसमें औसतन 48 क्विंटल  प्रति हेक्टेयर उत्पादन आया, जबकि परंपरागत उन्नत पद्धति द्वारा औसत उत्पादन 42 क्विंटल  प्रति हेक्टेयर मिला। अंबिकापुर में पूरी विधि का प्रयोग किया गया, जिसमें 15 दिन रोपा, एक स्थान पर एक पौधा, 15 ग 15 सेमी. पर रोपाई, पानी की कम मात्रा का प्रयोग व रोटरी वीडर द्वारा निंदाई व कम्पोस्ट खाद का उपयोग किया गया जिससे पारंपरिक विधि की उपज की तुलना में 16 प्रतिशत तक की उपज में बढ़ोत्तरी देखी गई। सस्य विभाग, इं. गां. कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर में कन्हार मिट्टी  में किये गये परीक्षण परिणाम बताते हैं कि श्री पद्धति में नत्रजन, स्फुर व पोटाश क्रमशः 60:40:40 किग्रा. के साथ 5 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर देने से पारंपरिक रोपा पद्धति की अपेक्षा प्रति इकाई अधिकतम कंसे, बालियाँ प्रति पौधा, दानों की संख्या प्रति बाली तथा  उपज एंव शुद्ध लाभ प्रति हेक्टेयर, अधिक प्राप्त किया जा सकता है।

चावल सघनीकरण पद्धति (एसआर आइ ) के प्रमुख लाभ  -
1. श्री पद्धति में बीज कम (5-6किग्रा.) लगता है जबकि पारंपरिक विधि में 50-60किग्रा. बीज लगता है।
2. इस पद्धति में धान की फसल से कम पानी में अधिकतम उपज ली जा सकती है।
3. उर्वरक और रासायनिक दवाओं (कीटनाशक) का कम प्रयोग किया जाता है।
4. प्रति इकाई अधिकतम कंसे (30-50) जिनमें पूर्ण रूप से भरे हुए एंव उच्चतर वजन वाले पुष्पगुच्छ (पेनिकल्स) प्राप्त होते हैं।
5. फसल में कीट-रोग प्रकोप की न्यूनतम संभावना होती है।
6. समय पर रोपाई और संसाधनों की बचत होती है।
7. अधिक उपज प्राप्त होती है।

ताकि सनद रहे: कुछ शरारती तत्व मेरे ब्लॉग से लेख को डाउनलोड कर (चोरी कर) बिभिन्न पत्र पत्रिकाओ और इन्टरनेट वेबसाइट पर अपने नाम से प्रकाशित करवा रहे है।  यह निंदिनिय, अशोभनीय व विधि विरुद्ध कृत्य है। ऐसा करना ही है तो मेरा (लेखक) और ब्लॉग का नाम साभार देने में शर्म नहीं करें।तत्संबधी सुचना से मुझे मेरे मेल आईडी पर अवगत कराना ना भूले। मेरा मकसद कृषि विज्ञानं की उपलब्धियो को खेत-किसान और कृषि उत्थान में संलग्न तमाम कृषि अमले और छात्र-छात्राओं तक पहुँचाना है जिससे भारतीय कृषि को विश्व में प्रतिष्ठित किया जा सके।


सोमवार, 15 अप्रैल 2013

मक्का से अधिक उपज एवं आमदनी हेतु सस्य तकनीक

                                                                         डॉ गजेन्द्र सिंह तोमर 
                                                                      प्राध्यापक (सश्यविज्ञान)
                                                                 इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय, 
                                                                  कृषक नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़)

                                                                 खाधान्य फसलों की रानी-मक्का
           मक्का विश्व की एक प्रमुख खाद्यान्न फसल है। मक्का में विद्यमान अधिक उपज क्षमता  और  विविध उपयोग के कारण इसे खाधान्य फसलों की रानी कहा जाता है। पहले मक्का को  विशेष रूप से गरीबो  का मुख्य भोजन माना जाता था परन्तु अब ऐसा नही है । वर्तमान में इसका उपयोग मानव आहार (24 %) के  अलावा कुक्कुट आहार (44 % ),पशु आहार (16 % ), स्टार्च (14 % ), शराब (1 %) और  बीज (1 %) के  रूप में किया जा रहा है । गरीबों का भोजन मक्का अब अपने पौष्टिक गुणों के कारण अमीरों के मेज की शान बढ़ाने लगा है। मक्का के दाने में 10 प्रतिशत प्रोटीन, 70 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 4 प्रतिशत तेल, 2.3 प्रतिशत क्रूड फाइबर, 1.4 प्रतिशत राख तथा 10.4 प्रतिशत एल्ब्यूमिनोइड पाया जाता है। मक्का के  में भ्रूण में 30-40 प्रतिशत तेल पाया जाता है। मक्का की प्रोटीन में जीन  प्रमुख है जिसमें ट्रिप्टोफेन तथा लायसीन नामक दो आवश्यक अमीनो अम्ल की कमी पाई जाती है। परन्तु विशेष प्रकार की उच्च प्रोटीन युक्त मक्का में ट्रिप्तोफेंन   एवं लाईसीन पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है जो  गरीब लोगो को  उचित आहार एवं पोषण प्रदान करता है साथ ही पशुओ  के  लिए पोषक आहार है । यह पेट के अल्सर और गैस्ट्रिक अल्सर से  छुटकारा दिलाने में सहायक है, साथ ही यह वजन घटाने में भी सहायक होता है। कमजोरी में यह बेहतर ऊर्जा प्रदान करता है और बच्चों के सूखे के रोग में अत्यंत फायदेमंद है। यह मूत्र प्रणाली पर नियंत्रण रखता है, दाँत मजबूत रखता है, और कार्नफ्लेक्स के रूप में लेने से हृदय रोग में भी लाभदायक होता है।मक्का के स्टीप जल में एक जीवाणु को पैदा करके इससे पेनिसिलीन दवाई तैयार करते हैं।
    अब मक्का को  कार्न, पॉप कार्न, स्वीट कॉर्न, बेबी कॉर्न आदि अनेको  रूप में पहचान मिल चुकी है । किसी अन्य फसल में इतनी विविधता कहां देखने को  मिलती है । विश्व के अनेक देशो  में मक्का की खेती प्रचलित है जिनमें क्षेत्रफल एवं उत्पादन के हिसाब से संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, चीन और  ब्राजील का विश्व में क्रमशः प्रथम, द्वितिय एवं तृतीय स्थान है । पिछले कुछ वर्षो  में मक्का उत्पादन के  क्षेत्र में भारत ने नये कीर्तिमान स्थापित किये है जिससे वर्ष 2010-11 में मक्का का उत्पादन 217.26 लाख टन के  उच्च स्तर पर पहुंच गया है एवं उत्पादकता 2540 किग्रा. प्रति हैक्टर के  स्तर पर है जो वर्ष 2005-06 की अपेक्षा 600 किलोग्राम . अधिक है । यही वजह है कि मक्का की विकास दर खाद्यान्न फसलो  में सर्वाधिक है जो  इसकी बढ़ती लोकप्रियता को  दर्शाती है । भारत में सर्वाधिक क्षेत्रफल में मक्का उगाने वाले  राज्यो  में कर्नाटक, राजस्थान एवं आन्ध्र प्रदेश आते है जबकि औसत  उपज के मान से आन्ध्र प्रदेश का देश में सर्वोच्च  (4873 किग्रा. प्रति हैक्टर) स्थान रहा है जबकि तमिलनाडू (4389 किग्रा)  का द्वितिय और  पश्चिम बंगाल  तृतीय (3782 किग्रा.) स्थान पर रहे है ।    छत्तीसगढ़ के सभी जिलो  में मक्के की खेती की जा रही है वर्ष 2009-10 के आँकड़ों के हिसाब से प्रदेश में 171.22 हजार हेक्टेयर (खरीफ) और 15.59 हजार हेक्टेयर में (रबी) मक्का बोई गई जिससे क्रमशः 1439 व 1550 किग्रा. प्रति हेक्टेयर ओसत उपज दर्ज की गई।

भूमि का चयन एवं खेत की तैयारी

    मक्का की खेती लगभग सभी प्रकार की कृषि योग्य भूमियों में की जा सकती है परन्तु अधिकतम पैदावार के लिए गहरी उपजाऊ दोमट मिट्टी  उत्तम होती है, जिसमे वायु संचार व जल निकास उत्तम हो तथा जीवांश पदार्थ प्रचुर मात्रा में हों। मक्का की फसल के लिए मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 के मध्य ( अर्थात न अम्लीय और  न क्षारीय) उपयुक्त रहता हैं। जहाँ पानी जमा ह¨ने की सम्भावना ह¨ वहाँ मक्के की फसल नष्ट ह¨ जाती है । खेत में 60 से.मी के अन्तर से मादा कूंड पद्धति  से वर्षा ऋतु में मक्का की बोनी करना लाभदायक पाया गया है।
भूमि की जल व हवा संधारण क्षमता बढ़ाने तथा उसे नींदारहित करने के उद्देश्य  से ग्रीष्म-काल में भूमि की गहरी जुताई करने के उपरांत कुछ समय के लिये छोड़ देना चाहिए। पहली वर्षा होने के बाद खेत में दो बार देशी हल या हैरो से जुताई  करके मिट्टी नरम बना ल्¨ना चाहिए, इसके बाद पाटा चलाकर कर खेत समतल किया जाता है। अन्तिम जोताई के समय गोबर की खाद या कम्पोस्ट मिट्टी में मिला देना चाहिए ।

उन्नत किस्में

संकर किस्में: गंगा-1, गंगा-4, गंगा-11, डेक्कन-107, केएच-510, डीएचएम-103, डीएचएम-109, हिम-129, पूसा अर्ली हा-1 व 2, विवेक हा-4, डीएचएम-15 आदि ।
सकुल किस्में: नर्मदा मोती, जवाहर मक्का-216, चन्दन मक्का-1,2 व 3, चन्दन सफेद मक्का-2, पूसा कम्पोजिट-1,2 व 3, माही कंचन, अरून, किरन, जवाहर मक्का-8, 12 व 216 , प्रभात, नवजोत आदि ।
विशिष्ट मक्का की अच्छी उपज लेने के लिए निम्नलिखित उन्नत प्रजातियों के शुद्ध एवं प्रमाणित बीज ही बोये जाने चाहिए।
1.उत्तम प्र¨टीन युक्त मक्का (क्यूपूपूपीएम): एच.क्यू  पी.एम.1 एवं 5 एवं शक्ति-1 (संकुल)
2.पाप कार्न: वी. एल. पापकार्न, अम्बर, पर्ल एवं जवाहर
3.बेबी कार्न: एच. एम. 4 एवं वी.एल. बेबी कार्न-1
4.मीठी मक्का: मधुरप्रिया एवं एच.एस.सी. -1(संकर)- 70-75 दिन, उपज-110 से 120 क्विंटल  प्रति है., 250-400  क्विंटल  हरा चारा।
5.चारे हेतु: अफ्रीकन टाल, जे-1006, प्रताप चरी-6

बोआई का समय

    भारत में मक्का की बोआई वर्षा प्रारंभ होने पर की जाती है। देश के विभिन्न भागों में (खरीफ ऋतु) बोआई का उपयुक्त समय जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम पखवाड़े तक का होता है। शोध परिणामों से ज्ञात होता है कि मक्का की अगेती बोआई (25 जून तक) पैदावार के लिए उत्तम रहती है। देर से बोआई करने पर उपज में गिरावट होती है। रबी में अक्टूबर अंतिम सप्ताह से 15 नवम्बर तक बोआई करना चाहिए तथा जायद में बोआई हेतु फरवरी के अंतिम सप्ताह से मार्च तृतीय सप्ताह तक का समय अच्छा रहता है। खरीफ की अपेक्षा रबी में बोई गई मक्का से अधिक उपज प्राप्त होती है क्योंकि खरीफ में खरपतवारों की अधिक समस्या होती है, पोषक तत्वों का अधिक ह्यस होता है, कीट-रोगों का अधिक प्रकोप होता है तथा बदली युक्त मौसम केे कारण पौधों को सूर्य ऊर्जा कम उपलब्ध हो पाती हैं।जबकि रबी ऋतु में जल एंव मृदा प्रबंधन बेहतर होता है। पोषक तत्वों की उपलब्धता अधिक रहती है। कीट,रोग व खरपतवार प्रकोप कम होता है और फसल को प्रकाश व तापक्रम इष्टतम मात्रा में प्राप्त होता है।

सही बीज दर

    संकर मक्का का प्रमाणित बीज प्रत्येक वर्ष किसी विश्वसनीय संस्थान से लेकर बोना चाहिये। संकुल मक्का  के लिए एक साल पुराने भुट्टे के बीज जो  भली प्रकार  सुरक्षित रखे  गये हो , बीज के लिए अच्छे रहते है । पहली फसल कटते ही अगले  वर्ष बोने के लिए स्वस्थ्य फसल की सुन्दर-सुडोल बाले (भुट्टे) छाँटकर उन्हे उत्तम रीति से संचित करना चाहिए । यथाशक्ति बीज को  भुट्टे से हाथ द्वारा अलग करके बाली के बीच वाल्¨ दानो  का ही उपयोग अच्छा रहता है । पीटकर या मशीन द्वारा अलग किये गये बीज टूट जाते है जिससे अंकुरण ठीक नहीं होता ।  भुट्टे के ऊपर तथा नीचे के दाने बीच के दानो  की तुलना में शक्तिशाली नहीं पाये गये है । बोने के पूर्व बीज की अंकुरण शक्ति का पता लगा लेना अच्छा होता  है । यदि अंकुरण परीक्षण नहीं किया गया है तो प्रति इकाई अधिक बीज बोना अच्छा रहता है । बीज का माप, बोने की विधि, बोआई का समय तथा मक्के की किस्म के आधार पर बीज की मात्रा  निर्भर करती है ।  प्रति एकड़ बीज दर एवं पौध  अंतरण निम्न सारणी में दिया गया है ।
                                           सामान्य मक्का     क्यूपीएम    बेबी कार्न    स्वीट कार्न    पाप कार्न    चारे हेतु
बीज दर (किग्रा. प्रति एकड़)             8-10              8           10-12            2.5-3          4-5           25-30
कतार से कतार की दूरी (सेमी)         60-75         60-75           60               75             60               30
पौधे  से पौधे  की दूरी (सेमी.)            20-25         20-22       15-20            25-30         20               10

    ट्रेक्टर चलित मेज प्लांटर अथवा देशी हल की सहायता से  रबी मे 2-3 सेमी. तथा जायद व खरीफ में 3.5-5.0 सेमी. की गहराई पर बीज बोना चाहिए। बोवाई किसी भी विधि से की जाए परंतु खेत में पौधों की कुल संख्या 65-75 हजार प्रति हेक्टेयर रखना चाहिए। बीज अंकुरण के 15-20 दिन के बाद अथवा 15-20 सेमी. ऊँचाई ह¨ने पर अनावश्यक घने पौधों की छँटाई करके पौधों के बीच उचित फासला स्थापित कर खेत में इष्टतम पौध संख्या स्थापित करना आवश्यक है। सभी प्रकार की मक्का में एक स्थान पर एक ही पौधा  रखना उचित पाया गया है ।

बीज उपचार 

    संकर मक्का के बीज पहले  से ही कवकनाशी से उपचारित ह¨ते है अतः इनको  अलग से उपचारित करने की आवश्यकता नहीं होती है । अन्य प्रकार के बीज को थायरम अथवा विटावेक्स नामक कवकनाशी  1.5 से 2.0 ग्राम प्रतिकिलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए जिससे पौधों क¨ प्रारम्भिक अवस्था में रोगों  से बचाया जा सके ।

बोआई की विधियाँ

मक्का बोने की तीन विधियाँ यथा छिटकवाँ, हल के पीछे और  डिबलर विधि प्रचलित है, जिनका विवरण यहां प्रस्तुत हैः
1.छिटकवाँ विधि:  सामान्य  तौर पर किसान छिटककर बीज बोते है तथा ब¨ने के बाद पाटा या हैरो  चलाकर बीज ढकते है । इस विधि से बोआई करने पर बीज अंकुरण ठीक से नहीं ह¨ पाता है, पौधे  समान और  उचित दूरी पर नहीं उगते  जिससे बांक्षित  उपज के लिए प्रति इकाई इश्टतम पौध  संख्या प्राप्त नहीं हो  पाती है । इसके अलावा फसल में निराई-गुड़ाई (अन्तर्कर्षण क्रिया) करने में भी असुविधा होती है । छिटकवाँ विधि में बीज भी अधिक लगता है ।
2. कतार बौनी : हल के पीछे कूँड में बीज की बोआई  सर्वोत्तम  विधि है । इस विधि में कतार से कतार तथा पौध  से पौध  की दूरी इष्टतम रहने से पौधो  का विकास अच्छा होता है । उपज अधिक प्राप्त होती है । मक्का की कतार बोनी के लिए मेज प्लान्टर का भी उपयोग किया जाता है ।
वैकल्पिक जुताई-बुवाई
        विभिन्न संस्थानो  में हुए शोध परिणामो  से ज्ञात होता है कि शून्य भूपरिष्करण, रोटरी टिलेज एवं फर्ब पद्धति जैसी तकनीको को  अपनाकर किसान भाई उत्पादन लागत को  कम कर अधिक उत्पादन ले सकते है ।
जीरो टिलेज या शून्य-भूपरिष्करण तकनीक
          पिछली फसल की कटाई के उपरांत बिना जुताई किये मशीन द्वारा मक्का की बुवाई करने की प्रणाली को जीरो टिलेज कहते हैं। इस विधि से बुवाई करने पर खेत की जुताई करने की आवश्यकता नही पड़ती है तथा खाद एवम् बीज की एक साथ बुवाई की जा सकती है। इस तकनीक से चिकनी मिट्टी के अलावा अन्य सभी प्रकार की मृदाओं में मक्का की खेती की जा सकती है। जीरो टिलेज मशीन साधारण ड्रिल की तरह ही है, परन्तु इसमें टाइन चाकू की तरह होता है। यह टाइन मिट्टी में नाली के आकार की दरार बनाता है, जिसमें खाद एवम् बीज उचित मात्रा में सही गहराई पर पहुँच जाता है।
फर्ब तकनीक से बुवाई
                 मक्का की बुवाई सामान्यतः कतारो  में की जाती है। फर्ब तकनीकी किसानों में प्रचलित इस विधि से सर्वथा भिन्न है। इस तकनीक में मक्का को ट्रेक्टर चलित रीजर-कम ड्रिल से मेंड़ों पर एक पंक्ति में बोया जाता है। पिछले कुछ वर्षों के अनुसंधान में यह पाया गया हैं कि इस तकनीक से खाद एवम् पानी की काफी बचत होती है और उत्पादन भी प्रभावित नही होता हैं। इस तकनीक से बीज उत्पादन के लिए भी मक्का की खेती की जा रही है। बीज उत्पादन का मुख्य उद्देश्य अच्छी गुणवता वाले अधिक से अधिक बीज उपलब्ध कराना है।

खाद एंव उर्वरक

    मक्का की भरपूर उपज लेने के लिए संतुलित मात्रा में खाद एंव उर्वरकों का प्रयोग आवश्यक है। मक्के को  भारी फसल की संज्ञा दी जाती है जिसका भावार्थ यह है कि इसे अधिक मात्रा  में पोषक तत्वो  की आवश्यकता पड़ती है । एक हैक्टर मक्के की अच्छी फसल भूमि से ओसतन 125 किग्रा. नत्रजन, 60 किग्रा. फॉस्फ¨रस तथा  75 किलोग्राम पोटाश ग्रहण कर लेती है।अतः मिट्टी में इन प¨षक तत्वो  का पर्याप्त मात्रा  में उपस्थित रहना अत्यन्त आवश्यक है । भूमि में नाइट्रोजन की कमी होनेपर पौधा  छोटा और  पीला रह जाता है, जबकि फॉस्फ़ोरस कम होने पर फूल व दानो  का विकास कम होता है । साथ ही साथ जडो  का विकास भी अवरूद्ध ह¨ जाता है । भूमि में पोटाश की न्यूनता पर  कमजोर पौधे  बनते है, कीट-रोग का आक्रमण अधिक होता है । पौध  की सूखा सहन करने की क्षमता कम हो  जाती है । दाने पुष्ट नहीं बनते है । मक्के की फसल में 1 किग्रा नत्रजन युक्त उर्वरक देने से 15-25 किग्रा. मक्के के दाने प्राप्त होते हैं। मक्के की फसल में पोषक तत्वो  की पूर्ति के लिए  जीवाशं तथा रासायनिक खाद का मिलाजुला  प्रयोग बहुत लाभकारी पाया गया है। खाद एंव उर्वरकों की सही व संतुलित मात्रा का निर्धारण खेत की मिट्टी परीक्षण के बाद ही तय किया जाना चाहिए।
    मक्का बुवाई से 10-15 दिन पूर्व 10-15 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी हुई गोबर की खाद खेत में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। मक्का में 150 से 180 किलोग्राम नत्रजन, 60-70 किलो ग्राम फास्फ़ोरस, 60-70 किलो ग्राम पोटाश तथा 25 किलो ग्राम जिंक सल्पेट प्रति हैक्टर देना उपयुक्त पाया गया है। संकुल किस्मो  में नत्रजन की मात्रा  उपरोक्त की 20 प्रतिशत कम देना चाहिए । मक्का की देशी किस्मो  में नत्रजन, स्फुर व पोटाश की उपरोक्त मात्रा  की आधी मात्रा  देनी चाहिए । फास्फोरस, पोटाश और जिंक की पूरी मात्रा तथा 10 प्रतिशत नाइट्रोजन को  आधार डोज (बेसल) के रूप में बुवाई के समय देना चाहिए। शेष नाइट्रोजन की मात्रा को चार हिस्सों में निम्नलिखित विवरण के अनुसार देना चाहिए।
20 प्रतिशत नाइट्रोजन फसल में चार पत्तियाँ आने के समय देना चाहिए।
30 प्रतिशत नाइट्रोजन फसल में 8 पत्तियाँ आने के समय देना चाहिए।
30 प्रतिशत नाइट्रोजन फसल पुष्पन अवस्था में हो या फूल आने के समय देना चाहिए तथा
10 प्रतिशत नाइट्रोजन का प्रयोग दाना भराव के समय करना चाहिए।

सिचाई हो समय पर 

    मक्के की प्रति इकाई उपज  पैदा करने के लिए अन्य फसलो  की अपेक्षा अधिक पानी लगता है । शोध परिणामों में पाया गया है कि  मक्के में वानस्पतिक वृद्धि (25-30 दिन) व मादा फूल आते समय (भुट्टे बनने की अवस्था में) पानी की कमी से उपज में काफी कमी हो जाती है। अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए मादा फूल आने की अवस्था में किसी भी रूप से पानी की कमी नहीं होनी चाहिए। खरीफ मौसम में अवर्षा की स्थिति में आवश्यकतानुसार दो से तीन जीवन रक्षक सिंचाई चाहिये।
    छत्तीसगढ़ में  रबी मक्का के लिए 4 से 6 सिंचाई की आवश्यकता होती है। यदि 6 सिंचाई की सुविधा हो तो 4-5 पत्ती अवस्था, पौध  घुटनों तक आने  से पहले व तुरंत बाद, नर मंजरी आते समय, दाना भरते समय तथा दाना सख्त होते समय सिंचाई देना लाभकारी रहता है। सीमित पानी उपलब्ध होने पर एक नाली छोड़कर दूसरी नाली में पानी देकर करीब 30 से 38 प्रतिशत पानी की बचत की जा सकती है। सामान्य तौर पर मक्के के पौधे 2.5 से 4.3 मि.ली. प्रति दिन जल उपभोग कर लेते है। मौसम के अनुसार मक्के को पूरे जीवन काल(110-120 दिन) में 500 मि. ली. से 750 मि.ली. पानी की आवश्यकता होती है। मक्के के खेत में जल भराव  की स्थिति में फसल को भारी क्षति होती है। अतः यथासंभव खेत में जल निकाशी की ब्यवस्था करे।

खरपतवारो से फसल की सुरक्षा 

    मक्के की फसल तीनों ही मौसम में खरपतवारों से प्रभावित होती है। समय पर खरपतवार नियंत्रण न करने से मक्के की उपज में 50-60 प्रतिशत तक कमी आ जाती है। फसल खरपतवार प्रतियोगिता के लिए बोआई से 30-45 दिन तक क्रांन्तिक समय माना जाता है। मक्का में प्रथम निराई 3-4 सप्ताह बाद की जाती है जिसके 1-2 सप्ताह बाद बैलो  से चलने वाले  यंत्रो  द्वारा कतार के बीच की भूमि गो ड़ देने से पर्याप्त लाभ होता है । सुविधानुसार दूसरी गुड़ाई कुदाल आदि से की जा सकती है । कतार में बोये गये पौधो  पर जीवन-काल में, जब वे 10-15 सेमी. ऊँचे हो , एक बार मिट्टी चढ़ाना  अति उत्तम होता है । ऐसा करने से पौधो  की वायवीय जड़ें  ढक जाती है तथा उन्हें  नया सहारा मिल जाता है जिससे वे लोटते (गिरते)नहीं है । मक्के का पोधा  जमीन पर लोट   जाने पर साधारणतः टूट जाता है जिससे फिर कुछ उपज की आशा रखना दुराशा मात्र ही होता है ।
प्रारंम्भिक 30-40 दिनों तक एक वर्षीय घास व चैड़ी पत्ती वाले खरपतवारों  के नियंत्रण हेतु एट्राजिन नामक नीदनाशी 1.0 से 1.5 किलो प्रति हेक्टेयर को 1000 लीटर पानी में घोलकर बुआई के तुरंत बाद खेत में छिड़कना चाहिए। खरपवारनाशियो  के छिड़काव के समय मृदा सतह पर पर्याप्त नमी का होना आवश्यक रहता है। इसके अलावा एलाक्लोर 50 ईसी (लासो) नामक रसायन 3-4 लीटर प्रति हक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी में मिलाकर बोआई के बाद खेत में समान रूप से छिड़कने से भी फसल में 30-40 दिन तक खरपतवार नियंत्रित रहते हैं। इसके बाद 6-7 सप्ताह में एक बार हाथ से निंदाई-गुडाई व मिट्टी चढ़ाने का कार्य करने से मक्के की फसल पूर्ण रूप से खरपतवार रहित रखी जा सकती है।

कटाई-गहाई

    मक्का की प्रचलित उन्नत किस्में बोआई से पकने तक लगभग 90 से 110 दिन तक समय लेती हैं। प्रायः बोआई  के 30-50 दिन बाद ही मक्के में फूल लगने लगते है तथा 60-70 दिन बाद ही हरे भुट्टे भूनकर या उबालकर खाने लायक तैयार हो  जाते है । आमतौर पर  संकुल एंव संकर मक्का की किस्मे पकने पर भी हरी दिखती है, अतः इनके सूखने की प्रतिक्षा न कर भुट्टो कर तोड़ाई करना  चाहिए।     एक आदमी दिन भर में 500-800 भुट्टे तोड़ कर छील सकता है । गीले भुट्टों  का ढेर लगाने से उनमें फफूंदी  लग सकती है जिससे दानों की गुणवत्ता खराब हो जाती है। अतः भुट्टों को छीलकर धूप में तब तक सुखाना चाहिए जब तक दानों में नमी का अंश 15 प्रतिशत से कम न हो जाये। इसके बाद दानों को गुल्ली से अलग किया जाता है। इस क्रिया को शैलिंग कहते है।

उपज एंव भंडारण

    सामान्य तौर पर सिंचित परिस्थितियों में संकर मक्का की उपज 50-60 क्विंटल ./हे. तथा संकुल मक्का की उपज 45-50 क्विंटल ./हे. तक प्राप्त की जा सकती है। मक्का के भुट्टो  की पैदावार लगभग 45000-50000 प्रति हैक्टर अती है । इसके अलावा 200-225 क्विंटल हरा चारा प्रति हैक्टर भी प्राप्त होता है ।

ताकि सनद रहे: कुछ शरारती तत्व मेरे ब्लॉग से लेख को डाउनलोड कर (चोरी कर) बिभिन्न पत्र पत्रिकाओ और इन्टरनेट वेबसाइट पर अपने नाम से प्रकाशित करवा रहे है।  यह निंदिनिय, अशोभनीय व विधि विरुद्ध कृत्य है। ऐसा करना ही है तो मेरा (लेखक) और ब्लॉग का नाम साभार देने में शर्म नहीं करें।तत्संबधी सुचना से मुझे मेरे मेल आईडी पर अवगत कराना ना भूले। मेरा मकसद कृषि विज्ञानं की उपलब्धियो को खेत-किसान और कृषि उत्थान में संलग्न तमाम कृषि अमले और छात्र-छात्राओं तक पहुँचाना है जिससे भारतीय कृषि को विश्व में प्रतिष्ठित किया जा सके।

रविवार, 14 अप्रैल 2013

गन्ने की पेड़ी फसल से अधिकतम उपज लेने के गुर

                                         
                                                                           डॉ गजेन्द्र सिंह तोमर 
                                                                      प्राध्यापक (सश्यविज्ञान)
                                                                 इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय, 
                                                                  कृषक नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़)


                                                      आर्थिक लाभ का साधन है गन्ने की पेड़ी फसल  
    एक बार बोए गये गन्ने की फसल  काट लेने के उपरान्त उसी गन्ने से दूसरी फसल लेने के प्रक्रिया को  पेड़ी कहते है । गन्ने की रोपी गई फसल की कटाई के उपरान्त उसी खेत में रोपित फसल की जड़ों से गन्ने के नये पौधे निकलते है। इससे गन्ने की जो फसल प्राप्त होती है उसे गन्ने की पेड़ी या जड़ी (रेटून) कहते है । आमतौर पर गन्ने की फसल से एक या दो पेड़ी की फसल अवश्य लेंना चाहिए। देश में लगभग दो तिहाई क्षेत्र में पेड़ी की फसल  ली जाती है।
    पेड़ी रखने से खेत की तैयारी, बीज एवं बुवाई का खर्च, श्रम एवं समय की बचत ह¨ती है । अतः पेड़ी फसल का उत्पादन व्यय कम आता है । पेड़ी फसल अपेक्षाकृत कम समय में पककर तैयार ह¨ जाती है जिससे उस खेत में दूसरी फसल जैसे गेहूँ, चना आदि की बुवाई समय से हो सकती है । पेड़ी की फसल शीघ्र तैयार ह¨ने के कारण चीनी मिलो  में शीघ्र पेराई कार्य शुरू हो  जाता है । पेड़ी की फसल लेने से मुख्य फसल में दी गई उर्वरको  की मात्रा  के अवशेष (विशेषकर स्फुर व पोटाश आदि) का उपयोग हो  जाता है । नई बोई गई फसल (नोलख) की अपेक्षा पड़ी फसल को  कम सिंचाई की आवश्यकता हो ती है । इस फसल से प्राप्त गन्ने में चीनी प्रतिशत अधिक पाया जाता है ।एक ही खेत में लगातार गन्ने की फसल  कई वर्ष तक खड़ी रहने के कारण फसल पर कीट-रोग का प्रकोप बढ़ जाता है । भूमि की उर्वरा शक्ति एवं उपजाऊपन में कमी होती है । कभी-कभी फसल कमजोर होने के कारण उपज कम प्राप्त होती है जिससे आर्थिक नुकसान हो  सकता है ।
गन्ना किस्म को-8 6 0 3 2 

कैसे लें  गन्ने की पेड़ी फसल से बेहतर उत्पादन

    पेड़ी फसल का उचित सस्य-प्रबन्धन न करने से गन्ने की उत्पादकता कम हो जाती है। प्रायः पेड़ी की पैदावार मुख्य फसल(नोलख) से कम होती है। पेड़ी की फसल से अधिकतम उपज लेने के लिए निम्न सस्य तकनीक अपनाना आवश्यक है ।
1. पेडी हेतु उन्ही किस्मों का चयन करें जिनमें जड़ी उत्पादन क्षमता अधिक हो, उदाहरण के लिए को-86032, को-85004 (प्रभा)आदि।
2. पेड़ी के लिये गन्ने को सही समय पर काटना चाहिये। फरवरी के पहले सप्ताह तक काटे गये गन्ने की पेड़ी अच्छी होती है।  मार्च के बाद काटे गये गन्ने की पेडी़ अच्छी नही होती हैं।
3. गन्ने की पहली फसल (नोलख) क¨ जमीन की सतह के पास से ही काटा जावें ।ऊपर से काटने पर कल्लो  की संख्या कम हो  जाती है । यदि मिट्टी चढ़ाई गई हो , तो  अच्छा यही रहेगा कि मिट्टी को  गिराने के बाद ही गन्ना काटा जाए ।
4. कटाई कें तुरंत बाद कुडें कचरे तथा सूखी पत्तियों  को आग लगाकर जला देना चाहियें। इन पत्तियों को खेत में सडा दिया जाए तो खाद का कार्य करेंगी परंतु भूमि में पत्तियां खाद के लिए छोडना होतो भूमि का उपचार आवश्यक रहता है।
5. पेड़ी वाले खेत में, जहाँ जगह खाली हो वहाँ नया गन्ना लगाएं। इस कार्य हेतु गन्ने का ऊपरी भाग प्रयोंग में लायें। गन्ने के टुकडे बोने का उचित समय वही होगा जब खेत पहली सिंचाई के बाद काम करने की स्थिति में आ जाये।
6. पेड़ी मे मुख्य फसल की तुलना मे अधिक सिंचाइयों क आवश्यकता होती है, इसलिये उसमें अधिक पानी देना चाहिये। प्रत्येक सिंचाई में 6-7 सेमी. पानी देना चाहिये। वर्षा ऋतु के पहले 15 दिन के अंतर से तथा बाद में 20 दिन के अंतर से सिंचाई करते रहना चाहिये।
7. खेत के बतर में आने पर गरेडों के दोनो ओर हल चलाकर पुरानी गरेडों (नालियाँ) को तोड़ देना चाहिए। इससे पुरानी जड़ टूट जाती है तथा भूमि में वायु संचार बढ़ जाता हैं जिससे नई जड़ों का विकास होता है।
8. पेड़ी को मुख्य फसल की अपेक्षा अधिक खाद-उर्वरक की आवश्यकता होती है। अतः इसमे गोबर की खाद 12-15 गाड़ी, 300 कि. ग्रा. नत्रजन, 75 कि.ग्रा. स्फुर व 25 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर के हिसाब से देना चाहिये।नत्रजन की एक तिहाई मात्रा तथा स्फुर व पोटाश की पूरी मात्रा गरेडों (नालियो) में   देना चाहिए। नत्रजन का दूसरा भाग, तीन माह बाद तथा शेष एक तिहाई, अंतिम बार मिट्टी चढ़ाते समय देना चाहिये।
9. खाद देने के बाद देशी हल या रिजर में पटिया बाँध कर गन्ने के ठुठों पर मिटटी चढाएँ तथा सिंचाई करें।
10. पेड़ी फसल में भी जैव उर्वरक यथा 2.5 कि. ग्रा. एजोटोबैक्टर व 5 कि. ग्रा. पी. एस. बी.प्रति हेक्टेयर का प्रयोग करने से नत्रजन व स्फुर की  लगभग 20 प्रतिशत बचत होती है।
11. कीट-बीमारियों से प्रभावित फसल की पेड़ी कभी नही लेना चहिये। पेड़ी फसल के ठुँठो  पर एमीसान -6 दवा 300 ग्रा. 400 लिटर पानी  घोलकर हजारे की  मदद से छिडकें। यदि पपड़ी कीट की आशंका हो तो उपरोक्त दवा के साथ मैलाथियान 50 ई. सी. 750 मि. ली. मिलाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें।
12. फसल पर मिटटी चढ़ाना तथा पौधों की बँधाई करना भी आवश्यक है। जब पौधों की लम्बाई 7-8 फुट हो जावे (वर्षा ऋतु) तो बँधाई का काम शुरू कर देना चाहिये।
13. पेड़ी फसल मुख्य फसल की अपेक्षा जल्दी पककर तैयार हो जाती हैं। अतः इसे पहले ही काट लेना चाहिये । जल्दी पकने वाली किस्मो  की पेडी 9-10 महीने में पककर तैयार हो जाती हैं तथा देर से पकने देर से पकने वाले गन्ने 10-12 महीने में तैयार होती है। देर से काटने पर पैदावार कम मिलने के अलावा शक्कर की मात्रा में कमी आ जाती है और गुड भी दानेदार नहीं बनता है।

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

छत्तीसगढ में गन्ने की सफल खेती कैसे

                                                                      डॉ गजेन्द्र सिंह तोमर 

                                                                      प्राध्यापक (सश्यविज्ञान)
                                                                 इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय, 
                                                                  कृषक नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़)

                                                               गन्ने का आर्थिक महत्व 

    भारतवर्ष को  गन्ने की मातृभूमि  माना जाता है। इक्षु या ईख की सृष्टि महर्षि विश्वामित्र ने की और  नवनिर्मित स्वर्ग का यह सर्वप्रथम पौधा माना जाता था। वह स्वर्ग त¨ अब नहीं है पर महर्षि की यह अमूल्य देन अब भी मानव का हित साधक बना हुआ है । गन्ना भारत वर्ष की प्रमुख नकदी फसलों में से एक है, जिसका देश में कृषि उत्पादन का सकल मूल्य लगभग 7.5 प्रतिशत है। लगभग 50 मिलियन किसान अपनी जीविका के लिए गन्ने की खेती पर निर्भर हैं और इतने ही खेतिहर मजदूर हैं, जो गन्ने के खेतों में काम करके अपनी जीविका कमाते हैं। भारत में र्निमित सभी मुख्य मीठाकारकों के लिए गन्ना एक मुख्य कच्चा माल है। इसका उपयोग दो प्रमुख कुटीर उद्योगों प्रमुख रूप से गुड़ तथा खंडसारी उद्योगों में भी किया जाता है। इन दोनों उद्योगों से लगभग 10 मिलियन टन मीठाकारकों (गुड़ और खंडसारी) का उत्पादन होता है जिससे देश में हुए गन्ने के उत्पादन का लगभग 28-35 प्रतिशत गन्ने का उपयोग होता है। गन्ने का रस सफेद शक्कर, खाण्डसारी तथा गुड़ बनाने में काम आता है। गन्ने का उपयोग विभिन्न रूपों में किया जाता है। इसके कुल उत्पादन का लगभग 35-55% शक्कर बनाने, 40 -42% गुड़ बनाने, 3-4 % खाण्डसारी व 17 -18% गन्ना चूसने के लिए किया जाता है।  मानव मात्र को  शक्ति देने के लिये जितनी भी फसल उत्पादित करते है उनमें गन्ने का सर्वश्रेष्ठ स्थान है । केवल 0.25 हैक्टर भूमि से उत्पादित गन्ने की उपज से जो  शक्ति  मिलती है वह 10 लाख कैलोरी होती है और यह एक मनुष्य के लिये वर्ष भर कार्य करने की शक्ति देने के लिये पर्याप्त है ।  भारत में शक्कर उद्य¨ग 30,000 करोड़ का व्यवसाय है  जिसका कपड़ा उद्योग के बाद दूसरा स्थान है । गन्ना पैदा करने से ल्¨कर शक्कर उत्पादन में बहुत बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार उपलब्ध  है।  चीनी, गन्ने की खोई तथा शीरा  गन्ना उद्योग के मुख्य सह-उत्पाद हैं। शराब  बनाने में प्रयुक्त होने वाला शीरा भी गन्ने से ही प्राप्त होता है। साधारण चीनी कारखाने में 100 टन गन्ने से औसतन  10 टन शक्कर, 4 टन, शीरा 3 टन प्रेस मड (जैव उर्वरक में प्रयोग होता है) तथा 30 टन ख¨ई प्राप्त होती है । इसके अलावा 30 टन गन्ने का ऊपर का भाग और  पत्तियाँ भी निकलती है जिसे चारे या खाद के रूप में प्रयोग किया जा सकता है । इसकी खोई से कागज, कार्डबोर्ड आदि बनाये जाते है। गन्ने का ऊपरी भाग (अगोला) पशुओं के लिए पौष्टिक चारे के रूप में उपयोग रहता है।
      भारत में गन्ने की खेती लगभग 4.42 मिलियन हेक्टेयर  क्षेत्रफल में की जा रही है जिससे 285.03 मिलियन टन गन्ना  उत्पादन प्राप्त होता है । देश में गन्ने की औसत उपज  69 टन  प्रति हेक्टेयर है।  भारत में सम्पूर्ण गन्ना उत्पादन की दृष्टि से उत्तर प्रदेश का प्रथम, महाराष्ट्र का द्वितीय तथा तमिलनाडु का तृतीय स्थान है । औसत उपज के मान से तमिलनाडू (106197 किग्रा), पश्चिम बंगाल (93085 किग्रा.) तथा  कर्नाटक (83018 किग्रा.) का क्रमशः प्रथम, द्वितिय एवं तृतीय स्थान है  । देश में 93.2 प्रतिशत  सिंचित क्षेत्र  में गन्ने की फसल  ली जाती है । छत्तीसगढ़ के  कबीरधाम, जगदलपुर, सरगुजा, दुर्ग, बिलासपुर व रायपुर जिलो  में गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है । सर्वाधिक उत्पादन देने वाले  जिलो  में कबीरधाम, जगदलपुर एवं सरगुजा जिले  आते है। छत्तीसगढ़ में गन्ने की खेती 23.61 हजार हेक्टेयर में की जाती है जिससे 65.36 हजार टन गन्ना उत्पादित होता है। छत्तीसगढ़ में गन्ने की औसत उत्पादकता 27.68 टन प्रति हेक्टेयर है जो राष्ट्रीय उत्पादकता (69 टन प्रति हे.) से काफी कम है। एक अनुमान के अनुसार भारत में वर्ष 2020 तक चीनी एवं मिठास उत्पादन की 27.39 मिलियन टन की अनुमानित मांग संभावित है  । इस लक्ष्य को  प्राप्त करने के लिए 100 टन प्रति हैक्टर औसत उपज तथा  11 प्रतिषत चीनी प्रत्यादन के साथ 415 मिलियन टन तक गन्ने के उत्पादन में वृद्धि का लक्ष्य हमारे सामने है । इसके लिए गन्ना फसल के अन्तर्गत क्षेत्र  विस्तार के अलावा बेहतरीन सुधरी हुई प्रजातियो और  उन्नत तकनीकी के माध्यम से प्रति इकाई क्षेत्र  में गन्ने की उपज में   बदोत्तरी  तथा चीनी प्रतिदान में यथोचित वृद्धि लाने की महती आवश्यकता है । छत्तीसगढ में कबीरधाम, बाल¨द (दुर्ग) एवं सरगुजा में सहकारी शक्कर कारखाने स्थापित किये गये है । अतः गन्ना क्षेत्र विस्तार और  उत्पादन की अपार संभावनाएं है । गन्ने की अधिकतम उपज तथा  आर्थिक लाभ के लिए उन्नत किस्मो  के बीज और  उत्पादन की आधुनिक तकनीक  विस्तार करने की आवश्यकता है । छत्तीसगढ़ राज्य मे गन्ना उत्पादन और  औसत उपज बढ़ाने के लिए आधुनिक सस्य तकनीक के प्रमुख पहलू अग्र प्रस्तुत है ।

गन्ना खेती के लिए उपयुक्त है छत्तीसगढ़ की जलवायु

    गन्ना के लिए उष्ण कटिबन्धीय जलवायु की आवश्यकता पड़ती है। गन्ना बढ़वार के समय लंबी अवधि तक गर्म व नम मौसम तथा अधिक वर्षा का होना सर्वोत्तम पाया गया है। गन्ना बोते समय साधारण तापमान, फसल तैयार होते समय आमतौर पर शुष्क व ठण्डा मौसम, चमकीली धूप और पाला रहित रातें उपयुक्त रहती है। छत्तीसगढ़ क¨ प्रकृति ने ऐसी ही जलवायु से नवाजा है । गन्ने के अंकुरण के लिए 25-32 डि से.  तापमान  उचित रहता है। गन्ने की बुआई और फसल बढ़वार के लिए 20- 35 डि से. तापक्रम उपयुक्त रहता है। इससे कम या अधिक तापमान पर वृद्धि घटने लगती है। गन्ने की खेती उन सभी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जा सकती है जहाँ वार्षिक वर्षा 75 - 120 सेमी. तक होती है। समय पर वर्षा न होने पर सिंचाई आवश्यक है। पानी की कमी होने पर गन्ने मे रेशे अधिक उत्पन्न होते हैं और अधिक वर्षा में शक्कर का प्रतिशत कम हो जाता है। गन्ने की विभिन्न अवस्थाओं के लिए आर्द्रता 56 - 87 प्रतिशत तक अनुकूल होती है। सबसे कम आर्द्रता कल्ले बनते समय एवं सबसे अधिक, गन्ने की वृद्धि के समय चाहिए। सूर्य के प्रकाश  की अवधि एवं तापमान का गन्ने में सुक्रोज निर्माण पर अधिक प्रभाव पड़ता है। प्रकाश की उपस्थिति में कार्बोहाइड्रेट बनता है जिससे गन्ने के भार में वृद्धि होती है। लम्बे दिन तथा तेज चमकदार धूप से गन्ने में कल्ले अधिक बनते हैं। तेज हवाएँ गन्ने के लिए हानिकारक है क्योंकि इससे गन्ने गिर जाते हैं जिससे गन्ने की उपज और गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

भूमि का चयन एवं खेत की तैयारी

    गन्ने की खेती बलुई दोमट से  दोमट और भारी मिट्टी मे सफलता पूर्वक की जा सकती है परंतु गहरी तथा उत्तम जल निकास वाली दोमट मृदा जिनकी मृदा अभिक्रिया 6.0 से 8.5 होती है, सर्वात्तम रहती है। उचित जल निकास वाली जैव पदार्थ व पोषक तत्वो से परिपूर्ण भारी मिट्टियो  में भी गन्ने की खेती सफलतार्पूक की जा सकती है।  अम्लीय मृदाएं  इसकी खेती के लिए हांनिकारक होती है।
    गन्ने की पेड़ी लेने के कारण इसकी फसल लम्बे समय (2 - 3 वर्ष) तक खेत में रहती है । इसलिए खेत की गहरी जुताई आवश्यक है। खेत तैयार करने के लिए सबसे पहले पिछली फसल के अवशेष भूमि से हटाते है। इसके बाद जुताई  की जाती है और जैविक खाद मिट्टी में मिलाते है। इसके लिए रोटावेटर उपकरण उत्तम रहता है। खरीफ फसल काटने के बाद खेत की गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से की जाती है । इसके बाद 2 - 3 बार देशी हल अथवा कल्टीवेटर से जुताई करने के पश्चात् पाटा चलाकर खेत की मिट्टी को भुरभुरा तथा खेत समतल कर लेना चाहिए। हल्की मिट्टियो  की अपेक्षा भारी मिट्टी में अधिक जुताईयाँ करनी पड़ती है ।

बेहतर उपज के लिए अपनाएं  उन्नत किस्में

         गन्ने की उपज क्षमता का पूर्ण रूप से दोहन करने के लिए उन्नत किस्मो  के स्वस्थ बीज का उपयोग क्षेत्र विशेष की आवश्यकता के अनुरूप करना आवश्यक है। रोग व कीट मुक्त बीज नई फसल (नोलख फसल) से लेना चाहिए। गन्ने की पेड़ी फसल को  बीज के रूप में प्रयुक्त नहीं करना चाहिए। छत्तीसगढ. के लिए अनुमोदित गन्ने की नवीन उन्नत किस्मों की विशेषताएँ यहाँ प्रस्तुत है ।

1.को -8371(भीम): यह किस्म नवम्बर-जनवरी में लगाने के लिए उपयुक्त है । स्मट रोग रोधी, सूखा व जल जमाव सहनशील । इसकी उपज 117.7 टन प्रति हैक्टर तथा रस में 18.6 प्रतिषत शुक्रोस पाया जाता है ।
2.को -85004 (प्रभा): शीघ्र तैयार ह¨ने वाली इस किस्म की उपज क्षमता 90.5 टन  प्रति हैक्टर  है तथा रस में 19.5 प्रतिशत शुक्र¨स ह¨ता है ।  नवम्बर-जनवरी में लगाने के लिए यह उपयुक्त किस्म  है । यह स्मट   रोग रो धी , रेड रॉट से मध्यम प्रभावित, पेड़ी फसल हेतु उपयुक्त किस्म है।
3.को -86032 (नैना): मध्यम समय में तैयार ह¨ने वाली इस किस्म से 102 टन  प्रति हैक्टर उपज  प्राप्त ह¨ती है एवं रस में 20.1 प्रतिशत शुक्र¨स ह¨ता है । मैदानी क्षेत्रो  में नवम्बर-जनवरी में लगाने हेतु उपयुक्त है । स्मट व रेड रॉट रोग रो धी ह¨ने के साथ साथ सूखा र¨धी किस्म है ज¨ पेड़ी फसल के लिए उपयुक्त है ।
4 .को -87044 (उत्तरा): मध्य समय में तैयार होने वाली यह किस्म नवम्बर-जनवरी में लगाने के लिए उपयुक्त है । उपज 101 टन  प्रति हैक्टर तथा रस में शुक्र¨स 18.3 प्रतिशत । स्मट रोग मध्य अवरोधी तथा रेड रोट रोग से मध्य प्रभावित है।
5 .को -88121(कृष्ना):मध्य समय में तैयार होने वाली यह किस्म छत्तीसगढ में  नवम्बर-जनवरी में लगाने के लिए उपयुक्त किस्म है । उपज 88.7 टन  तथा रस में 18.6 प्रतिषत शुक्रोश  पाया जाता है । स्मट रोग रो धी, सूखा सहन यह किस्म गुड़ बनाने के लिए श्रेष्ठ है ।
पायरिल्ला प्रभावित क्षेत्रो के लिए: को. जेएन. 86 - 141 उपयुक्त है।
गुड़ के लिए: को. जेएन. 86 - 141 (सूखा सहनशील), को जेएन. 86 - 572 (चूसने हेतु नरम), को. जेएन. 86 - 2072, को. 86032 (जड़ी फसल के लिए उत्तम), को. जेएन, 86 - 2087 उपयुक्त किस्म है।
गन्ने की अन्य प्रमुख उन्नत किस्मों की विशेषताएँ
किस्म का                          शक्कर        अवधि            गन्ना पैदावार
नाम                                     (%)           (माह)              (टन/हे.)
को. जेएन. 86 - 141            21.10        10 - 12            90 - 100
को. जेएन. 86 - 572            20.01        10 - 12            90 - 110
को. 7314                            18.80        10 - 12            90 - 100
को. जेएन. 86 - 2072          19.90        10 - 12            90 - 100
को. 7219                            18.16        12 - 14            100 - 120
को. 86032                          17.18        12 - 14            110 - 120
को. 7318                            18.16        12 - 14            100 - 120
को. 6304                            18.80        12 - 14            100 - 120
को. जेएन. 86 - 600            19.06        12 - 14            100 - 120
को. जेएन. 86 - 2087          19.04        12 - 14            100 - 120
को. पंत 90 - 223                 18.02        12 - 14            100 - 120
को. पंत 92 - 227                 18.03        12 - 14            100 - 120

गन्ना बोआई-रोपाई का समय

    गन्ने की बुआई के समय वातावरण का तापमान 25 - 32 डिग्री से.गे. अच्छा माना जाता है। भारत के उत्तरी राज्यों में इतना तापमान वर्ष में दो बार रहता है - एक बार अक्टूबर-नवम्बर में तथा दूसरी बार फरवरी-मार्च में। अतः इन दोनों ही समय पर गन्ना बोया जा सकता है। भारत में गन्ने की बुआई शरद ऋतु (सितम्बर - अक्टूबर), बसन्त ऋतु (फरवरी - मार्च) एवं वर्षा ऋतु (जुलाई) में की जाती है।छत्तीसगढ़ में शरद व बसंत ऋतु में ही गन्ना ब¨या जाना लाभप्रद है ।
1. शरद कालीन बुआई: वर्षा ऋतु समाप्त होते ही शरद कालीन गन्ना लगाया जाता है। गन्ना लगाने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर - नवम्बर रहता है। देर से बुआई करने पर तापक्रम घटने लगता है, फलस्वरूप अंकुरण कम होता है और उपज में कमी आ जाती है। फसल वृद्धि के लिए लम्बा समय, भूमि में नमी का उपयुक्त स्तर और प्रारम्भिक बढ़वार के समय अनुकूल मौसम मिलने के कारण शरद ऋतु की बुआई से 15-20 प्रतिशत अधिक उपज और रस में शक्कर की मात्रा ज्यादा प्राप्त होती है।
2. बसंत कालीन बुआई: रबी फसलों की कटाई के बाद बसंत कालीन गन्ने की बुआई फरवरी - मार्च मे की जाती है। भारत मे लगभग 85 प्रतिशत क्षेत्र में गन्ने की बुआई इसी ऋतु में की जाती है। इस समय बोई गई गन्ने की फसल को 4 - 5 माह का वृद्धि काल ही मिल पाता है और चरम वृद्धि काल के दौरान फसल को नमी की कमी और अधिक तापक्रम तथा गर्म हवाओं का सामना करना पड़ता है जिससे शरद कालीन बुआई की अपेक्षा बसंतकालीन गन्ने से उपज कम प्राप्त होती है।

कैसा हो  गन्ने का बीज

    उत्तर भारत मे गन्ने की फसल मे बीज नहीं बनते है। अतः गन्ने की बुआई वानस्पतिक प्रजनन (तने के टुकड़ों) विधि से की जाती है। गन्ना बीज चयन एवं बीज की तैयारी से सम्बन्धित निम्न बातें ध्यान में रखना आवश्यक है।
1. बीज के लिए गन्ने का भाग
    अपरिपक्व गन्ने अथवा गन्ने के ऊपरी भाग का प्रयोग बीज के लिए करना चाहिए । वस्तुतः गन्ने के ऊपरी हिस्से से लिये गये बीज शीघ्र अंकुरित ह¨ जाते है, जबकि निचले भाग से लिए गए टुकड़े देर से जमते है, क्योंकि ऊपरी भाग की आँखे  ताजी एवं स्वस्थ होने के कारण शीघ्र जम जाती है, जबकी निचले भाग की पुरानी आँख पर एक कठोर परत जम जाती है जो अंकुरण में बाधक होती है। गन्ने के ऊपरी 1/3 हिस्से में घुलनशील नत्रजन युक्त पदार्थ, नमी तथा ग्लूकोज की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है जिससे गन्ने के टुकड़ो को अंकुरण के लिए तुरन्त शक्ति मिल जाती है और जमाव शीघ्र हो जाता है। गन्ने के निचले हिस्से में सुक्रोज (जटिल अवस्था में) होने से देर में अंकुरण होता है। इसके अलावा ऊपरी भाग में पोर छोटे होते है। इसलिए पंक्ति की प्रति इकाई लम्बाई में अपेक्षाकृत अधिक कलियाँ पाई जा सकती है और इस प्रकार रिक्त स्थान होने की संभावना कम हो जाती है।
    फूल आने के बाद गन्ना का प्रयोग बुआई के लिए नहीं करना चाहिए क्योंकि गन्ने में पिथ बनने के कारण अंकुरित होने वाले भाग में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है।
2. गन्ने को टुकड़ों में काटकर बोना
    गन्ना के पूरे तने को  न बोकर इसको काटकर (2 - 3 आँख वाले टुकड़े) छोटे - छोटे टुकड़ों में बोया जाता है। क्योकि गन्ने के पौधे या तने में शीर्ष सुषुप्तावस्था  पाई जाती है। यदि पूरा गन्ना  बगैर काटे बो दिया जाता है, तो उसका ऊपरी हिस्सा त¨ अंकुरित ह¨ जाता है परन्तु नीचे वाला भाग नहीं जमता। गन्ने के पेड़ में कुछ ऐसे हार्मोन्स भी पाये जाते है जो पौधें में ऊपर से नीचे की अ¨र प्रवाहित ह¨ते है तथा इन हार्मोन्स का प्रभाव नीचे की आँख के ऊपर प्रतिकूल पड़ता है। कुछ हार्मोन्स गन्ने की आँख या कली को विकसित होने से रोकते है । गन्ने को  टुकड़ो  में काट कर बोने से इन हार्मोन्स का प्रवाह रूक जाता है। जिससे प्रत्येक आँख अपना कार्य सही ढंग से करने लगती है। इसके अलावा गन्ने को टुकड़ों में काटने से कटे हुए हिस्सों से पानी एवं खनिज लवण शीघ्र प्रवेश कर जाते है, जो शीघ्र अंकुरण में सहायक होते है।
3. गन्ने के टुकड़ो  को  सीधा नहीं तिरछा काटा जाए
    बीज के लिए गन्ने के टुकड़ो  को हमेशा तिरछा काटा जाना चाहिए क्योंकि सीधा काटने से गन्ना फट जाता है जिससे उनसे काफी रस निकल जाता है और बीज में कीट-रोग लगने की संभावना भी बढ़ जाती है। तिरछा काटने से गन्ना फटता नहीं है और उसका जल-लवण अवशोषण क्षेत्र  भी बढ़ जाता है। शीघ्र अंकुरण के लिए टुकड़ो  का अधिक अवशोषण क्षेत्र सहायक होता है। सीधा काटने से कटा क्षेत्र कम रहता है अर्थात्  अवशोषण क्षेत्र समिति होता है।बोआई के लिए गन्ने के तीन आँख वाले टुकड़े सर्वोत्तम माने जाते है, परन्तु आमरतोर पर  अब दो  आँख वाले  टुकडे  का प्रयोग होने लगा है ।

सही हो बीज बोने की दर 

    गन्ने की बीज दर  टुकड़े के अंकुरण प्रतिशत, गन्ने की किस्म, बोने के समय आदि कारको  पर निर्भर करती है। सामान्यतौर पर गन्ने की 50-60 प्रतिशत कलिकायें ही अंकुरित होती है। नीचे की आँखें अपेक्षाकृत कम अंकुरित होती है। बोआई हेतु मोटे गन्ने की मात्रा अधिक एवं पतले गन्ने की मात्रा कम लगती है। शरदकालीन  ब¨आई में गन्ने में अंकुरण प्रतिशत अधिक होता है। अतः बीज की मात्रा भी कम लगती है। बसंतकालीन गन्ने में कम अंकुरण होने के कारण अपेक्षाकृत अधिक बीज लगता है। एक हेक्टेयर ब¨आई के लिए तीन कलिका वाले 35,000 - 40,000 (75 - 80 क्विंटल ) तथा दो कलिका वाले 40,000 - 45,000 (80 - 85  क्विंटल ) टुकड़ों की आवश्यकता पड़ती है। इन टुकड़ों को आँख - से - आँख  या सिरा - से - सिरा मिलाकर लगाया जाता है। गन्ने के टुकड़ों को 5 - 7 सेमी. गहरा बोना चाहिए तथा कलिका  के ऊपर 2.5 से. मी. मिट्टी चढ़ाना चाहिए।

बीज उपचार से फसल सुरक्षा 

    फसल को रोगो  से बचाव हेतु गन्ने के टुकड़ो को एमीसान नामक कवकनाशी की  250 ग्राम  मात्रा को 200 लीटर पानी के घोल में 5 से 10 मिनट तक डुबाना चाहिये। इस दवा के न मिलने पर 600 ग्राम डायथेन एम - 45 का प्रयोग करना चाहिए । रस चूसने वाले कीड़ो की रोकथाम के लिए उक्त घोल में 500 मि. ली. मेलाथियान कीटनाशक मिला लेना चाहिए। गन्ने के टुकड़ों को लगाने के पूर्व मिट्टी के तेल व कोलतार के घोल  अथवा क्लोर¨पायरीफाॅस दवा को 2.5  मिली मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर गन्ना बीज के टुकड़ों के किनारों को डुबाकर उपचारित करने से दीमक आदि भूमिगत कीटो का प्रकोप कम हो जाता है। अच्छे अंकुरण के लिए बीजोपचार से पूर्व गन्ने के बीजू टुकड़ों को 24 घन्टे तक पानी में डुबाकर रखना चाहिए। गन्ना कारखाने में उपलब्ध नम - गर्म हवा संयंत्र में (54 डि. से. पर 4 घंटे तक) गन्ने के टुकड़ों को उपचारित करने पर बीज निरोग हो जाता है।

गन्ना लगाने की विधियाँ

    गन्ने की बुवाई सूखी या पलेवा की हुई गीली दोनो  प्रकार की भूमि पर की जाती है । सूखी भूमि में  पोरिया (गन्ने के टुकड़े) डालने के तुरन्त बाद सिंचाई की जाती है  । गीली बुवाई में पहले  पानी नालियो या खाइयो  में छोड़ा जाता है और फिर गीली भूमि में पोरियो  को रोपा जाता है । गन्ने की बुआई भूमि की तैयारी , गन्ने की किस्म, मिट्टी का प्रकार, नमी की उपलब्धता, बुआई का समय आदि के अनुसार निम्न विधियों से की जाती है:
1. समतल खेत में गन्ना बोना: इसमें 75 - 90 सेमी. की क्रमिक दूरी पर देशी हल या हल्के डबल मोल्ड बोर्ड हल से 8 - 10 सेमी. गहरे कूँड़ तैयार किये जाते है। इन कूडों में गन्ने के टुकड़ों की बुआई (एक सिरे से दूसरे सिरे तक) करके पाटा चलाकर  मिट्टी से 5-7 सेमी. मिट्टी से ढंक दिया जाता है। आज कल  ट्रेक्टर चालित गन्ना प्लांटर से भी बुआई की जाती है।
2. कूँड़ में गन्ना बोनाः इस विधि  मे गन्ना रिजर द्वारा उत्तरी भारत में  10 - 15 सेमी. गहरे कूँड़ तथा दक्षिण भारत मे 20 सेमी. गहरे कूँड़ तैयार किये जाते है। गन्ने के टुकड़ों को एक - दूसरे के सिरे से मिलाकर इन कूँड़¨ में बोकर ऊपर से 5-7 सेमी. मिट्टी चढ़ा देते है । इस विधि में बुवाई के तुरन्त बाद पानी दे दिया जाता है, पाटा नहीं लगाया जाता ।
3. नालियों में गन्ना बोना: गन्ने की अधिकतम उपज लेने के लिए यह श्रेष्ठ विधि है ।गन्ने की बुआई नालियों में करने के लिए 75 - 90 सेमी. की दूरी पर 20 - 25 सेमी. गहरी एवं 40 सेमी. चौड़ी नालियाँ बनाई जाती है। सामान्यतः 40 सेमी. की नाली और 40 सेमी. की मेढ़ बनाते है। गन्ने के टुकड़ों को  नालियों के मध्य में लगभग 5 - 7 सेमी. की गहराई पर बोते है तथा कलिका के ऊपर 2.5 सेमी. मिट्टी होना आवश्यक है। प्रत्येक गुड़ाई के समय थोड़ी सी मिट्टी मेढ़ो की नाली में गिराते रहते है। वर्षा आरम्भ होने तक मेढ़ो की सारी मिट्टी नालियों में भर जाती है और खेत समतल हो जाता है। वर्षा आरंभ हो जाने पर गन्ने में  नत्रजन की टापड्रेसिंग करके जड़ों पर मिट्टी चढ़ा देते हैं। इस प्रकार मेढ़ों के स्थान पर नालियाँ और नालियों के स्थान पर मेढ़ें बन जाती हैं। इन नालियों द्वारा जल निकास भी हो जाती है। इस विधि से गन्ना लगाने के लिए ट्रेक्टर चालित गन्ना प्लान्टर यंत्र सबसे उपयुक्त रहता है। नालियो  में गन्ने की रोपनी करने से फसल गिरने से बच जाती है । खाद एवं पानी की बचत होती है । गन्ने की उपज में 5-10 टन प्रति हैक्टर की वृद्धि होती है । गन्ना नहीं गिरने से चीनी की मात्रा  में भी वृद्धि पायी जाती है ।
4. गन्ना बोने की दूरवर्ती रोपण विधि (स्पेस ट्रांस्प्लान्टिंग):  यह विधि भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ द्वारा विकसित की गई है । इसमें 50 वर्ग मीटर क्षेत्र में (1 वर्ग मीटर की 50 क्यारियाँ) पोधशाला बनाते हैं। इनमें एक आँख वाले 600 - 800 टुकड़ें लगाते हैं। इसमें सिर्फ 20  क्विंटल ही  बीज  लगता है। बीज हेतु गन्ने के  ऊपरी भाग का ही प्रयोग करना चाहिए। क्यारियों में नियमित रूप से सिंचाई करें। बीज लगाने के 25 - 30 दिन बाद (3 - 4 पत्ती अवस्था) पौध को मुख्य खेत में रोपना  चाहिए। इस विधि से गन्ना लगाने हेतु पौध स्थापित होने तक खेत में नमी रहना आवश्यक है। इस विधि से बीज की बचत होती है। खेत में पर्याप्त गन्ना (1.2 लाख प्रति हे.) स्थापित होते हैं। फसल में कीट-रोग आक्रमण कम होता है। परंपरागत विधियों की अपेक्षा लगभग 25 प्रतिशत अधिक उपज मिलती है।
5. गन्ना बोने की दोहरी पंक्ति विधिः भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ द्वारा विकसित गन्ना लगाने की यह पद्धति अच्छी उपजाऊ एवं सिंचित भूमियो  के लिए उपयुक्त रहती है । दोहरी पंक्ति विधि में गन्ने के दो  टुकड़ो  को  अगल-बगल बोया जाता है जिससे प्रति इकाई पौध घनत्व बढ़ने से पैदावार में 25-50 प्रतिशत तक बढोत्तरी होती है ।

अधिकतम उपज के लिए खाद एवं उर्वरक 

             गन्ने की 100 टन प्रति हे. उपज देने वाली फसल भूमि से लगभग 208 किलो नत्रजन, 53 किलो फास्फोरस तथा  280 किलो पोटाश ग्रहण करती है। अतः वांक्षित उत्पादन के लिए गन्ने में खाद एवं उर्वरको  को  सही एवं संतुलत मात्रा में  देना आवश्यक रहता है । खेत की अंतिम जुताई के पूर्व 10-12 टन प्रति हेक्टेयर अच्छी सड़ी गोबर की खाद भूमि में मिला दें। यदि मिट्टी  परीक्षण  नहीं किया गया है तो प्रति हे. 120 - 150 किग्रा. नत्रजन, 80 किग्रा. स्फुर व 60 किग्रा. पोटाश की अनुशंसा की जाती है। यदि भूमि मे जस्ते की कमी हो तो 20 से 25 किग्रा. जिंक सल्फेट प्रति हे. गन्ना लगाते समय देना चाहिए । बसन्तकालीन फसल में नत्रजन की आधी मात्रा तथा स्फूर और पोटाश की पूरी मात्रा गन्ना लगाने के समय कूँड़ में डालें । नत्रजन की शेष मात्रा बआई के 80 - 90 दिन बाद दी जाना चाहिए । शरदकालीन गन्ने में भी नत्रजन की आधी मात्रा तथा स्फूर और पोटाश की पूरी मात्रा गन्ना लगाने के समय कूँड़ में डालें। नत्रजन की शेष मात्रा बुआई के 110 - 120 दिन बाद दी जानी चाहिए। पोषक तत्वो  की कुल आवश्यकता का एक तिहाई हिस्सा गोबर की खाद या कम्पोस्ट द्वारा तथा शेष दो तिहाई भाग रसायनिक उर्वरक के रूप मे देने से गन्ने के उत्पादन व गुणवत्ता में वृद्धि होती है तथा भूमि की उर्वरा शक्ति में सुधार होता है। इस तरह उर्वरकों का प्रयोग करने पर अधिक लाभ व उत्पादन मिलता है।

समय पर सिंचाई और जल निकासी

    गन्ने की फसल को जीवन काल में 200-300 सेमी. पानी की आवश्यकता होती है। फसल की जलमांग  क्षेत्र, मृदा का प्रकार, किस्म, बुआई का समय और बोने की विधि पर निर्भर करती है। गन्ने की विभिन्न अवस्थाओं में जल माँग को निम्नानुसार विभाजित किया गया है -
    फसल अवस्थाएँ                        समय (दिन)        जलमाँग (सेमी.
1.    अंकुरण                                   बुआई से 45            30
2.    कल्ले बनने की अवस्था              45 से 120            55
3.    वृद्धि काल                                 120 से 270            100
4.    पकने की अवस्था                      270 से 360            65                        
    गन्ने में सर्वाधिक पानी की माग बुआई के 60 दिन से लेकर 250 दिन तक होती है। फसल में प्रति सिंचाई 5-7 सेमी. पानी देनी चाहिए। गर्मी में 10 दिन व शीतकाल में 15 से 20 के अंतर से सिंचाई करें। मृदा में उपलब्ध नमी 50 प्रतिशत तक पहुचते ही गन्ने की फसल में सिंचाई कर देनी चाहिए। शरदकालीन फसल के लिए औसतन 7 सिंचाईयाँ (5 मानसून से पहले व 2 मानसून के बाद) और बसन्तकालीन फसल के लिए 6 सिंचाईयों की आवश्यकता पड़ती है। पानी की कमी वाली स्थिति में गरेडों  में सूखी पत्तियाँ बिछाने से सिंचाई संख्या कम की जा सकती हैं। खेत को छोटी-छोटी क्योरियों में बाँटकर नालियों मे सिंचाई करना चाहिए। फव्वारा विधि से सिंचाई करने से पानी बचत होती है तथा उपज में भी बढोत्तरी होती है।
    वर्षा ऋतु में मृदा मे उचित वायु संचार बनाये रखने के लिए जल - निकास का प्रबन्ध करना अति आवश्यक ह। इसके लिए नाली में बोये गये गन्ने की नालियों को बाहरी जलनिकास नाली से जोड़ देना चाहिए। जल निकास के अभाव मे जड़ों का विकास ठीक से नहीं होता है। सबसे अधिक क्रियाशील द्वितीयक जड़े मरने लगती है। पत्तियाँ पीली पड़ जाती है जिससे प्रकाश संश्लेषण  की क्रिया मन्द पड़ जाती है। गन्ने की उपज और सुक्रोज की मात्रा घट जाती है। अतः सिंचाई के साथ साथ गन्ने मे जल निकास भी आवश्यक है।

गन्ना विकास हेतु आवश्यक है पौधो  पर मिट्टी चढ़ाना

    गन्ने में खरपतवार नियंत्रण एवं अंकुरण बढ़ाने के उद्देश्य से गन्ने के अंकुरण से पहले  ही खेत की गुड़ाई की जाती है जिसे अंधी गुड़ाई  कहते है। इसका  प्रमुख उद्देश्य वर्षा के पश्चात् मृदा पपड़ी  को तोड़ना, कड़ी मिट्टी को ढीला करना, गन्ने के खुले टुकड़ों को ढँकना, खरपतवारों  को नष्ट करना तथा सड़े - गले टुकड़ों को निकालकर अंकुरित गन्ने को बोना है। इससे ख्¨त में वायु संचार तथा मृदा नमी संरक्षण भी ह¨ता है । गुड़ाई का यह कार्य कुदाली अथवा बैल चालित कल्टीवेटर द्वारा किया जा सकता है।इसके बाद गन्ने को गिरने से बचाने के लिए दो बार गुड़ाई करके पौधों पर मिट्टी चढाना   चाहिए। अप्रैल या मई माह में प्रथम बार व जून माह में दूसरी बार यह कार्य करना चाहिए। गुड़ाइयों से मिट्टी में वायु संचार, नमी धारण करने की क्षमता,  खरपतवार नियंत्रण तथा कल्ले विकास मे प्रोत्साहन मिलता है।

गन्ने के पौधो को  सहारा भी देना है 

    गन्ने की फसल को गिरने  से बचाने हेतु जून - जुलाई में  बँधाई की क्रिया  की जाती है। इसमें गन्नों के झुड   को जो कि समीपस्थ दो पंक्तियों में रहते हैं, आर - पार पत्तियों से बाँध देते है। गन्ने की हरी पत्तियों के समूह को एक साथ नहीं बाँधते है क्यांेकि इससे प्रकाश संश्लेषण बाधित होती है। लपेटने  की क्रिया में एक - एक झुंड को पत्तियों के सहारे तार या रस्सी से लपेट देते है और बाँस या तार के सहारे तनों को खड़ा रखते है। यह खर्चीली विधि है। इसके लिए गुडीयत्तम की विधि सर्वोत्तम है। इस विधि में जब गन्ने के तने 75 - 150 सेमी. के हो जाते है तब नीचे की सूखी एवं हरी पत्तियों की सहायता से रस्सियाँ बांध ली जाती है और उन्हे गन्ने की ऊँचाई तक लपेट देते है। इससे गन्ने की कोमल किस्में फटती नहीं है। सहारा देना  विधि से बाँधे या लपेटे हुए झुंडों  को सहारा देने के लिए बाँस या तार का प्रयोग करते है। उपर्युक्त क्रियाओं से गन्ने का गिरना रूक जाता है और उपज में भी वृद्धि होती है।  

खरपतवारो को रखे काबू में 

    शदरकालीन  गन्ने का अंकुरण 3 - 4 सप्ताह में तथा बसन्तकालीन गन्ने का अंकुरण 4 - 5 सप्ताह में हो जाता है गन्ने की बुआई के 1 - 2 सप्ताह बाद एक प्रच्छन गुडाई  करनी चाहिए। इससे अंकुरण शीघ्र हो जाती है तथा खरपतवार   भी कम आते है। अंकुरण के 3 माह तक खरपतवार की सघनता के अनुसार 3 से 4 बार निंदाई करना आवश्यक है जिससे कल्ले ज्यादा बनतें है। शरदकालीन गन्ने में चैड़ी पत्ती वाले खरपतवारों (बथुआ, मटरी, अकर, कृष्णनील, मकोय आदि) की रोकथाम के लिए 2, 4-डी (80 प्रतिशत सोडियम साल्ट) 1 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से 700 लीटर पानी में घोलकर बुआई से 25 -30 दिन बाद या खरपतवारों की 3-4 पत्ति अवस्था से पहले छिड़कना चाहिए। बसन्तकालीन गन्ने की फसल में सिमाजीन या एट्राजिन या एलाफ्लोर 2 किग्रा. प्रति हे. की दर से 700 लीटर पानी में घोलकर बुआई के तुरन्त बाद छिड़काव करना चाहिये। छिड़काव करते समय खेत में नमी होना आवश्यक है। गन्ने में कहीं-कहीं जड़ परीजीवी जैसे स्ट्राइगा (स्ट्राइगा ल्युटिया) से भी क्षति ह¨ती है । यह हल्के हरे रंग का 15-30 सेमी लम्बा पोधा होता है जो  गन्ने की जड़ से पोषण लेता है । इसकी रोकथाम के लिए 2,4-डी (सोडियम साल्ट) 2.5 किग्रा. प्रति हेक्टर 2250 लिटर पानी में घ¨लकर छिड़कने से  यह नष्ट ह¨ जाता है । इस परिजीवी की कम संख्या ह¨ने पर इसे उखाड़कर नष्ट किया जा सकता है ।

गन्ने के साथ साथ बोनस फासले भी 

    गन्ना की खेती धान, गेहूँ, मक्का, ज्वार, आलू या सरसो के बाद की जाती है। शरदकालीन गन्ना के साथ आलू की सह फसली खेती में गन्ना की बुआई अक्टूूबर के प्रथम सप्ताह में कतारों में 90 सेमी. की दूरी पर करना चाहिए। गन्ने की दो कतारों के बीच आलू की एक कतार पौधे की दूरी 15 से.मी. रखकर ब¨ना चाहिए। शरदकालीन गन्ना के साथ चना या मसूर की सह फसली खेती हेतु गन्ने की दो पंक्तियों के मध्य (90 सेमी.) चना या मसूर की 2 कतारें 30 सेमी. की दूरी पर बोना चाहिए। बसन्तकालीन गन्ना के साथ मूँग की सह फसली खेती में गन्ना की बुआई फरवरी में 90 से.मी. की दूरी पर करते है। गन्ने की दो पंक्तियों के मध्य मूँग या उड़द की दो कतारें 30 से.मी. की दूरी पर बोना चाहिए। मूँग व उड़द की बीज दर 7 - 8 किग्रा. प्रति हैक्टर रखते है।

सही समय पर कटाई

    गन्ने की फसल 10 - 12 माह में पककर तैयार हो जाती है। गन्ना पकने पर इसके तने को ठोकने पर धातु जैसी आवाज आती है। गन्ने को मोड़ने पर गाँठों  पर आसानी से टूटने लगता है। गन्ने की कटाई उस समय करनी चाहिए जब रस में सुक्रोज की मात्रा  सर्वाधिक हो। गन्ने के रस में चीनीे की मात्रा (पकने का सही समय) हैण्डरिफ्रेक्ट्र¨मीटर से ज्ञात की जा सकती है। फसल की कटाई करते समय ब्रिक्स रिडिंग 17 - 18 के बीज में होना चाहिए या फिर पौधों के रस में ग्लूकोज 0.5 प्रतिशत से कम होने पर कटाई करना चाहिए। फेहलिंग घोल के प्रयोग से रस में ग्लूकोज का  प्रतिशत ज्ञात किया जा सकता है। तापक्रम बढ़ने से सुक्रोज का परिवर्तन ग्लूकोज मे होने लगता है। गन्ना सबसे निचली गाँठ से जमीन की सतह में गंडासे से काटना चाहिए। कटाई के पश्चात् 24 घंटे के भीतर गन्ने की पिराई कर लें अथवा कारखाना  भिजवाएँ क्योकि काटने के बाद गन्ने के भार में 2 प्रतिशत प्रतिदिन की कमी आ सकती है। साथ ही कारखाने में शक्कर की रिकवरी  भी कम मिलती है। यदि किसी कारणवश गन्ना काटने के बाद रखना पड़े तो उसे छाँव में ढेर के रूप में रखें। हो सके तो, ढेर को ढँक दें तथा प्रतिदिन पानी का छिड़काव करें।

अब मन बांक्षित उपज

    गन्ने की उपज मृदा, जलवायु, किस्म, सस्य प्रबन्धन पर निर्भर करती है। सामान्यतया औसतन 400 - 500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर गन्ना पैदा होता है। उचित प्रबंध होने पर 700 - 90 क्विंटल  प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।  रस की गुणवत्ता उसमें उपलब्ध सुक्रोज की मात्रा से आँकी जाती है, जो गन्ने की किस्म, भूमि, जलवायु, कटाई काल तथा पेरे गये तने के भाग पर निर्भर करती है। प्रायः रस में 12 - 24 प्रतिशत तक सुक्रोज रहती है। जिन गन्नों में 18 -20 प्रतिशत तक सुक्रोज होती है उन्हे आदर्श माना जाता है। देशी विधि से 6-7 प्रतिशत तथा चीनी मिलों से 9 - 10 प्रतिशत शक्कर प्राप्त होती है।  औसतन गन्ने के रस से 12 - 13 प्रतिशत गुड़, 18 - 20 प्रतिशत राब तथा 9 -11 प्रतिशत चीनी प्राप्त होती है। गन्ने में 13-24 प्रतिशत सुक्रोज तथा 3-5 प्रतिशत शीरा पाया जाता है।

सदा बहार तिलहनी फसल सूरजमुखी की वैज्ञानिक खेती

                                  सदा बहार तिलहनी फसल- सूरजमुखी

                                                              डॉ गजेन्द्र सिंह तोमर 
                                                            प्राध्यापक (सश्यविज्ञान)
                                                      इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय,
                                                        कृषक नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़)
    सूरजमूखी पुष्पन अवस्था में यह फसल खेती के अधीन आने वाले सारे क्षेत्र को सुन्दर व दर्शनीय बना देती है और पकने पर यह हमें उच्च कोटि का खाद्य तेल प्रदान करती है। प्राकश व ताप असंवेदी  होने के कारण इस फसल पर प्रकाश व तापक्रम का प्रभाव नहीं पड़ता है, अतः वर्ष में किसी भी समय इसे उगाया जा सकता है। इसलिए इस फसल को  सभी मोसमो  की फसल की संज्ञा दी गई है । कम अवधि (90 - 100 दिन) में तैयार होने के कारण बहु फसली खेती के लिए यह एक उत्तम फसल है। सूर्यमुखी से कम बीज दर  में थोड़े समय में अधिक बीज उत्पादन  किया जा सकता है।
    इसके बीज में 40 - 50 प्रतिशत तेल व 20 - 25 प्रतिशत तक प्रोटीन होती है। सूर्यमुखी का तेल स्वादिष्ट एवं विटामिन ए, डी और ई से परिपूर्ण होता है। इसका तेल हल्के पीले  रंग, स्निग्ध गंध, उच्च धूम बिन्दु वाला होता है जिसमें  बहु - असतृप्त वसा अम्ल विशेष रूप से लिनोलीइक अम्ल की अधिकता (64 प्रतिशत) होती है, जो कि रूधिर कोलेस्टेराल की वृद्धि को रोकने  के अलावा उस पर अपचायक प्रभाव  भी डालता है । इसलिए ह्रदय रोगियों के लिए इसका तेल लाभप्रद पाया गया है। पोषण महत्व की दृष्टि से लिनोलीइक अम्ल अत्यावश्यक वसा अम्ल है, जिसकी आपूर्ति आहार  द्वारा होती है। इसलिए सूर्यमुखी का तेल अधिकांश वनस्पति तेलो की अपेक्षा बेहतर और कुसुम के तेल के समकक्ष माना जाता है। इसके तेल का उपयोग वनस्पति घी (डालडा) तैैयार करने में भी किया जाता है। इसकी गिरी  काफी स्वादिष्ट होती है। इसे कच्चा या भूनकर मूँगफली की भाँति खाया जाता है। गिरी का प्रयोग चिरौंजी या खरबूजे की गिरी के स्थान पर किया जाता है। तेल निकालने के पश्चात् प्राप्त खली पशुओं को खिलाने के लिए उपयोगी है जिसमें 40 - 44 प्रतिशत प्रोटीन होती है। सूरजमुखी की उपज बाजार में अच्छे मूल्य पर आसानी से बेची जा सकती है। सूरजमुखी की फसल के साथ मधुमक्खी पालन भी किया जा सकता है।
    सूर्यमुखी (हेलिऐन्थस ऐनुअस एल) के वंश नाम की उत्पत्ति ग्रीक शब्दों हेलिआस जिसका अर्थ है सूर्य एवं ऐन्थस (फूल) से हुई है। इसका फ्रैंच नाम टूर्नेसाल है, जिसका शाब्दिक अर्थ है - सूर्य के साथ घूमना। सूर्यमुखी का जन्म स्थान दक्षिण पश्चिमी अमेरिका एवं मेक्सिको माना जाता है। मेक्सिको से स्पेन होते हुए यह यूरोप पहुँची जहाँ पर अलंकारित पौधों  के रूप मे सूर्यमुखी उगाई जाने लगी तथा पूर्वी यूरोप तिलहन फसल के रूप में इसकी खेती प्रारम्भ हुई।  दुनियां में सूर्यमुखी की ख्¨ती 21.48 मिलियन हैक्टर क्षेत्र फल में की गई जिससे 1227.4 किग्रा. प्रति हैक्ट की दर से 26.366 मिलियन टन उत्पादन दर्ज किया गया । सर्वाधिक रकबे  में सूर्यमुखी उगाने वाले  प्रथम तीन देशो  में रूस, यूक्रेन व भारत देश आते है जबकि उत्पादन में रूस, अर्जेन्टिना एवं यूक्रेन आते है । प्रति हैक्टर औसत उपज के मामले  में फ्रांस प्रथम (2373.5 किग्रा), चीन द्वितिय (1785.7 किग्रा) एवं और अर्जेन्टिना तृतीय (1701.4 किग्रा.) स्थान पर स्थापित रहे है । भारत में सूर्यमुखी को लगभग 1.81 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में लगाया जाता हे  जिससे  लगभग 1.16 मिलियन टन उत्पादन प्राप्त होता है  तथा 639 किग्रा. प्रति हैक्टर  हे  औशत उपज आती हे  । सबसे अधिक क्षेत्र फल में सूर्यमुखी उगाने तथा अधिकतम उत्पादन देने वाले  प्रथम तीन राज्यो  में कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश एवं महाराष्ट्र राज्य है जबकि औसत उपज के मामले  में उत्तर प्रदेश प्रथम (1889 किग्रा. प्रति हैक्टर), हरियाना द्वितिय (1650 किग्रा. प्रति हैक्टर) एवं बिहार तृतीय (1388 किग्रा) स्थान पर रहे है । छत्तीसगढ़ में सुर्यमुखी की खेती सभी जिलो  में कुछ न कुछ  में की जा  रही है । रायगढ़, राजनांदगांव, दुर्ग, महासमुन्द एवं बिलासपुर जिल¨ं में सूर्यमुखी बड़े पैमाने पर उगाया जा रहा है । सवसे अधिक उत्पादन देने वाल्¨ प्रथम तीन जिल¨ं में रायगढ़, राजनांदगांव व दुर्ग जिल्¨ आते है । अ©सत उपज के मामल्¨ में रायगढ़ जिल्¨ का प्रथम स्थान (1410 किग्रा. प्रति हैक्टर) है, जिसके बाद धमतरी और  महासमुन्द जिले  का स्थान आता है ।
जलवायु
    सूरजमुखी प्रकाशकाल  के प्रति असंवेदनशील, कम अवधि तथा अधिक अनुकूलन के कारण सभी मौसमों की फसल कहलाती है। सुखाग्रस्त  अथवा बारानी क्षेत्रों में यह फसल देरी से (अगस्त में ) एवं अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में इसे रबी के मौसम (अक्टूबर - नवम्बर) मे उगाया जाता है। सिंचाई की सुविधा हो तो जायद(गर्मी) के मौसम में भी इसे उगाया जा सकता है। उन क्षेत्रों में जहाँ समान रूप से वितरित 500 - 700 मिमी. वार्षिक वर्षा होती है तथा फूल आने के पूर्व समाप्त हो जाती है, इसकी खेती के लिए उपयुक्त है। फुल और बीज बनते समय तेज वर्षा और हवा से फसल गिर जाती है। सूरजमुखी की वानस्पतिक वृद्धि  के समय गर्म एवं नम जलवायु की आवश्यकता होती है, परन्तु फल आने और परिपक्व होने  के समय चटक धूप वाले दिन आवश्यक है। बीज अंकुरण एवं पौध बढ़वार के समय ठण्डी जलवायु की आवश्यकता होती है। बीज अंकुरण के समय 25-30 डि.से.तापक्रम अच्छा रहता है तथा 15 डि.से.  से कम तापक्रम पर अंकुरण प्रभावित होता है। इसकी फसल क¨ 20-25 डि.से.    तापक्रम की आवश्यकता होती है। गर्म दिन और ठण्डी रातें फसल के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। सामान्यतौर पर फुल आते समय  से अधिक तापक्रम होने पर बीज की उपज और तेल की मात्रा मे गिरावट होती है। इसी प्रकार  16 डि.से.   से कम तापमान होने पर बीज निर्माण व तेल प्रतिशत मे कमी आती है। आतपौध्भिद होते हुए भी सूरजमुखी मक्का व आलू की तुलना में छाया को अधिक अच्छी तरह सहन कर सकती है। इसके पौधे का आतपानुवर्ती संचलन मुख्यतया धूप के फलस्वरूप विभेदी आॅक्सिन सांद्रणों के कारण तने के मुड़ने से होता है। आॅक्सिन के अंतर्जात उद्दीपन के कारण होने वाले इस प्रकार के संचलन को हैबिट कहते है। शीत ऋतु में कम तापमान ह¨ने के कारण फसल देर से परिपक्व (लगभग 130 दिन में) ह¨ती है, जबकि खरीफ के म©सम में उच्च तापमान ह¨ने के कारण यह शीघ्र पकती (80 दिन) है ।

भूमि का चयन 

    सूर्यमुखी की खेती सिंचित बलुई मृदाओं से लेकर उच्च जल धारण क्षमता वाली मटियार मृदाओ तक तथा 6.5 से 8.0 पीएच मान वाली विविध प्रकार की भूमियो मे की जा सकती है। अच्छी उपज के लिए गहरी, उर्वरा, जैवांश युक्त तथा उदासीन अभिक्रिया वाली बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम है। खरीफ की फसल हल्की, रेतीली और पानी के उत्तम निकास वाली भूमि मे ली जा सकती है। यह फसल अस्थाई सूखे का मुकाबला कर सकती है और इसलिए इसे कम वर्षा होने वाले क्षेत्रो मे सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। रबी फसल के लिए दोमट - कपास की काली मिट्टी  जो काफी दिनों तक नमी संरक्षित रख सके, इसके लिए उपयुक्त होती है।

भूमि की तैयारी

    सूरजमुखी के लिए ख्¨त की मृदा हल्की एवं भुरभुरी  होनी चाहिए । पिछली फसल काटने के पश्चात् खेत मे एक या दो बार हल या कल्टीवेटर चलाकर खरपतवार नष्ट करते हुए मिट्टी भुरभुरी एवं समतल कर लेनी चाहिए। अंतिम जुताई करने से पूर्व 25 किलो क्लोरपायरीफास प्रति हेक्टेयर भूरक देना चाहिए। रबी की फसल के लिए भूमि की तैयारी अन्य रबी फसलों के समान ही करना चाहिए। वर्षा निर्भर क्षेत्रों मे नमी संरक्षण हेतु उपाय करना चाहिए। सिंचित क्षेत्रों में खरीफ की फसल काटने के तुरंत बाद, जमीन की परिस्थिति के अनुसार जुताई करनी चाहिए। दो या तीन बार कल्टीवेटर चलाकर मिट्टी को भुरभुरा कर पाटा द्वारा भूमि को समतल  करना चाहिए। सूर्यमुखी के बीज का छिलका म¨टा ह¨ने के कारण नमी क¨ धीमी गति से स¨खते है । इसलिए ब¨आई के समय ख्¨त में पर्याप्त नमी का रहना आवश्यक पाया गया है । जलभराव की स्थिति क¨ यह फसल सहन नही कर सकती है । अतः खेत मे जल निकास की पर्याप्त व्यवस्था करना भी आवश्यक है।

उन्नत किस्में

    सूर्यमुखी की संकुल किस्मों (माडर्न तथा रशियन किस्में) से कम तथा संकर किस्मो से अधिक उपज प्राप्त होती है।रशियन किस्में  में विन्मिक, पेरिडविक, अर्माविसर्कज ,अर्माविरेक आदि है ।
सूरजमुखी की संकर व उन्नत किस्मो  की विशेषताएं
किस्म का नाम                     अवधि (दिन)        उपज (क्विंटल /हे.)        तेल (%)
मार्डन                                     80 - 85                           7 - 8            38 - 39
विनियमन                             115 - 120                    15 - 25            41 - 43
ज्वालामुखी (संकर)                 95 - 115                     25 - 28            39 - 40
दिव्यमुखी (संकर)                    85 - 90                      25 - 28            41 - 42
एमएसएफएच.-8(संकर)          90 - 95                      25 - 28            42 - 44
एमएसएफएच-17(संकर)       100 - 105                   10 - 15            42 - 44
केबीएसएच-1(संकर)                 90 - 95                    18 - 20            41 - 42
केबीएसएच-44(संकर)            105 - 110                   20 - 25            42 - 44

सूर्यमुखी की अन्य संकर व उन्नत किस्मो  के गुणधर्म

1. जेएसएल-1 (जवाहर सूर्यमुखी): इसका दाना मध्यम आकार का ठोस व काले रंग का चमटा होता है। यह किस्म जल्दी अर्थात् 120 से 125 दिनों में पककर तैयार हो जाती है । तेल की मात्रा 50 प्रतिशत तथा औसत पैदावार 15 से 20 क्विंटल  प्रति हेक्टेयर होती है। यह किस्म मध्यप्रदेश के सभी क्षेत्रों मे खरीफ एवं रबी मौसमों के लिये उपयुक्त है।
2. अर्माविस्किज (ई. सी. 68415): इसका दाना मध्यम आकार का ठोस, हल्के काले रंग का तथा कुछ छोटा रहता है। यह किस्म 125से 130 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। उपज क्षमता 9-10 क्विंटल  प्रति हेक्टेयर है। यह खरी मौसम के लिए मध्यप्रदेश के सभी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। यह रसियन किस्म है।
3. पैरिडोविक (ई. सी. 68414): इस किस्म का दाना ई. सी. 64415 के समान ही होता है, लेकिन रंग का गहरा काल होता है। यह देरी से (130 से 135 दिनों में) पकती है तथा इसके बीज में तेल की मात्रा 42 प्रतिशत होती है। औसत पैदावार 10 से 12 क्विंटल  प्रति हेक्टेयर होती है। खरीफ एवं रबी दोनों मौसमों मे मालवा एवं निमाड़ क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। यह भी रसियन किस्म है।
4. डीआरएसएफ-108: यह 90 - 95 दिन मे तैयार होने वाली सूखा सहनशील किस्म है। औसतन 22-25 क्विंटल  प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है। बीज में 40 प्रतिशत तेल होता है। असिंचित क्षेत्रों में खरीफ ऋतु के लिए उपयुक्त किस्म है।
5. एमएलएसएफएच-82: यह 85-100 दिन में तैयार होने वाली सूखा सहनशील किस्म है। औसतन 22-25 क्विंटल  प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है। बीज में 35 प्रतिशत तेल ह¨ता है। मध्य प्रदेश एवं छत्तिससगढ़ के लिए उपयुक्त संकर किस्म है।

बीज दर एवं बीज उपचार

    सूरजमुखी का  प्रमाणित बीज ही उपयोग में लाना चाहिए। सूरजमुखी के बीज भार में हलके (5.6 से 7.5 ग्राम प्रति 100 बीज) ह¨ते है । सूरजमुखी की संकुल किस्मों के लिए 8-10 किग्रा. तथा संकर किस्मो के लिए 6-7 किग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहता है।बुआई के पूर्व बीज को 24 घंटे पानी में भिगोकर बोने से अंकुरण प्रतिशत बढ़ता है। बोनी के पूर्व बीज को कैप्टान या थाइरम नामक फफूँदनाशक दवा (3 ग्राम दवा प्रति किलो बीज) से उपचारित करना आवश्यक है। इससे फफूँदी रोग नहीं हो पाता ।
बोआई का समय
    बहुत सी फसलो की तरह सूर्यमुखी दिन की अवधि तथा ऋतु विशेष से प्रभावित नहीं होती है और इसलिए इसकी ब¨आई किसी भी समय की जा सकती है । अत्यधिक ठण्डे मौसम को छोड़कर वर्ष के प्रायः सभी महीनो में सूर्यमुखी की बुआई की जा सकती है। खरीफ की फसल विशेषकर बारानी क्षेत्रों में अगस्त के दूसरे या तीसरे सप्ताह मे इसकी बोनी करनी चाहिये। जून व जुलाई माह में बोनी करने से उपज प्रायः कम होती है। क्योंकि परागण क्रिया करने वाले कीड़े बहुत कम आते है जिससे बीज का निर्माण ही नहीं होता या सभी बीज पोचे रह जाते है। अतः विभिन्न क्षेत्रों में बोनी का समय इस तरह निर्धारित करना चाहिए जिससे फसल मे फूल बनते समय अधिक व लगातार वर्षा न हो। सूखग्रस्त क्षेत्रों में अक्टूबर से नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक ब¨नी की जा सकती है। वसन्तकालिक फसल की बोआई 15 जनवरी से 2 0 फरवरी तक करना उचित रहता है ।

बोआई की विधियाँ

    सूर्यमुखी की बुआई कतार या डिबलिंग विधि से करनी चाहिए। संकुल किस्मों में पंक्तियों का फासला 45 सेमी. कतार  से कतार तथा 15 से 20 सेमी. पौध  से पौध अंतर रखना चाहिए। संकर किस्मों की बोनी 60 - 75 सेमी. दूर कतारों में तथा पौध  से  पौध के बीच की दूरी 20 से 25 सेमी. रखना चाहिए। अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 60 - 70 हजार पौधे प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहते है। बीज क¨ 2-4 सेमी. की गहराई पर ब¨ना उचित पाया गया है । गर्मी के समय उच्च तापमान ह¨ने के कारण मृदा की ऊपरी परत से नमी शीघ्र सूख जाती है, अतः ब¨आई 4 सेमी. की गहराई पर करना लाभकारी पाया गया है । सूरजमूखी के दानों का अंकुरण धान्यों की अपेक्षा अधिक देर से होता है, क्योकि इसके बीज का छिलका मोटा ह¨ने के कारण उनमें जल अवश¨षण  धीमी गति से ह¨ता है साथ ही इसका अंकुरण भी उपरिभूमिक  होता है। इसके अलावा मृदा की पपड़ी (क्रस्ट) अंकुरण की गति को और  अधिक मंद कर सकती है । उचित नमी एवं तापमान पर सूर्यमुखी के बीज का जमाव  प्रायः 8-10 दिन में हो जाता है।

खाद एवं उर्वरक

    पौधों की बढ़वार के लिए नाइट्रोजन, स्फुर एवं पोटाश आवश्यक तत्व है। नत्रजन तत्व की कमी से पौधो  की बढ़वार मंद पड़ जाती है । जड़ो  का विकास, बीज का आकार, उचित दाना भराव  व तेल में  बढ़ोत्र री के लिए फास्फोरस आवश्यक पोषक तत्व माना गया है। दाना भराव व रोग रोधित के लिए पोटाश एक उपयोगी तत्व है। पोटेशियम की अत्याधिक कमी ह¨ने से बीज खाली रह जाते है । दो या तीन वर्ष में एक बार 25 से 30 गाड़ी गोबर की खाद या कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर देना चाहिये। वर्षा निर्भर क्षेत्रों में 30 किग्रा. नत्र्ाजन, 30 किग्रा. स्फुर तथा 20 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर के हिसाब से बोनी के साथ देना चाहिए। सिंचितक्षेत्र   मे 60-8 0  किग्रा. नत्रजन , 60 किग्रा. स्फुर तथा 40 किग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर देना चाहिए । सिंचित क्षेत्रों में बोनी के समय स्फुर पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा देनी चाहिये। शेष आधी नत्रजन की मात्रा फसल बोने के लगभग एक महीने के बाद सिंचाई के पहले देना चाहिये। लगातार सघन कृषि पद्धतियों से जस्ते व गंधक की भूमि में कमी देखी जा रही है। तिलहनी फसल होने के कारण सूर्यमुखी को सल्फर तत्व की आवश्यकता पड़ती है। बुआई के समय 20-25 किग्रा. जिंक सल्फेट देना लाभप्रद रहता है। यदि फास्फोरस को सिंगल सुपर फास्फेट के रूप में दिया जाता है, तो अलग से सल्फर देने की आवश्यकता नहीं होती है। बुआई के समय सुपर फॉस्फेट या जिंक सल्फेट नहीं दिया गया है तो फसल में फूल आने की अवस्था में जिंक सल्फेट  2.5 किग्रा. और चूना 1.25 किग्रा. को 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना भी लाभकारी पाया गया है।

सिंचाई

    खरीफ ऋतु में लगाई गई सूर्यमुखी की फसल क¨ सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है । अवर्षा अथवा सूख्¨ की स्थिति में 1-2 सिंचाई देने से उपज में बढ़¨त्तरी ह¨ती है । भारी वर्षा ह¨ने पर ख्¨त से जल निकासी आवश्यक है । रबी एवं जायद की सूर्यमुखी मे तीन सिंचाईयाँ प्रथम ब¨आई के 40 दिन बाद, द्वितिय ब¨आई के 75 दिन बाद (पुष्पन अवस्था) तथा तृतीय ब¨आई के 100 दिन बाद (दाना भरते समय) देना लाभ कारी रहता है । पुष्पन एवं दान¨ं के विकास की अवस्था पर नमी की कमी का फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ता है । शीतकालीन या बसन्तकालीन सूर्यमुखी की ब¨आई एक हलकी सिंचाई करने के बाद करना लाभप्रद ह¨ता है ।

खरपतवार नियंत्रण

    अंकुरण के 10 - 12 दिन बाद पौधों - से - पौधों का अंतर 20 सेमी. रखने के लिये अनावश्यक पौधों को उखाड़ देना चाहिये तथा एक स्थान पर केवल एक ही पौधा रखना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण हेतु कतारों के बीच में एक-दो बार गुड़ाई (बुआई के 25-30 से दिन व 40-50 दिन) करना चाहिये। सूरजमुखी का फूल भारी और बड़ा होता है जिसके कारण आँधी-पानी से पौधे गिर सकते हैं। अतः दूसरी गुड़ाई के समय पौधों पर मिट्टी चढ़ाने का कार्य भी करना चाहिए। खरपतार नियंत्रण हेतु 1 किग्रा. फ्लूक्लोरैलिन (बासालिन 45 ईसी) या पेन्डीमिथिलीन (स्टाम्प 30 ईसी) 3 लीटर प्रति हेक्टेयर का 600 - 800 लीटर पानी में मिलाकर अंकुरण से पूर्व छिड़काव करना चाहिये।

परसेचन क्रिया

    सूरजमुखी सामान्यतः परपागित फसल है। अतः अच्छे बीज पड़ने एवं उनके भराव  हेतु परसेचन क्रिया नितान्त आवश्यक है मधुमक्खियों की उपुक्त संख्या होने पर ही परागण अच्छा होता है सूरजमुखी में फूल आते समय प्रति हेक्टेयर के हिसाब से मधुमक्खियों के 2-3 छत्तों को एक माह तक रख कर मुण्डकों  में पर परागण की क्रिया को बढ़ाया जा सकता है। मधुमक्खियों की सुरक्षा हेतु कीटनाशकों का प्रयोग कम-से -कम करना चाहिये। ग्रीष्म ऋतु में मक्खियों की संख्या में कमी आ जाती है। अतः कृत्रिम परसेचन करना आवश्यक हो जाता है। इसके लिए पौधों में अच्छी तरह फल के मुंडक पर चारों ओर धीरे-धीरे घुमा देना चाहिये, जिससे परागकण आसानी से पूरे मुंडक में पहुँचकर परसेचन क्रिया में सहायक हो जाये। यह क्रिया प्रातः काल 7 बजे से 10 बजे के मध्य, एक दिन के अन्तराल से 3-4 बार करनी चाहिए। 
पक्षियों से फसल की रखवाली
    सूरजमुखी में दाना बनते समय फसल की पक्षियों से रक्षा करना चाहिए। फसल को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाने   वाला पक्षी तोता होता है। इससे बचाव के लिए पक्षियो को उड़ाने वाले कुछ साधनों जैसे बिजूखा लगाना, पटाखा चलाना या ढोल बजाने की संस्तुति की गयी है।

फसल पद्धति

    सूरजमुखी दिन की लम्बाई के प्रति अपनी अभिक्रिया में प्रकाश उदासीन   होने के कारण इसे प्रायः सभी प्रकार के फसल चक्रों में सम्मिलित किया जा सकता है। उत्तरी भारत में यह मक्का-तोरिया/राई-सूरजमुखी, धान-सूरजमुखी, मक्का-मटर-सूरजमुखी, मक्का-आलू-सूरजमुखी आदि फसल चक्रों  में उगाई जा सकती है। अन्तः फसली खेती  के अन्तर्गत सूरजमुखी + मूँगफली (2.4), अरहर $ सूरजमुखी (1.2), सूरजमुखी + सोयाबीन (3.3), सूरजमुखी + उड़द (1.1), मूँगफली +सूरजमुखी (6.2 कतार अनुपात) में उगाना चाहिए।

कटाई एवं गहाई

    सूरजमुखी की फसल खरीफ में 80-90 दिन, रबी में 105-130 दिन तथा जायद में 100-110 दिन में तैयार हो जाती है। शीत ऋतु मे कम तापमान के कारण फसल अधिक समय में परिपक्व होती है। जब पौधों की पत्तियाँ पीली पड़ने लगें, पुष्प आधार की पिछली सतह पीली पड़ जाए और ब्रेक्ट भूरे पड़ने लगे तो उस समय फसल को काटना उपयुक्त रहता है। यह अवस्था  सामान्यतया परागण  के लगभग 45 दिन बाद आती है। इस समय मुंडक सूखे नहीं दिखते है,परन्तु बीज पक जाते हैं। बीजों में इस समय लगभग 18 प्रतिशत नमी होती है। कटाई हँसिया से या हाथ से उखाड़  कर करते हैं तथा मुंडक को अलग कर लेते हैं। कटाई पश्चात सूरजमुखी के मुंडकों  को 5-6 दिन तक सुखाने के बाद डंडों से पीटकर बीज को अलग कर लिया जाता है। अधिक क्षेत्रफल में उगाई गई फसल की गहाई थ्रेसर से भी की जा सकती है। बीजों को साफ करने के बाद धूप में सुखा लेना चाहिए।

उपज एवं भंडारण

    सूरजमुखी की संकुल किस्मों से 15 - 20  एवं संकर क्विंटल किस्मों  से 20 - 30  क्विंटल  प्रति हे. उपज प्राप्त होती है। खरीफं ऋतु की अपेक्षा रबी एवं बसंत में सूर्यमुखी की उपज अधिक प्राप्त होती है। बीज को भंडारित करने के पूर्व 2-3 दिन तक अच्छी प्रकार से सुखाना आवश्यक है। जब बीजों में नमी की मात्रा 10 प्रतिशत या इससे कम हो जाय तब उनको उचित स्थान पर संग्रहित  करना चाहिए। सूर्यमुखी के बीजों में सुसुप्तावस्था   लगभग 45 - 50 दिन की होती है।

ताकि सनद रहे: कुछ शरारती तत्व मेरे ब्लॉग से लेख को डाउनलोड कर (चोरी कर) बिभिन्न पत्र पत्रिकाओ और इन्टरनेट वेबसाइट पर अपने नाम से प्रकाशित करवा रहे है।  यह निंदिनिय, अशोभनीय व विधि विरुद्ध कृत्य है। ऐसा करना ही है तो मेरा (लेखक) और ब्लॉग का नाम साभार देने में शर्म नहीं करें।तत्संबधी सुचना से मुझे मेरे मेल आईडी पर अवगत कराना ना भूले। मेरा मकसद कृषि विज्ञानं की उपलब्धियो को खेत-किसान और कृषि उत्थान में संलग्न तमाम कृषि अमले और छात्र-छात्राओं तक पहुँचाना है जिससे भारतीय कृषि को विश्व में प्रतिष्ठित किया जा सके।

काबुली चने की खेती भरपूर आमदनी देती

                                                  डॉ. गजेन्द्र सिंह तोमर प्राध्यापक (सस्यविज्ञान),इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि महाव...